डॉ. भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
मध्य प्रदेश की पहचान केवल भौगोलिक विविधता से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति से भी है। प्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी, खरगोन, मंडला, डिंडोरी, बालाघाट, सिवनी, शहडोल और अनूपपुर जैसे क्षेत्रों में आदिवासी समाज सदियों से अपनी विशिष्ट परंपराओं, प्रकृति-आधारित जीवन-दृष्टि और सामुदायिक संस्कृति के साथ जीवन जीता आया है।
लेकिन पिछले कुछ दशकों में इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा और धार्मिक संस्थाओं की बढ़ती मौजूदगी ने आदिवासी समाज के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है। इसी संदर्भ में क्रिश्चियन मिशनरी संस्थाओं की भूमिका, उनके स्कूलों, छात्रावासों, स्वास्थ्य सेवाओं और धार्मिक गतिविधियों को लेकर बहस तेज हुई है।
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। किसी चर्च, मिशन स्कूल या ईसाई संस्था की मौजूदगी अपने आप में धर्मांतरण का प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार किसी संस्था पर धर्मांतरण का आरोप लगना भी तब तक अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता, जब तक पुलिस जांच, न्यायिक प्रक्रिया या प्रशासनिक कार्रवाई से उसकी पुष्टि न हो। इसलिए इस विषय को आरोप और प्रमाण के बीच अंतर रखते हुए समझना जरूरी है।
सेवा के माध्यम से सामाजिक पहुंच
मिशनरी संस्थाओं की सबसे बड़ी शक्ति उनकी संस्थागत पहुंच रही है। जिन दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी स्कूल, अस्पताल और परिवहन सुविधाएं लंबे समय तक सीमित रही हैं, वहां निजी संस्थाओं ने स्कूल, छात्रावास, चिकित्सा केंद्र और सामाजिक सेवा संस्थान स्थापित किए।
इससे आदिवासी परिवारों को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं मिलीं। यह पक्ष निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए।
लेकिन सामाजिक विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो किसी संस्था की लगातार मौजूदगी केवल सेवा तक सीमित नहीं रहती। स्कूल में पढ़ने वाला विद्यार्थी, छात्रावास में रहने वाला बच्चा, चिकित्सा सुविधा लेने वाला परिवार और सामाजिक सहायता प्राप्त करने वाला समुदाय उस संस्था के साथ दीर्घकालिक संबंध बनाता है।
यहीं से सामाजिक प्रभाव और सांस्कृतिक प्रभाव का प्रश्न पैदा होता है।
यदि किसी क्षेत्र में सरकारी संस्थाओं की तुलना में किसी धार्मिक या सामाजिक संस्था की पहुंच अधिक हो जाए तो स्वाभाविक रूप से उस संस्था का प्रभाव भी बढ़ सकता है। इसलिए आदिवासी क्षेत्रों में राज्य की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सेवाओं को मजबूत करना सबसे महत्वपूर्ण समाधान है।
झाबुआ और पश्चिमी मध्य प्रदेश
झाबुआ, अलीराजपुर और धार का आदिवासी बेल्ट लंबे समय से मिशनरी गतिविधियों और धर्मांतरण की राजनीतिक-सामाजिक बहस के केंद्र में रहा है।
झाबुआ में मिशन स्कूल परिसर में चर्च निर्माण को लेकर विरोध की खबर सामने आई थी। इस घटना ने यह सवाल उठाया कि धार्मिक संस्थाओं की गतिविधियां आदिवासी समाज के सार्वजनिक जीवन में किस प्रकार विस्तार कर रही हैं।
इसी क्षेत्र को लेकर समय-समय पर धर्मांतरण के आरोप भी लगाए जाते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों को व्यापक जनसंख्या-परिवर्तन का प्रमाण मानने से पहले आधिकारिक आंकड़ों और जनगणना के आंकड़ों का अध्ययन आवश्यक है।
यहां मूल प्रश्न यह होना चाहिए कि आदिवासी समाज की धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान दोनों की रक्षा कैसे की जाए।
डिंडोरी और मंडला में उठे सवाल
महाकौशल के डिंडोरी और मंडला जैसे जिले इस बहस का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामने रखते हैं।
डिंडोरी में मिशनरी स्कूल और छात्रावास से जुड़े विवादों की खबरें सामने आई हैं। कुछ मामलों में संस्थाओं पर धर्मांतरण से संबंधित आरोप लगाए गए और प्रशासनिक जांच की मांग हुई।
मंडला में भी मिशनरी स्कूल से जुड़े एक मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध की खबर प्रकाशित हुई थी।
इन घटनाओं को केवल धार्मिक संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इनके पीछे यह बड़ा सवाल भी है कि दूरस्थ आदिवासी समाज तक कौन पहुंच रहा है और राज्य की संस्थाएं वहां कितनी प्रभावी हैं?
जहां सरकारी स्कूल शिक्षक की कमी से जूझता हो, अस्पताल में डॉक्टर उपलब्ध न हो और बेरोजगार युवा रोजगार की तलाश में पलायन कर रहा हो, वहां कोई भी संस्था यदि लगातार शिक्षा, स्वास्थ्य अथवा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराती है तो उसका सामाजिक प्रभाव बढ़ना स्वाभाविक है।
इसलिए मिशनरी प्रभाव का मुकाबला केवल विरोध से नहीं बल्कि बेहतर सार्वजनिक सेवाओं से किया जा सकता है।
जबलपुर का उदाहरण
जबलपुर में एक क्रिश्चियन हाईस्कूल से संबंधित मामले में एक शिक्षक द्वारा धर्मांतरण के दबाव का आरोप लगाए जाने की खबर सामने आई थी। प्रशासन ने जांच के आदेश दिए थे। वहीं विद्यालय प्रबंधन ने आरोपों को निराधार बताया था।
यह उदाहरण पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दोनों पक्ष मौजूद हैं।
एक ओर शिकायतकर्ता के आरोप हैं और दूसरी ओर संस्था का खंडन। इसलिए इसे धर्मांतरण सिद्ध होने का प्रमाण कहना उचित नहीं होगा।
लेकिन ऐसे मामलों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच इसलिए आवश्यक है क्योंकि शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चे और युवा किसी भी प्रकार के अनुचित धार्मिक दबाव से मुक्त रहने चाहिए।
धर्मांतरण की बहस और कानूनी व्यवस्था
मध्य प्रदेश में धार्मिक स्वतंत्रता और अवैध धर्मांतरण के विरुद्ध कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। कानून का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन बल, अनुचित प्रभाव, धोखे या प्रलोभन के माध्यम से न कराया जाए।
यहां दो सिद्धांतों का संतुलन आवश्यक है।
पहला—भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यता रखने और कानून के दायरे में उसे बदलने की स्वतंत्रता है।
दूसरा—किसी व्यक्ति को दबाव, धोखे या अनुचित प्रलोभन से धर्म बदलने के लिए मजबूर करना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
इसलिए बहस किसी धर्म के खिलाफ नहीं बल्कि कानून और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में होनी चाहिए।
आदिवासी पहचान का प्रश्न
आदिवासी समाज की अपनी सांस्कृतिक परंपराएं हैं। प्रकृति, जल, जंगल, जमीन, पूर्वजों की स्मृति, ग्राम देवता और सामुदायिक जीवन उनकी संस्कृति के महत्वपूर्ण आधार हैं।
जब किसी समुदाय में धार्मिक परिवर्तन होता है तो उसका प्रभाव केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहता। कई बार सामाजिक संबंध, त्योहार, विवाह की परंपराएं, सामुदायिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक पहचान भी बदल सकती है।
इसीलिए आदिवासी समाज के भीतर अपनी पारंपरिक संस्कृति को बचाने और पुनर्जीवित करने के प्रयास भी दिखाई देते हैं। डिंडोरी जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक आदिवासी प्रतीकों और पूर्वजों की स्मृति को सार्वजनिक रूप से स्थापित करने की पहलें इसका उदाहरण हैं।
लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आदिवासी संस्कृति को किसी एक धार्मिक राजनीतिक खांचे में सीमित न किया जाए। आदिवासी समाज की अपनी विविध और विशिष्ट पहचान है।
आंकड़ों से क्या पता चलता है?
धर्मांतरण की बहस में सबसे बड़ी समस्या अक्सर यह होती है कि स्थानीय घटनाओं को पूरे प्रदेश की जनसांख्यिकीय तस्वीर मान लिया जाता है।
किसी जिले में चर्च की संख्या बढ़ना, किसी गांव में ईसाई परिवारों की संख्या बढ़ना या किसी मिशन स्कूल का विस्तार होना अपने आप में पूरे आदिवासी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का सांख्यिकीय प्रमाण नहीं है।
इसके लिए आवश्यक है कि जनगणना के धर्मवार आंकड़े, जिला स्तर के आंकड़े, पिछले कई दशकों के परिवर्तन, जन्म-मृत्यु दर, पलायन और शहरीकरण को एक साथ देखा जाए।
यही वैज्ञानिक तरीका होगा।
समाधान विरोध नहीं, विकल्प है
यदि समाज यह मानता है कि आदिवासी क्षेत्रों में बाहरी संस्थाओं का प्रभाव बढ़ रहा है तो सबसे प्रभावी उत्तर क्या होगा?
उत्तर है—राज्य की मजबूत उपस्थिति और समाज की अपनी संस्थागत क्षमता।
दूरस्थ गांवों में अच्छे विद्यालय हों।
आदिवासी बच्चों के लिए छात्रावास हों।
स्थानीय भाषा में शिक्षा हो।
स्वास्थ्य केंद्र नियमित रूप से चलें।
युवाओं को कौशल और रोजगार मिले।
महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर बढ़ें।
आदिवासी संस्कृति, लोककला और परंपराओं का दस्तावेजीकरण हो।
जब समुदाय को अपनी शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक आवश्यकताओं के लिए बाहरी संस्थाओं पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, तब किसी भी प्रकार के अनुचित प्रभाव की संभावना स्वतः कम होगी।
मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचलों में मिशनरी संस्थाओं की उपस्थिति को न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही प्रत्येक संस्था की गतिविधि को धर्मांतरण मान लेना उचित है।
वास्तविक चुनौती यह है कि सेवा और धार्मिक प्रचार की सीमा कहां है, सामाजिक सहायता और प्रलोभन में अंतर क्या है तथा धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
इस विषय पर आरोपों से अधिक जरूरी है—दस्तावेज, सरकारी आंकड़े, प्रशासनिक जांच और स्थानीय समाज की वास्तविक आवाज।
आदिवासी समाज को किसी धार्मिक या राजनीतिक खांचे में बांटने के बजाय उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करना ही दीर्घकालिक समाधान है।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—
यदि आदिवासी अंचलों में मिशनरी संस्थाएं शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से अपनी पहुंच बना सकती हैं, तो क्या राज्य और भारतीय समाज अपनी सेवा-संस्थाओं के माध्यम से उससे कहीं अधिक प्रभावी, पारदर्शी और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील विकल्प खड़ा नहीं कर सकते?
यही प्रश्न आज मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचलों के भविष्य के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है।