डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार
‘हिजाब’ को लेकर देश में चल रही संवैधानिक, धार्मिक और शैक्षणिक बहस एक बार फिर न्यायालय के दरवाजे तक पहुंची। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रयागराज की एक नाबालिग मुस्लिम छात्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह स्थापित हो कि हिजाब पहनना इस्लाम की ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जिसके बिना धार्मिक आस्था का मूल स्वरूप प्रभावित होता है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी शैक्षणिक संस्थान की ड्रेस नीति समान, वास्तविक, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन व संस्थागत पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से बनाई गई है तो निर्धारित यूनिफॉर्म में बदलाव की मांग को अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दरअसल, न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ के समक्ष यह मामला सुकैना रिजवी नाम की छात्रा की ओर से आया। प्रयागराज के अत्तरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाली सुकैना ने कक्षा 10 की पढ़ाई पूरी करने के बाद कक्षा 11 में प्रवेश के लिए आवेदन किया था। उसने अपनी मां के माध्यम से उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करते हुए मांग की कि उसे विद्यालय की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए।
याचिका में कहा गया कि छात्रा कक्षा छह से कक्षा 10 तक इसी विद्यालय में पढ़ी है और इस अवधि में वह हिजाब पहनती रही। उसके अनुसार पहले विद्यालय की ओर से इस पर आपत्ति नहीं की गई। कक्षा 11 में प्रवेश के समय स्थिति बदल गई और हिजाब के साथ विद्यालय की यूनिफॉर्म पहनने की उसकी मांग को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि सिर पर स्कार्फ पहनना उसके धर्म का आवश्यक धार्मिक अभ्यास है। उसे ऐसा करने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
विद्यालय की ओर से इस दावे का विरोध किया गया। विद्यालय ने स्वयं को सीबीएसई से संबद्ध निजी, गैर-सहायता प्राप्त और सह-शिक्षा संस्थान बताते हुए कहा कि सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू है। विद्यालय प्रशासन का कहना था कि उसी धार्मिक समुदाय की दूसरी छात्राएं भी निर्धारित ड्रेस कोड का पालन कर रही हैं। एक छात्रा को अलग छूट देने से विद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था और अनुशासन प्रभावित हो सकता है।
राज्य की ओर से भी न्यायालय को बताया गया कि विद्यालय की यूनिफॉर्म तय करना मूल रूप से संस्थान की प्रशासनिक नीति का विषय है। ड्रेस कोड का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच एकरूपता, अनुशासन और संस्थागत पहचान बनाए रखना है।
पुरानी अनुमति से स्थायी अधिकार नहीं बनता
न्यायालय ने छात्रा के इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि उसने पहले की कक्षाओं में हिजाब पहना था और इसलिए उसे आगे भी इसे पहनने का अधिकार मिल गया। पीठ ने कहा कि संभव है कि विद्यालय ने पिछली कक्षाओं में सिर पर स्कार्फ पहनने पर किसी कारण से आपत्ति नहीं की हो। इसके पीछे वर्दी नीति को कठोरता से लागू न करना, प्रशासनिक निष्क्रियता, शिष्टाचार या किसी अन्य परिस्थिति जैसे कारण हो सकते हैं। इससे विद्यालय भविष्य में अपनी ड्रेस नीति को लागू करने से प्रतिबंधित नहीं हो जाता।
न्यायालय के अनुसार किसी नीति को पहले कठोरता से लागू नहीं किया गया हो तो इससे विद्यार्थी के पक्ष में ऐसा स्थायी अधिकार उत्पन्न नहीं होता, जिसके आधार पर संस्था को आगे भी उसी व्यवस्था को जारी रखने के लिए बाध्य किया जा सके।
विद्यालय ने यूनिफॉर्म बदली नहीं, उसमें अतिरिक्त परिधान जोड़ने की मांग थी
मामले में न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण अंतर रेखांकित किया। विद्यालय ने अपनी निर्धारित यूनिफॉर्म में कोई नया बदलाव नहीं किया था। विवाद इस बात पर था कि छात्रा मौजूदा यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनना चाहती थी। पीठ ने कहा कि जब ड्रेस कोड समान, वास्तविक, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन तथा संस्थागत पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से हो तो निर्धारित यूनिफॉर्म का चयन मुख्य रूप से विद्यालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इस दृष्टिकोण के पीछे न्यायालय ने यूनिफॉर्म के व्यापक उद्देश्य को भी समझाया। उसके अनुसार एक समान पोशाक विद्यार्थियों के बीच समानता की भावना पैदा करती है, संस्थान की पहचान को मजबूत करती है, अनुशासन बनाए रखने में सहायता करती है और कक्षा के भीतर अलग-अलग आधारों पर भेदभाव की संभावनाओं को कम करती है।
धर्म-तटस्थ वातावरण का तर्क
पीठ ने कहा कि अलग-अलग धर्मों से आने वाले विद्यार्थियों पर एक समान ड्रेस कोड लागू होने से विद्यालय में धर्म-तटस्थ वातावरण को बढ़ावा मिलता है। इस व्यवस्था में विद्यार्थियों की धार्मिक पहचान के आधार पर अलग-अलग पोशाक संबंधी नियम बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। न्यायालय के सामने मूल प्रश्न यह भी था कि क्या धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के आधार पर कोई विद्यार्थी ऐसी पोशाक की मांग कर सकता है जो संस्थान की निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग हो। पीठ ने इस प्रश्न का उत्तर विद्यालय की समान ड्रेस नीति और उसके उद्देश्य के संदर्भ में दिया।
न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्तिगत विद्यार्थी को व्यक्तिपरक आधार पर निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग होने की अनुमति देना स्वयं यूनिफॉर्म की अवधारणा को कमजोर कर सकता है। इससे अनुशासन तय करने का अधिकार संस्थान से हटकर व्यक्तिगत विद्यार्थियों के पास जाने की स्थिति पैदा हो सकती है।
हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा साबित करने में असफल रही याचिकाकर्ता
मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हिजाब के धार्मिक स्वरूप से जुड़ा था। याचिकाकर्ता का दावा था कि सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम में आवश्यक धार्मिक अभ्यास है। पीठ ने इस दावे के समर्थन में पर्याप्त सामग्री नहीं पाई। न्यायालय के अनुसार याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा पर्याप्त तर्क या आधिकारिक धार्मिक साहित्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह प्रमाणित हो कि कक्षा के भीतर सिर पर स्कार्फ पहनना उसके लिए अनिवार्य है या इसके पालन के अभाव में उसके धर्म का मूल स्वरूप बदल जाएगा।
न्यायालय ने इस दावे को पर्याप्त प्रमाण के अभाव में महज दावा माना। इसी बिंदु ने मामले को महज विद्यालय की ड्रेस नीति से जुड़े विवाद से आगे बढ़ाकर धार्मिक स्वतंत्रता और आवश्यक धार्मिक प्रथा की संवैधानिक कसौटी से जोड़ दिया।
दूसरे उच्च न्यायालयों के फैसलों का भी लिया सहारा
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस विषय पर देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों पर विचार किया। पीठ ने कहा कि जहां भी यह प्रश्न सामने आया है, वहां उच्च न्यायालयों की राय इस दिशा में रही है कि महिलाओं के लिए सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लामी आस्था की ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है, जिसके अभाव में धार्मिक आस्था संकट में पड़ जाए।
पीठ ने केरल उच्च न्यायालय के फातिमा थसनीम (नाबालिग) बनाम केरल राज्य मामले और बॉम्बे उच्च न्यायालय के फातिमा हुसैन सैयद बनाम भारत एजुकेशन सोसाइटी मामले का भी उल्लेख किया। दोनों मामलों में निर्धारित विद्यालयी यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ पहनने की मांग से संबंधित प्रश्न सामने आया था। इन फैसलों के साथ न्यायालय ने कर्नाटक उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के रेशम बनाम कर्नाटक राज्य मामले में दिए गए फैसले पर भी विस्तार से विचार किया।
कर्नाटक के 2022 के फैसले को बताया महत्वपूर्ण
कर्नाटक उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने वर्ष 2022 में हिजाब विवाद पर फैसला देते हुए माना था कि मुस्लिम महिलाओं द्वारा हिजाब पहनना इस्लाम में आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस फैसले को अत्यंत मूल्यवान प्रेरक प्राधिकार माना। पीठ ने स्पष्ट किया कि उसे कर्नाटक पूर्ण पीठ के दृष्टिकोण से अलग रुख अपनाने का कोई कारण नहीं दिखाई देता। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिजाब विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय में भी इसी प्रश्न से संबंधित सुनवाई हो चुकी है और वहां स्थिति पूरी तरह अंतिम रूप से स्पष्ट नहीं हुई है।
सर्वोच्च न्यायालय में आया था विभाजित फैसला
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा मानने या न मानने के प्रश्न को अंतिम रूप से सुलझाने वाला सर्वोच्च न्यायालय का कोई आधिकारिक फैसला अभी सामने नहीं आया है। कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले पर बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐशात शिफा (हिजाब केस-2 जे.) बनाम कर्नाटक राज्य मामले में विचार किया था। वहां न्यायाधीशों के बीच मतभेद के कारण विभाजित फैसला आया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि इस स्थिति में मामले को उचित पीठ के गठन के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाना आवश्यक है। इसके चलते सर्वोच्च न्यायालय की ओर से इस प्रश्न पर अंतिम और निर्णायक स्थिति अभी सामने आना शेष है, फिर भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में कर्नाटक उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ का फैसला उसके लिए अत्यंत मूल्यवान प्रेरक प्राधिकार है और उससे अलग दृष्टिकोण अपनाने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है।
अंतरिम आदेश को बाध्यकारी मिसाल नहीं माना
पीठ ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के वर्ष 2024 के ज़ैनब अब्दुल कय्यूम चौधरी और अन्य बनाम एनजी आचार्य एवं डीके मराठे कॉलेज तथा अन्य मामले का भी उल्लेख किया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने हिजाब, टोपी या बैज पर प्रतिबंध लगाने वाले एक प्रावधान के संबंध में अंतरिम आदेश के माध्यम से रोक लगाई थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना कारण बताए दिया गया अंतरिम आदेश बाध्यकारी मिसाल नहीं बनता और उसकी प्रकृति अस्थायी होती है।
पीठ के अनुसार देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों से सामने आने वाली सुसंगत और तर्कसंगत न्यायिक राय को उचित महत्व दिया जा सकता है, भले ही वह बाध्यकारी न होकर प्रेरक प्राधिकार के रूप में हो।
तस्वीरों ने भी अदालत के सामने रखी अलग तस्वीर
मामले की सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड में रखी गई तस्वीरों पर भी न्यायालय की नजर गई। पीठ ने गौर किया कि याचिकाकर्ता के अतिरिक्त उसी धार्मिक समुदाय से संबंधित छात्राओं सहित कोई अन्य छात्रा सिर पर स्कार्फ पहने हुए दिखाई नहीं दे रही थी। न्यायालय के लिए यह तथ्य भी महत्वपूर्ण था कि विद्यालय में समान ड्रेस कोड लागू था और अन्य छात्राएं उसका पालन कर रही थीं। ऐसे में किसी एक विद्यार्थी को धार्मिक आधार पर अलग पोशाक की अनुमति देने का प्रश्न व्यापक संस्थागत व्यवस्था से जुड़ गया।
यूनिफॉर्म की अवधारणा पर न्यायालय की स्पष्ट टिप्पणी
पीठ ने कहा कि यदि प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी व्यक्तिगत पसंद या व्यक्तिगत व्याख्या के आधार पर निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग होने की अनुमति दी जाने लगे तो यूनिफॉर्म का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा। न्यायालय के अनुसार विद्यालयों में यूनिफॉर्म का उद्देश्य विद्यार्थियों को एक समान रूप देना भर नहीं है। इसके पीछे अनुशासन, समानता, संस्थागत पहचान और विद्यार्थियों के बीच भेदभाव को कम करने जैसे व्यापक उद्देश्य भी जुड़े हैं।
इस दृष्टि से न्यायालय ने व्यक्तिगत धार्मिक दावे और संस्थान की समान ड्रेस नीति के बीच संतुलन का प्रश्न उठाया और कहा कि समान रूप से लागू होने वाली गैर-भेदभावपूर्ण ड्रेस नीति को महज व्यक्तिगत पसंद के आधार पर बदलने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
अंततः खारिज हुई याचिका
सभी पक्षों के तर्क, पूर्ववर्ती न्यायिक फैसलों और धार्मिक अभ्यास से संबंधित दावों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सुकैना रिजवी की याचिका खारिज कर दी। इस फैसले में दो स्तरों पर न्यायालय की दृष्टि सामने आती है। पहला, विद्यालय की ऐसी समान और गैर-भेदभावपूर्ण ड्रेस नीति, जिसका उद्देश्य अनुशासन एवं संस्थागत पहचान बनाए रखना है, उसके पालन की अपेक्षा विद्यार्थियों से की जा सकती है। दूसरा, हिजाब को आवश्यक धार्मिक प्रथा के रूप में स्थापित करने के लिए पर्याप्त धार्मिक और कानूनी सामग्री प्रस्तुत करना आवश्यक है। (केस : सुकैना रिजवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य-2026)।