गरबा बचा है या सिर्फ गरबे का बाजार?

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    29-Sep-2026
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अमित राव पवार देवास युवा लेखक-साहित्यकार
 
 
 
अमित राव पवार
युवा लेखक-साहित्यकार
 
 
 
कभी गरबे के बीच दीपक जलता था और उसके चारों ओर आस्था घूमती थी।आज दीपक वही है,लेकिन सवाल यह है,क्या उसके चारों ओर अब भी भक्ति घूम रही है,या प्रदर्शन? नवरात्रि आते ही शहरों की रातें रंगीन हो जाती हैं। चकाचौंध करती रोशनी, विशाल मंच,ऊँची आवाज में बजता संगीत,आकर्षक परिधान और हजारों की भीड़ सब मिलकर ऐसा दृश्य रचते हैं,जिसे देखकर लगता है कि गरबा पहले से कहीं अधिक भव्य हो गया है। लेकिन भव्यता और गरिमा एक ही चीज नहीं होती। गरबा बड़ा हुआ है या सिर्फ उसका बाजार बड़ा हुआ है? यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि गरबा हमारी संस्कृति में केवल नृत्य नहीं रहा। वह माँ शक्ति की आराधना रहा है। वह सामूहिकता का उत्सव है। वह अवसर रहा है जब उम्र और सामाजिक दूरी की दीवारें कुछ समय के लिए छोटी पड़ जाती थीं।
 
 
दीपक के चारों ओर घूमते कदम जीवन के उस चक्र का प्रतीक है,जिसके केंद्र में शक्ति और चेतना है। गरबा हमें सिखाता है कि जीवन कितना भी बदल जाए,मनुष्य को अपने मूल और अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए।लेकिन आज कहीं-कहीं तस्वीर बदलती दिखाई देती है। गरबा भक्ति से ज्यादा प्रदर्शन,संस्कृति से ज्यादा बाजार और सामूहिक आराधना से ज्यादा व्यक्तिगत आकर्षण का मंच बनता दिखाई दे रहा है। जब नृत्य से ज्यादा कैमरा महत्वपूर्ण हो जाए,जब आराधना से ज्यादा सोशल मीडिया पर दिखाई देना जरूरी लगने लगे,जब संस्कृति से अधिक फैशन चर्चा का विषय बन जाए और जब धार्मिक आयोजन भी ‘इवेंट’ की भाषा में परिभाषित होने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या हम गरबा खेल रहे हैं,या गरबे के नाम पर अपना प्रदर्शन कर रहे हैं?
 
 
आज की Gen Z डिजिटल दुनिया में पली-बढ़ी पीढ़ी है। उसके लिए उत्सव केवल मैदान में नहीं,मोबाइल की स्क्रीन पर भी दर्ज होता है। तस्वीरें और रील बनाना अपने आप में गलत नहीं,लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उत्सव को जी रहे हैं या केवल उसे कैमरे के लिए रिकॉर्ड कर रहे हैं? नई पीढ़ी को संस्कृति से दूर करने के बजाय उसे यह समझाना होगा कि सोशल मीडिया पर एक रात की वायरल रील से कहीं अधिक मूल्यवान वह परंपरा है,जो पीढ़ियों तक जीवित रहती है। यहाँ आधुनिकता को कटघरे में खड़ा करना उद्देश्य नहीं है। समय बदलता है और परंपराएँ भी बदलती हैं। नई पीढ़ी नए संगीत और नए अंदाज के साथ उत्सव मनाए, इसमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन प्रश्न तब जन्म लेता है,जब बदलाव के साथ मूल भावना ही पीछे छूटने लगे।आधुनिक होना और अपनी जड़ों से कट जाना दो अलग बातें हैं। पहनावा व्यक्ति की पसंद है संगीत अभिव्यक्ति का माध्यम है उत्सव मनाने का तरीका भी समय के साथ बदल सकता है। लेकिन यदि आयोजन नवरात्रि और माँ शक्ति की आराधना के नाम पर है,तो उसमें श्रद्धा,गरिमा और सांस्कृतिक चेतना के लिए भी स्थान होना चाहिए।आयोजकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। नवरात्रि को केवल भीड़,प्रायोजन,टिकट और मनोरंजन का विशाल बाजार बना देना आसान है,किंतु उसके भीतर संस्कृति की लौ जलाए रखना कठिन है। मंच कितना भी बड़ा हो,संस्कृति उससे बड़ी रहनी चाहिए।
 
 
युवाओं को रोकना समाधान नहीं है उन्हें जोड़ना समाधान है। उन्हें यह बताना होगा कि संस्कृति कोई पुरानी किताब नहीं,जिसे अलमारी में बंद कर दिया जाए। संस्कृति वह स्मृति है,जो हमें बताती है कि हम कौन हैं और हमारी पहचान की जड़ें कहाँ हैं। आने वाली पीढ़ी को केवल यह मत सिखाइए कि "गरबे के कदम कैसे मिलाने हैं। उसे यह भी बताइए कि उन कदमों के केंद्र में जलता दीपक क्या कहता है।" क्योंकि जिस दिन गरबे में ताल होगी,लेकिन भक्ति नहीं,रोशनी होगी,लेकिन संस्कृति नहीं,भीड़ होगी,लेकिन सामूहिक चेतना नहीं उस दिन प्रश्न केवल गरबे पर नहीं,हमारी सांस्कृतिक समझ पर भी होगा। हमें गरबा रोकना नहीं है। हमें आधुनिकता से डरना नहीं है। हमें उत्सव की भव्यता कम नहीं करनी है लेकिन हमें यह अवश्य तय करना है कि चमक बढ़े तो बढ़े,पर संस्कृति धुंधली न हो। संगीत बदले तो बदले,पर आस्था दबे नहीं। कदम नए हों तो हों,लेकिन उनका संबंध उस दीपक से बना रहे,जिसके चारों ओर गरबे की परंपरा सदियों से घूमती आई है। क्योंकि गरबा केवल पैरों की थिरकन नहीं पीढ़ियों की स्मृति है और यदि उस स्मृति से भक्ति निकल गई,तो हमारे पास गरबा नहीं,केवल एक चमकदार आयोजन बच जाएगा। इस नवरात्रि एक प्रश्न अपने भीतर अवश्य जगाइए गरबा हम कर रहे हैं, या गरबा हमें अपनी जड़ों से दूर कर रहा है? गरबा वही सार्थक है,जहाँ उत्सव में उल्लास हो,थिरकन में अनुशासन हो,प्रकाश में संस्कृति हो और हर कदम के केंद्र में "माँ शक्ति के प्रति श्रद्धा हो"।क्योंकि गरबे की वास्विक पहचान उसकी चकाचौंध में नहीं,उसकी आत्मा में है।