एक घास, जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी...

कुशा : दलदली धरती से भारतीय दर्शन में मोक्ष की अवधारणा तक

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    30-Sep-2026
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 एक घास, जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी...
 
 
 
 
डॉ. स्वप्निल व्यास
पर्यावरणविद
 
 
हमारे आसपास प्रकृति में ऐसी अनेक वनस्पतियां मौजूद हैं, जिन्हें हम प्रतिदिन देखते हैं, उनके ऊपर से गुजरते हैं, उन्हें खरपतवार समझकर उखाड़ देते हैं, लेकिन उनके भीतर छिपे सांस्कृतिक, औषधीय और पर्यावरणीय महत्व से अनजान रहते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा की विशेषता यह रही है कि उसने प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसके भीतर जीवन का दर्शन खोजा। वृक्ष हो या बेल, फूल हो या घास, नदी हो या पर्वत प्रकृति का प्रत्येक तत्व भारतीय जीवन दृष्टि में किसी न किसी रूप में मनुष्य के जीवन, संस्कार और चेतना से जुड़ा रहा है। ऐसी ही एक साधारण दिखाई देने वाली, लेकिन असाधारण महत्व रखने वाली घास है। कुशा, जिसे दर्भ या डाब भी कहा जाता है।
 
 
कुशा को सामान्य दृष्टि से देखें तो यह एक घास ही दिखाई देती है। धरती पर उगती है, कठिन परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखती है और कई बार ऐसी भूमि पर भी दिखाई देती है, जिसे हम अनुपयोगी या दलदली मान लेते हैं। लेकिन भारतीय संस्कृति ने इसकी पहचान केवल घास के रूप में नहीं की। इसे पवित्र माना, यज्ञ और अनुष्ठानों में स्थान दिया, साधना और ध्यान से जोड़ा और जीवन के अनेक संस्कारों का हिस्सा बनाया। इतना ही नहीं, मनुष्य के जीवन की अंतिम यात्रा में होने वाले संस्कारों में भी कुशा की उपस्थिति दिखाई देती है। यही कारण है कि कुशा के बारे में सोचते हुए मन में सहज ही यह भाव आता है कि यह ऐसी घास है, जो जीवन के साथ भी है और जीवन के बाद भी। वैज्ञानिक दृष्टि से कुशा को Desmostachya bipinnata कहा जाता है। यह घास कुल की वनस्पति है और भारतीय उपमहाद्वीप सहित अनेक क्षेत्रों में पाई जाती है। इसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता और इसकी मजबूत जड़ व्यवस्था है।
 
 
 
प्रकृति में ऐसी वनस्पतियां केवल स्वयं जीवित रहने के लिए नहीं होतीं, बल्कि वे उस पारिस्थितिकी तंत्र का भी हिस्सा होती हैं, जिसमें मिट्टी, जल, सूक्ष्मजीव, कीट-पतंगे और अन्य वनस्पतियां परस्पर जुड़े होते हैं। यहीं से कुशा का पर्यावरणीय दर्शन सामने आता है। जिसे मनुष्य अनुपयोगी भूमि समझ सकता है, प्रकृति के लिए वह किसी वनस्पति का घर हो सकता है। जिसे हम खरपतवार कहकर हटा देते हैं, वह मिट्टी को थामने, स्थानीय जैव विविधता को बनाए रखने और किसी विशेष भू-भाग की पारिस्थितिकी में भूमिका निभाने वाला पौधा हो सकता है। कुशा हमें यह समझाती है कि प्रकृति में कोई भी जीवन रूप पूरी तरह व्यर्थ नहीं होता। प्रकृति की अपनी व्यवस्था है और हर वनस्पति उस व्यवस्था में कोई न कोई भूमिका निभाती है। लेकिन कुशा की वास्तविक विशिष्टता तब सामने आती है, जब हम इसे भारतीय दर्शन और संस्कारों के संदर्भ में देखते हैं। वैदिक और उत्तरवर्ती भारतीय परंपराओं में कुशा का प्रयोग यज्ञ, हवन, पूजा, तर्पण, श्राद्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में मिलता है। कुशा से बने आसन का उपयोग साधना और ध्यान के लिए किया जाता रहा है। इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि किसी विशेष घास को धार्मिक सामग्री बना दिया गया। इसके पीछे भारतीय मनुष्य की वह दृष्टि दिखाई देती है, जिसमें प्रकृति और आध्यात्मिकता अलग-अलग नहीं हैं।
 
 
 
भारतीय दर्शन में शरीर नश्वर है, लेकिन जीवन की चेतना को उससे कहीं व्यापक माना गया है। जन्म से मृत्यु तक मनुष्य अनेक संस्कारों से गुजरता है और मृत्यु के बाद भी संस्कारों की परंपरा जारी रहती है। यही कारण है कि कुशा का संबंध जीवन के धार्मिक कर्मों से लेकर अंतिम संस्कार और पितृकर्म तक दिखाई देता है। एक छोटी-सी घास मनुष्य की सांसारिक यात्रा और उसके बाद की सांस्कृतिक कल्पना के बीच एक प्रतीकात्मक सेतु बन जाती है।
 
 
 
यह बात भारतीय संस्कृति की गहराई को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक दृष्टि में जन्म और मृत्यु दो अलग-अलग घटनाएं हो सकती हैं, लेकिन भारतीय दर्शन में जीवन को एक निरंतर यात्रा माना गया। मृत्यु अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन है। इसलिए मृत्यु के बाद होने वाले संस्कारों में भी प्रकृति के तत्वों की उपस्थिति बनी रहती है। कुशा इसी निरंतरता का एक सुंदर प्रतीक है। कुशा का संबंध केवल धार्मिक विश्वासों से ही नहीं, बल्कि आयुर्वेदिक और पारंपरिक औषधीय ज्ञान से भी रहा है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके विभिन्न भागों, विशेषकर मूल के औषधीय उपयोगों का वर्णन मिलता है। इसे शीतल और मूत्रल गुणों वाला माना गया है तथा परंपरागत रूप से मूत्र संबंधी विकारों, अतिसार और कुछ अन्य स्थितियों में इसके उपयोग का उल्लेख मिलता है। विभिन्न आयुर्वेदिक योगों में भी कुशा का उल्लेख मिलता है। आधुनिक वनस्पति एवं औषधीय शोध में भी Desmostachya bipinnata पर अध्ययन हुए हैं।शोधकर्ताओं ने इसमें पाए जाने वाले विभिन्न जैव-सक्रिय घटकों तथा इसके संभावित औषधीय गुणों काअध्ययन किया है। कुछ प्रयोगात्मक अध्ययनों में इसके अर्क में मूत्रल, सूजनरोधी, दर्द कम करने वाले, एंटीऑक्सीडेंट तथा अतिसाररोधी जैसे संभावित प्रभावों की जांच की गई है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि प्रयोगशाला या पशु अध्ययन के परिणामों को सीधे मनुष्यों के उपचार का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसलिए पारंपरिक औषधीय उपयोगों का सम्मान करते हुए भी किसी रोग के उपचार के लिए इसका सेवन चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं किया जाना चाहिए।
 
 
 
कुशा के संदर्भ में सबसे रोचक बात यह है कि भारतीय समाज ने औषधीय ज्ञान, धार्मिक विश्वास और पर्यावरणीय अनुभव को अलग-अलग खानों में नहीं बांटा था। एक ही वनस्पति पूजा में भी आ सकती थी, औषधीय ज्ञान में भी स्थान पा सकती थी और पर्यावरणीय जीवन का हिस्सा भी हो सकती थी। आज आधुनिक शिक्षा और विज्ञान इन विषयों को अलग-अलग disciplines में पढ़ाते हैं, लेकिन भारतीय लोकज्ञान में इनका संबंध अधिक समग्र था। कुशा इसी समग्रता की याद दिलाती है। आज जब दुनिया जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की बात कर रही है, तब हमें अपनी पारंपरिक वनस्पति-स्मृति को भी नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। हमारे गांवों, खेतों, तालाबों, नदी किनारों और चरागाहों में कभी ऐसी अनेक देशी वनस्पतियां सहज रूप से मौजूद रहती थीं, जिनके बारे में स्थानीय समाज को पीढ़ियों से जानकारी थी। कौन-सी घास पशुओं के लिए उपयोगी है, कौन-सी औषधीय है, कौन-सी मिट्टी को बांधती है, कौन-सी पूजा में आती है और कौन-सी जलस्रोत के आसपास उगती है।यह ज्ञान किसी पुस्तक में नहीं, बल्कि लोकजीवन में जीवित था।
 
 
 
आज वह ज्ञान धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। शहरीकरण, भूमि उपयोग में परिवर्तन, रासायनिक हस्तक्षेप और देशी वनस्पतियों की उपेक्षा के कारण अनेक पारंपरिक वनस्पतियां हमारे दैनिक जीवन से दूर होती जा रही हैं। कुशा के प्रति हमारी दृष्टि भी केवल धार्मिक उपयोग तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और जैविक विरासत कई बार एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी होती हैं। कुशा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि प्रकृति को केवल उसके आकार या आर्थिक उपयोग से मत आंकिए। एक विशाल वृक्ष हमें दिखाई देता है, इसलिए हम उसे महत्व देते हैं; लेकिन एक छोटी-सी घास हमारी आंखों के नीचे रहकर भी किसी पूरे सांस्कृतिक दर्शन को अपने भीतर समेटे हो सकती है।
 
 
 
कुशा हमें यह भी बताती है कि भारतीय दर्शन में मोक्ष की कल्पना प्रकृति से अलग नहीं थी। मनुष्य जब जीवन से मुक्ति की बात करता है, तब भी वह पंचतत्वों से बने शरीर और प्रकृति के बीच ही खड़ा है। जन्म में प्रकृति, जीवन में प्रकृति और मृत्यु के बाद भी प्रकृति यह भारतीय जीवन दृष्टि की मूल संवेदना है। इसी संदर्भ में कुशा का महत्व असाधारण हो जाता है। जिस घास को धरती अपने भीतर से जन्म देती है, वही मनुष्य के यज्ञ में पवित्रता का माध्यम बनती है, साधना में आसन बनती है, तर्पण में स्मृति का आधार बनती है और मृत्यु के संस्कारों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। यह केवल एक वनस्पति की यात्रा नहीं है; यह मनुष्य और प्रकृति के हजारों वर्षों पुराने रिश्ते की कहानी है।
 
 
 
शायद इसीलिए कुशा को देखकर हमें केवल एक घास नहीं देखनी चाहिए। उसके भीतर भारतीय संस्कृति की वह दृष्टि देखनी चाहिए, जिसने छोटे से छोटे जीवन रूप में भी पवित्रता खोजी। जिसने औषधि में उपचार देखा, घास में संस्कार देखा, मिट्टी में जीवन देखा और मृत्यु में भी प्रकृति के साथ संबंध की निरंतरता देखी। कुशा इसलिए साधारण नहीं है। वह दलदली या कठिन धरती पर उगने वाली एक छोटी-सी घास है, लेकिन उसके भीतर भारतीय दर्शन की बड़ी बात छिपी है—जीवन प्रकृति से शुरू होता है, प्रकृति के सहारे चलता है और अंततः प्रकृति में ही विलीन हो जाता है। और शायद यही कुशा का सबसे बड़ा संदेश है। वह जीवन में भी हमारे संस्कारों के साथ है और जीवन के बाद भी हमारी सांस्कृतिक स्मृति के साथ। धरती से जन्मी यह छोटी-सी घास हमें याद दिलाती है कि प्रकृति को समझना केवल पर्यावरण को समझना नहीं है; यह अपने जीवन, अपनी संस्कृति और अपने दर्शन को समझना भी है। कुशा एक घास नहीं, जीवन से मोक्ष तक चलने वाली भारतीय स्मृति की हरी रेखा है।