डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है। भारत एक ऐसी सभ्यतागत चेतना है, जिसने हजारों वर्षों से विविधताओं को अपने भीतर समाहित करते हुए एकात्मता का दर्शन विकसित किया है। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, अनेक पंथ और परंपराएँ हैं, अनेक जातीय एवं सामाजिक समूह हैं, लेकिन इन विविधताओं के बीच एक गहरी सांस्कृतिक निरंतरता दिखाई देती है।
इसी संदर्भ में प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाए जाने वाले ‘विश्व आदिवासी/मूलनिवासी दिवस’ के विमर्श को भारत की अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है।
संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त को International Day of the World's Indigenous Peoples के रूप में मान्यता दी है। विश्व के उन समाजों के अधिकारों, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों पर ध्यान आकर्षित करना इसका घोषित उद्देश्य है, जिन्होंने औपनिवेशिक विस्तार, विस्थापन और भेदभाव का सामना किया। इस वैश्विक संदर्भ की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या कनाडा के औपनिवेशिक अनुभव को उसी वैचारिक ढाँचे में भारत पर भी लागू किया जा सकता है?
यहीं से भारत के लिए एक गंभीर वैचारिक बहस शुरू होती है।
भारत को पश्चिमी ‘Indigenous versus Settler’ मॉडल से क्यों नहीं समझा जा सकता?
पश्चिमी इतिहास में ‘Indigenous’ और ‘Settler’ की अवधारणा का विकास विशिष्ट औपनिवेशिक परिस्थितियों में हुआ। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में यूरोपीय उपनिवेशवाद ने स्थानीय समाजों के विस्थापन, भूमि-अधिग्रहण और सांस्कृतिक दमन की जटिल ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ पैदा कीं।
भारत का सभ्यतागत विकास इस मॉडल से अलग रहा है।
भारत में नगर, ग्राम और वन—तीनों जीवन-क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। वन में रहने वाले समुदायों को किसी विदेशी ‘settler society’ की तरह नहीं देखा गया। भारतीय परंपरा में वनवासी, ग्रामवासी और नगरवासी—सभी व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहे हैं।
इसलिए भारत को समझने के लिए ‘मूल निवासी बनाम बाहरी’ की दो ध्रुवीय श्रेणी पर्याप्त नहीं है।
भारत का अनुभव अधिक सही रूप में ‘विविधता में एकात्मता’ का अनुभव है।
औपनिवेशिक दृष्टि ने भारतीय समाज को श्रेणियों में बाँटकर देखा
ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय समाज को समझने और प्रशासित करने के लिए अनेक प्रकार की जातीय, नस्लीय, धार्मिक और सामाजिक श्रेणियाँ बनाई गईं।
औपनिवेशिक प्रशासन की जनगणना व्यवस्था ने समाज को कठोर वर्गों में वर्गीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूरोपीय नस्लीय सिद्धांतों और उस समय के मानवशास्त्रीय विचारों ने भारतीय समाज की व्याख्या को भी प्रभावित किया।
इसी दौर में आर्य-द्रविड़ जैसे सिद्धांतों की विभिन्न व्याख्याएँ सामने आईं और भारतीय समाज को अलग-अलग नस्ली समूहों में देखने की प्रवृत्ति मजबूत हुई।
आज आर्य आक्रमण सिद्धांत का पारंपरिक, सरल रूप व्यापक अकादमिक बहस का विषय है और पुरातत्व, भाषाविज्ञान तथा आनुवंशिकी ने इस प्रश्न को कहीं अधिक जटिल बना दिया है।
इसलिए भारत के इतिहास को किसी एक सरल ‘बाहरी आक्रमणकारी बनाम मूल निवासी’ सूत्र में बाँध देना इतिहास के साथ न्याय नहीं करता।
‘मूल निवासी’ की राजनीति : पहचान से विभाजन तक
समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी वैश्विक अवधारणा को भारत में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि जनजातीय समाज को शेष भारतीय समाज से अलग और विरोधी पहचान के रूप में देखने की प्रवृत्ति विकसित हो।
यदि जनजातीय समाज से कहा जाए कि—
“आप ही इस भूमि के वास्तविक मालिक हैं और बाकी समाज बाहरी है,”
तो यह प्रश्न उठता है कि इससे सामाजिक एकात्मता मजबूत होगी या विभाजन?
भारत के जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान, परंपराओं, भाषाओं और अधिकारों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन पहचान के संरक्षण का अर्थ यह नहीं हो सकता कि उसके आधार पर भारत की सभ्यतागत एकता को ही नकार दिया जाए।
अस्मिता का संरक्षण और राष्ट्र की एकात्मता—दोनों एक साथ संभव हैं।
यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल आग्रह है।
वामपंथी विमर्श की आलोचना : वर्ग-संघर्ष से पहचान-संघर्ष तक
भारतीय वामपंथी विमर्श पर लंबे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि उसने भारतीय समाज को वर्ग, जाति, नस्ल और पहचान के संघर्षों के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।
यहाँ आलोचना का विषय किसी व्यक्ति या संगठन को ‘देशद्रोही’ कहना नहीं, बल्कि एक वैचारिक पद्धति को समझना होना चाहिए।
जब किसी समाज को लगातार—
शोषक बनाम शोषित,
बाहरी बनाम मूल निवासी,
सवर्ण बनाम आदिवासी,
नगर बनाम वन,
परंपरा बनाम आधुनिकता
जैसी स्थायी संघर्ष-रेखाओं में प्रस्तुत किया जाता है, तब समाज की साझा सांस्कृतिक स्मृति कमजोर हो सकती है।
भारत की राष्ट्रवादी दृष्टि इस संघर्ष-आधारित मॉडल के स्थान पर समरसता, संवाद और एकात्मता को प्राथमिकता देती है।
जनजातीय समाज को ‘अलग राष्ट्र’ नहीं, राष्ट्र की जीवंत शक्ति के रूप में देखिए
भारत के जनजातीय समाज को केवल गरीबी, पिछड़ेपन, शोषण और पीड़ित पहचान के चश्मे से देखना भी एक प्रकार का अन्याय है।
जनजातीय समाज केवल ‘वंचित समुदाय’ नहीं है।
वह—
जल-जंगल-जमीन की पारंपरिक समझ का संरक्षक है।
लोकज्ञान का संवाहक है।
प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की जीवनशैली का प्रतिनिधि है।
भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का योद्धा है।
और भारतीय सांस्कृतिक विविधता का महत्वपूर्ण आधार है।
इसलिए जनजातीय समाज के प्रति राष्ट्रवादी दृष्टिकोण दया का नहीं, सम्मान और सहभागिता का दृष्टिकोण होना चाहिए।
रामायण से लेकर लोकपरंपराओं तक : वन और जनजातीय समाज का सम्मान
भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में वन केवल ‘जंगल’ नहीं है।
वन तपस्या की भूमि है।
वन ज्ञान की भूमि है।
वन साधना की भूमि है।
वन संस्कृति की भूमि है।
रामायण में निषादराज गुह और भगवान श्रीराम का संबंध सामाजिक आत्मीयता का प्रतीक है। माता शबरी की भक्ति भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में आज भी श्रद्धा के साथ स्मरण की जाती है।
इन प्रसंगों को आधुनिक जातीय या राजनीतिक श्रेणियों में mechanically फिट करने के बजाय यह समझना अधिक महत्वपूर्ण है कि भारतीय परंपरा ने वनवासी समाज को अपने सांस्कृतिक आख्यान से बाहर नहीं रखा।
यही भारतीय एकात्मता की विशेषता है।
एकलव्य, घटोत्कच और वन-संस्कृति : भारतीय स्मृति के अभिन्न पात्र
महाभारत के एकलव्य और घटोत्कच जैसे पात्र भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में आज भी जीवित हैं
इन पात्रों की कथाओं की आधुनिक व्याख्याएँ अलग-अलग हो सकती हैं। लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारतीय महाकाव्य परंपरा में वन और वन्य समुदायों से जुड़े पात्र किसी ‘विदेशी’ सभ्यता के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत नहीं किए गए।
वे भारतीय कथा-संसार का हिस्सा हैं।
यही कारण है कि भारत में जनजातीय अस्मिता को भारतीयता के विरोध में खड़ा करना इतिहास और संस्कृति दोनों के साथ सरलीकरण होगा।
विदेशी सत्ता के विरुद्ध जनजातीय समाज का संघर्ष
भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या लखनऊ की राजनीतिक गतिविधियों का इतिहास नहीं है।
भारत के जंगलों और पहाड़ियों में भी विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष हुआ।
तिलका मांझी, सिद्धू-कान्हू, बिरसा मुंडा, रानी दुर्गावती, तांत्या भील, गुण्डाधुर, अल्लूरी सीताराम राजू, जतरा भगत और अनेक अन्य जननायकों ने विदेशी सत्ता को चुनौती दी।
इनका योगदान केवल ‘आदिवासी इतिहास’ की अलग पुस्तक में सीमित नहीं किया जा सकता।
ये भारत के राष्ट्रीय इतिहास के नायक हैं।
बिरसा मुंडा केवल जनजातीय नायक नहीं—भारतीय स्वतंत्रता चेतना के महान प्रतीक हैं।
इसीलिए भारत सरकार द्वारा 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का निर्णय महत्वपूर्ण है। यह दिन जनजातीय समाज को राष्ट्रीय स्मृति के केंद्र में सम्मानपूर्वक स्थापित करता है।
15 नवंबर : विभाजन नहीं, गौरव और सहभागिता का राष्ट्रीय पर्व
15 नवंबर भगवान बिरसा मुंडा की जयंती है।
बिरसा मुंडा का जीवन जनजातीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक चेतना और औपनिवेशिक सत्ता के प्रतिरोध का प्रतीक है।
‘जनजातीय गौरव दिवस’ का महत्व इसी में है कि यह जनजातीय समाज को किसी अलगाववादी पहचान में नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय इतिहास के गौरवपूर्ण अध्याय के रूप में स्थापित करता है।
यह दृष्टि कहती है—
जनजातीय समाज भारत का हिस्सा नहीं मात्र है; भारत की आत्मा को समृद्ध करने वाला महत्वपूर्ण अंग है।
‘जल, जंगल और जमीन’ का अधिकार और राष्ट्रवाद
राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का अर्थ यह नहीं कि जनजातीय समाज के वास्तविक अधिकारों की उपेक्षा की जाए।
भूमि अधिकार, वन अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्थानीय स्वशासन, संस्कृति और भाषा—ये सभी वास्तविक प्रश्न हैं।
अनुसूचित क्षेत्रों में संविधान की पाँचवीं अनुसूची, PESA और वन अधिकार कानून जैसे प्रावधान जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।
एक ओर वह दृष्टिकोण जो जनजातीय समाज की विशिष्ट समस्याओं को नकार देता है।
दूसरी ओर वह राजनीति जो हर समस्या को ‘भारत बनाम आदिवासी’ के संघर्ष में बदल देती है।
राष्ट्रवादी समाधान है—
अधिकार भी, सम्मान भी; विकास भी, संस्कृति भी; आत्मनिर्भरता भी, राष्ट्रीय एकात्मता भी।
मिशनरी गतिविधियों पर भी हो गंभीर और तथ्याधारित विमर्श
जनजातीय क्षेत्रों में धर्मांतरण और मिशनरी गतिविधियों का प्रश्न भी भारत में लंबे समय से बहस का विषय रहा है।
इस विषय पर भावनात्मक आरोपों के बजाय तथ्य, कानून और स्थानीय अनुभवों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए।
किसी भी धार्मिक समुदाय या संस्था के प्रति सामूहिक आरोप उचित नहीं होगा। लेकिन यदि कहीं प्रलोभन, दबाव, धोखे या गैरकानूनी साधनों से धर्मांतरण होता है, तो कानून के अनुसार उसकी जांच और कार्रवाई आवश्यक है।
जनजातीय समाज की धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए उसकी सांस्कृतिक स्वतंत्रता और सामाजिक अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।
विज्ञान हमें क्या बताता है?
भारतीय जनसंख्या के आनुवंशिक इतिहास पर अनेक अध्ययन हुए हैं। इन अध्ययनों ने भारतीय आबादी की अत्यंत जटिल और दीर्घकालिक जनसंख्या-इतिहास को सामने रखा है।
इसलिए यह कहना कि भारत की सभी आबादियाँ बिल्कुल एक जैसी आनुवंशिक हैं, या यह कि कोई भी समूह कभी कहीं से नहीं आया, वैज्ञानिक रूप से अत्यधिक सरलीकृत निष्कर्ष होगा।
वास्तविक वैज्ञानिक तस्वीर कहीं अधिक जटिल है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट है—
आनुवंशिकी को आधुनिक राजनीतिक पहचान की कठोर दीवारें बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
भारत की सभ्यता को केवल DNA की श्रेणियों से समझना संभव नहीं है।
सभ्यता केवल रक्त से नहीं बनती।
सभ्यता बनती है—
स्मृति से, संस्कृति से, भाषा से, परंपरा से, सह-अस्तित्व से और साझा इतिहास से।
भारत की राष्ट्र-कल्पना रक्त और नस्ल पर नहीं, सांस्कृतिक एकात्मता पर आधारित है
भारत का राष्ट्रवाद पश्चिमी नस्लीय राष्ट्रवाद जैसा नहीं है।
भारत में राष्ट्र की अवधारणा केवल एक भाषा, एक नस्ल या एक धार्मिक पंथ पर आधारित नहीं रही।
भारत की राष्ट्रीय चेतना का आधार व्यापक सांस्कृतिक एकात्मता है।
यही कारण है कि कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक तीर्थ, महाकाव्य, पुराण, लोककथाएँ, संत परंपराएँ और सांस्कृतिक स्मृतियाँ एक-दूसरे से संवाद करती रही हैं।
जनजातीय समाज भी इसी विराट सांस्कृतिक संवाद का हिस्सा रहा है।
जनजातीय समाज को ‘वोट बैंक’ नहीं, राष्ट्रशक्ति के रूप में देखना होगा
आज आवश्यकता है कि जनजातीय समाज को राजनीतिक दलों के लिए केवल चुनावी वोट बैंक के रूप में देखने की प्रवृत्ति समाप्त हो।
जनजातीय युवाओं को—
उच्च शिक्षा,
कौशल विकास,
उद्यमिता,
रोजगार,
डिजिटल शिक्षा,
स्वास्थ्य सुविधाएँ
और आधुनिक अवसर
मिलने चाहिए।
साथ ही उनकी मातृभाषाओं, लोककला, परंपरागत ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी होना चाहिए।
यह ‘विकास बनाम संस्कृति’ नहीं, बल्कि ‘विकास के साथ संस्कृति’ का मॉडल होना चाहिए।
9 अगस्त को भारत में मनाए जाने वाले विमर्श को लेकर हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट होना चाहिए।
हम विश्व के उन समाजों के अधिकारों और सम्मान का विरोध नहीं करते जिन्होंने औपनिवेशिक शोषण और विस्थापन झेला है।
लेकिन भारत को उसकी अपनी सभ्यतागत परिस्थितियों में समझना होगा।
भारत में यदि ‘Indigenous’ शब्द का प्रयोग किया जाए, तो उसके अर्थ और ऐतिहासिक संदर्भ पर गंभीर अकादमिक विमर्श आवश्यक है।
किसी वैश्विक राजनीतिक शब्दावली को ज्यों का त्यों भारत पर आरोपित करके ‘मूल निवासी बनाम बाहरी’ की स्थायी संघर्ष-रेखा खींचना भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं को सरल बनाना होगा।
असली प्रश्न : विभाजन की राजनीति या एकात्मता का राष्ट्रवाद?
आज भारत के सामने मूल प्रश्न यह नहीं है कि कौन ‘मूल’ है और कौन ‘बाहरी’।
मूल प्रश्न है—
क्या हम अपनी विविधताओं को संघर्ष में बदलेंगे या शक्ति में?
क्या जनजातीय समाज को अलगाव की राजनीति में धकेलेंगे या राष्ट्रीय विकास का नेतृत्वकर्ता बनाएँगे?
क्या उसकी संस्कृति को संग्रहालय में रखेंगे या आधुनिक भारत की विकास यात्रा से जोड़ेंगे?
क्या उसके युवाओं को पीड़ित पहचान देंगे या अवसर, शिक्षा और आत्मविश्वास देंगे?
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का उत्तर स्पष्ट है—
जनजातीय समाज को अलग मत करो; सम्मान के साथ जोड़ो।
उसकी पहचान मिटाओ मत; उसे भारतीयता की व्यापक चेतना में प्रतिष्ठित करो।
उसके अधिकार छीनो मत; उसे अधिकारों के साथ अवसर दो।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, लेकिन उससे भी बड़ी शक्ति उसकी विविधताओं को जोड़ने वाली सांस्कृतिक चेतना में है।
यदि ‘मूल निवासी’ शब्द भारत में किसी समुदाय के अधिकार, संस्कृति और सम्मान की रक्षा के लिए प्रयोग होता है, तो उस पर संवाद होना चाहिए।
लेकिन यदि इसी शब्दावली को इस रूप में इस्तेमाल किया जाए कि एक भारतीय दूसरे भारतीय को ‘बाहरी’ कहने लगे, तो यह भारत की सामाजिक एकात्मता के लिए गंभीर चुनौती होगी।
भारत का जनजातीय समाज किसी विदेशी अवधारणा से अपनी पहचान पाने का मोहताज नहीं है।
उसके पास अपनी गौरवशाली परंपरा है।
उसके पास बिरसा मुंडा हैं।
उसके पास रानी दुर्गावती हैं।
उसके पास तांत्या भील हैं।
उसके पास सिद्धू-कान्हू हैं।
उसके पास गुण्डाधुर हैं।
उसके पास असंख्य अनाम बलिदानी हैं।
और सबसे बढ़कर उसके पास भारत की साझा सभ्यतागत स्मृति है।
इसलिए 9 अगस्त को भारत में बहस का विषय यह नहीं होना चाहिए कि कौन ‘मूल’ और कौन ‘बाहरी’ है।
बहस का विषय होना चाहिए—
जनजातीय समाज के अधिकार कैसे मजबूत हों?
उसकी संस्कृति कैसे सुरक्षित रहे?
उसके युवाओं को अवसर कैसे मिलें?
और भारत की सांस्कृतिक एकात्मता कैसे और मजबूत हो?
15 नवंबर का जनजातीय गौरव दिवस इसी दिशा में एक सकारात्मक राष्ट्रीय प्रतीक बन सकता है—जहाँ जनजातीय समाज को ‘अलग’ नहीं, बल्कि राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास के अग्रदूतों और वर्तमान भारत के समान भागीदारों के रूप में सम्मान मिले।
भारत की सनातन चेतना का संदेश विभाजन नहीं, समरसता है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस व्यापक दृष्टि का प्रतीक है जिसमें विविधता के भीतर एकता और भिन्नताओं के भीतर आत्मीयता देखी जाती है।
आज आवश्यकता है कि भारत अपने इतिहास को किसी आयातित संघर्ष-फ्रेम में नहीं, बल्कि अपनी सभ्यतागत दृष्टि से पढ़े।
न मूल बनाम बाहरी,
न वनवासी बनाम नगरवासी,
न जनजातीय बनाम गैर-जनजातीय—
बल्कि—
एक भारत, अनेक परंपराएँ और एक साझा सांस्कृतिक चेतना।
यही भारत की शक्ति है।
यही उसकी राष्ट्रीय एकात्मता है।
और यही उसके भविष्य का मार्ग भी।