डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
भारत में जनसंख्या हमेशा से सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय रही है। लेकिन आज यह प्रश्न केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि देश में कितने लोग रहते हैं। अब प्रश्न यह है कि किस क्षेत्र में कितनी आबादी है, उसकी सामाजिक-धार्मिक संरचना क्या है, आबादी किस गति से बढ़ रही है, लोग कहां से आ रहे हैं और कहां जा रहे हैं तथा इस परिवर्तन का स्थानीय समाज, संसाधनों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
इसी व्यापक संदर्भ में 11 अक्टूबर 2025 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का “घुसपैठ, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और लोकतंत्र” विषय पर दिया गया वक्तव्य महत्वपूर्ण बन जाता है।
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार शाह ने अपने संबोधन में कहा कि 1951 से 2011 के बीच हुई जनगणनाओं के दौरान भारत में मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि हिंदू आबादी में 4.5 प्रतिशत कमी आई। उन्होंने इस परिवर्तन को मुख्यतः प्रजनन दर के बजाय बड़े पैमाने पर घुसपैठ से जोड़ा।
यही वह बिंदु है जहां से भारत के जनसांख्यिकीय विमर्श को गंभीरता से समझने की आवश्यकता पैदा होती है।
शाह का दावा : जनसांख्यिकीय परिवर्तन और घुसपैठ का संबंध
अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में मुस्लिम आबादी की वृद्धि केवल प्रजनन दर का परिणाम नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर मुस्लिम घुसपैठ भी इसका कारण है। उन्होंने विभाजन और उसके बाद पाकिस्तान तथा बांग्लादेश की ओर से होने वाली घुसपैठ को भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन से जोड़ा।
शाह ने यह भी कहा कि 1951 से 2011 तक हुई जनगणनाओं में विभिन्न धार्मिक समुदायों की जनसंख्या वृद्धि में जो अंतर दिखाई देता है, उसके पीछे घुसपैठ एक महत्वपूर्ण कारण है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है।
यह केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा प्रस्तुत राजनीतिक-सार्वजनिक दावा है; इसे जनगणना की आधिकारिक कारणात्मक खोज नहीं कहा जा सकता।
लेकिन गृह मंत्री द्वारा इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, जनसांख्यिकी और लोकतंत्र से जोड़ना अपने आप में इस विषय की गंभीरता को रेखांकित करता है।
1951 से 2011 : सात दशक की जनसांख्यिकीय यात्रा
भारत की स्वतंत्रता के बाद पहली जनगणना 1951 में हुई। उसके बाद 1961, 1971, 1981, 1991, 2001 और 2011 में नियमित जनगणना हुई।
इन सात दशकों में भारत की आबादी लगभग 36 करोड़ से बढ़कर 121 करोड़ से अधिक हो गई।
लेकिन कुल जनसंख्या वृद्धि के भीतर भी क्षेत्रीय और सामाजिक अंतर रहे।
कुछ राज्यों में प्रजनन दर लंबे समय तक अधिक रही।
कुछ राज्यों में प्रजनन दर तेजी से प्रतिस्थापन स्तर से नीचे चली गई।
कुछ क्षेत्रों में शहरीकरण तेज हुआ।
और सीमावर्ती राज्यों में प्रवासन तथा सीमापार आवागमन ने जनसांख्यिकीय बहस को नया आयाम दिया।
इसलिए भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन को केवल राष्ट्रीय औसत से नहीं समझा जा सकता।
धार्मिक अनुपात : बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में हिंदू आबादी लगभग 79.8 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी लगभग 14.2 प्रतिशत थी।
लेकिन 2025 में जब जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर बहस हुई तो कई राजनीतिक और सामाजिक वक्तव्यों में 1951 से 2011 के बीच धार्मिक हिस्सेदारी में आए बदलाव को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
अमित शाह ने इसी ऐतिहासिक जनगणना प्रवृत्ति को अपने तर्क का आधार बनाया।
यहां दो बातें अलग-अलग रखनी होंगी।
पहली—धार्मिक संरचना में बदलाव वास्तविक जनसांख्यिकीय घटना है।
दूसरी—उस बदलाव का कारण क्या है, यह अलग शोध का विषय है।
किसी समुदाय की जनसंख्या हिस्सेदारी बदलने के पीछे प्रजनन दर, आयु संरचना, मृत्यु दर, प्रवासन, अंतर्विवाह, गणना-पद्धति और अन्य सामाजिक कारक हो सकते हैं।
इसीलिए 2027 की जनगणना का महत्व बहुत बढ़ जाता है।
क्या भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो रहे हैं?
लेकिन प्रश्न का दूसरा पक्ष अधिक महत्वपूर्ण है।
भारत के कुछ राज्यों और जिलों में किसी धार्मिक समुदाय की स्थानीय जनसंख्या हिस्सेदारी राष्ट्रीय औसत से बहुत अलग हो सकती है।
इसलिए भविष्य के जनसांख्यिकीय शोध में राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ राज्य, जिला, तहसील और गांव स्तर पर जनसंख्या संरचना को देखना होगा।
यहीं जनसांख्यिकीय परिवर्तन की वास्तविक तस्वीर दिखाई देगी।
पश्चिम बंगाल और असम : सीमा से जुड़ा जनसांख्यिकीय प्रश्न
अमित शाह ने विशेष रूप से घुसपैठ औरजनसांख्यिकीय परिवर्तन के संबंध को भारत की पूर्वी सीमाओं के संदर्भ में उठाया।
अप्रैल 2025 में द इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि शाह ने पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश सीमा से घुसपैठ का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि अवैध रूप से प्रवेश करने वाले लोगों के दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं।
अगस्त 2025 में उन्होंने सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन को "सुनियोजित योजना" से जोड़ते हुए कहा कि ऐसे परिवर्तन देश की सुरक्षा और सीमाओं को प्रभावित करते हैं।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और परिमाण का निर्धारण आधिकारिक प्रवासन और नागरिकता संबंधी आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए।
फिर भी नीति के स्तर पर प्रश्न महत्वपूर्ण है—
यदि किसी सीमा क्षेत्र में असामान्य जनसंख्या आवागमन हो रहा है, तो राज्य को उसकी निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
2026 में सरकार ने इस बहस को संस्थागत रूप दिया
यह विषय केवल राजनीतिक भाषण तक सीमित नहीं रहा।
मई 2026 में केंद्र सरकार ने जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर उच्चस्तरीय समिति गठित की, जिसका उद्देश्य देश में होने वाले "अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय परिवर्तनों" की प्रकृति, कारण और परिणामों का वैज्ञानिक अध्ययन करना तथा उचित नीतिगत, प्रशासनिक और कानूनी उपाय सुझाना है। समिति की अध्यक्षता सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर को दी गई।
समिति के संदर्भ में अवैध प्रवासन, अनियमित जनसंख्या आवागमन और प्रशासनिक शिथिलता जैसे कारकों का अध्ययन करने की बात कही गई है।
इससे स्पष्ट है कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रश्न अब केवल राजनीतिक विमर्श नहीं रहा; सरकार ने इसे अध्ययन और नीति-निर्माण का विषय भी बनाया है।
लेकिन प्रजनन दर को नजरअंदाज करना भी सही नहीं
अमित शाह ने 2025 के अपने वक्तव्य में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि को मुख्यतः घुसपैठ से जोड़ा और प्रजनन दर को प्रमुख कारण मानने से असहमति व्यक्त की।
लेकिन व्यापक जनसांख्यिकीय शोध में प्रजनन दर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत में सभी धार्मिक समुदायों में लंबे समय में प्रजनन दर कम हुई है। इसलिए 2027 की जनगणना और अन्य जनसांख्यिकीय सर्वेक्षणों में प्रजनन दर, आयु संरचना और प्रवासन को एक साथ देखने की आवश्यकता होगी।
सिर्फ धर्म के आंकड़े से जनसांख्यिकीय परिवर्तन का कारण निर्धारित नहीं किया जा सकता।
इसीलिए 2027 की जनगणना भारत के लिए निर्णायक होगी।
2027 की जनगणना : बहस का निर्णायक दस्तावेज
2027 की जनगणना भारत के जनसांख्यिकीय विमर्श में ऐतिहासिक महत्व रखती है।
इस बार जनसंख्या गणना के साथ जातिगत गणना भी शामिल होगी।
इससे भविष्य में पहली बार धर्म और जाति को आयु, लिंग, शिक्षा, व्यवसाय, प्रवासन और अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ अधिक व्यापक रूप से देखने की संभावना बनेगी।
तब यह समझना आसान होगा कि—
- कौन-सा समुदाय किस आयु वर्ग में अधिक है?
- किस क्षेत्र में जनसंख्या वृद्धि अधिक है?
- किस क्षेत्र में वृद्धावस्था तेजी से बढ़ रही है?
- प्रवासन कहां अधिक है?
- कौन से जिले जनसंख्या में कमी देख रहे हैं?
- किन सीमावर्ती जिलों में असामान्य जनसंख्या आवागमन है?
यही वास्तविक जनसांख्यिकीय शोध होगा।
जनसांख्यिकीय परिवर्तन और लोकतंत्र
अमित शाह ने अपने भाषण में जनसांख्यिकीय परिवर्तन को सीधे लोकतंत्र से जोड़ा।
उनका तर्क था कि यदि अवैध रूप से आए लोग मतदाता सूची में शामिल हो जाते हैं तो वे लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते हैं। उन्होंने "पहचानो, हटाओ और निर्वासित करो" की नीति का उल्लेख किया और कहा कि मतदान का अधिकार केवल नागरिकों को होना चाहिए।
यहां भारतीय लोकतंत्र के लिए एक मूल सिद्धांत स्पष्ट है—
मताधिकार नागरिकता से जुड़ा है।
इसलिए मतदाता सूचियों की शुद्धता, नागरिकता का सत्यापन और अवैध प्रवासन की पहचान प्रशासनिक और संवैधानिक प्रश्न हैं।
लेकिन साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भारतीय नागरिक को केवल उसकी भाषा, धर्म, जाति या क्षेत्रीय पहचान के आधार पर "घुसपैठिया" न माना जाए।
यही लोकतांत्रिक संतुलन है।
भारत की चुनौती : जनसंख्या नहीं, असंतुलित जनसांख्यिकीय विकास
आज भारत के सामने दो बिल्कुल अलग जनसांख्यिकीय वास्तविकताएं हैं।
एक ओर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में बड़ी युवा आबादी भारत के लिए जनसांख्यिकीय लाभांश है।
दूसरी ओर केरल, तमिलनाडु और कुछ अन्य राज्यों में वृद्धावस्था तेजी से महत्वपूर्ण चुनौती बन रही है।
इसलिए भारत को एक समान जनसंख्या नीति के बजाय क्षेत्र-विशिष्ट जनसांख्यिकीय नीति की आवश्यकता है।
सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए एक नीति।
युवा राज्यों के लिए दूसरी।
वृद्धावस्था से जूझ रहे राज्यों के लिए तीसरी।
महानगरों के लिए चौथी।
और जनजातीय तथा पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के लिए पांचवीं।
भारत को क्या करना चाहिए?
1. 2027 की जनगणना को पूरी पारदर्शिता से पूरा किया जाए
धर्म, जाति, प्रवासन और जनसंख्या संबंधी आंकड़ों को वैज्ञानिक रूप से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
2. सीमावर्ती जिलों का विशेष जनसांख्यिकीय लेखा-परीक्षण हो
सीमावर्ती जिलों में जन्म, मृत्यु, प्रवासन और नागरिकता संबंधी आंकड़ों का नियमित अध्ययन होना चाहिए।
3. अवैध प्रवासन और वैध प्रवासन को अलग किया जाए
हर प्रवासी को घुसपैठिया कहना भी गलत है और अवैध प्रवासन की समस्या से इनकार करना भी।
4. मतदाता सूचियों की नियमित समीक्षा हो
लोकतंत्र की विश्वसनीयता के लिए मतदाता सूची की शुद्धता अनिवार्य है।
5. जनसांख्यिकीय परिवर्तन को धर्मयुद्ध न बनाया जाए
यह राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न हो सकता है, सामाजिक नीति का प्रश्न हो सकता है, लेकिन इसे समुदायों के बीच अविश्वास पैदा करने का साधन नहीं बनना चाहिए।
भारत कितना बदला
अमित शाह का 2025 का वक्तव्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने भारत में जनसांख्यिकीय परिवर्तन की बहस को घुसपैठ, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतंत्र के साथ जोड़कर सामने रखा।
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार शाह ने 1951–2011 की जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत वृद्धि और हिंदू आबादी में 4.5 प्रतिशत कमी का दावा किया तथा इसका प्रमुख कारण घुसपैठ बताया।
लेकिन इस दावे की अंतिम वैज्ञानिक जांच 2027 की जनगणना और उससे जुड़े प्रवासन तथा जनसांख्यिकीय आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से ही संभव होगी।
भारत के सामने चुनौती यह नहीं कि उसकी आबादी बदल रही है—आबादी का बदलना स्वाभाविक है।
चुनौती यह है कि परिवर्तन यदि कहीं असामान्य गति से हो रहा है तो उसका कारण क्या है?
क्या वह प्रजनन दर है?
क्या प्रवासन है?
क्या शहरीकरण है?
क्या सीमापार घुसपैठ है?
क्या आर्थिक अवसर हैं?
या इन सभी का मिश्रण?
इन प्रश्नों के प्रमाण-आधारित उत्तर ही भारत की भविष्य की जनसांख्यिकीय नीति तय करेंगे।
2027 की जनगणना इसलिए केवल जनगणना नहीं होगी। वह यह बताएगी कि पिछले डेढ़ दशक में भारत का सामाजिक और भौगोलिक मानचित्र कितना बदला है।
और यही वह बिंदु है जहां से भारत को भय या राजनीतिक आरोपों के बजाय आंकड़ों, संविधान और राष्ट्रीय हित के आधार पर अपनी जनसांख्यिकीय रणनीति तय करनी होगी।