राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस विशेषआर्यभट्ट से चंद्रयान तक भारत की खगोलीय ज्ञान परंपरा

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    22-Aug-2026
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राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस विशेष
 
 
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता
 
 
बाल्यकाल में खुले आकाश के नीचे सोते समय तारों को देखते हुए मेरे मन में जिज्ञासा प्रकट होती थी कि ये कैसे चमकते हैं, कितनी दूर हैं, क्या यहां तक मैं जा सकता हूँ, दिन रात कैसे होते हैं आदि आदि। ऐसे ही कुछ प्रश्न रात के खुले आकाश को देखकर प्राचीन मनुष्य के मन में उठे होंगे। सूर्य प्रतिदिन एक निश्चित क्रम से उदित और अस्त क्यों होता है? चंद्रमा का आकार बदलता क्यों दिखाई देता है? ऋतुएं अपने समय पर लौटती कैसे हैं? आकाश में दिखाई देने वाले असंख्य तारों और ग्रहों की गति का कोई नियम है या नहीं? इन्हीं प्रश्नों ने उस मनुष्य को आकाश की ओर देखने, उसे समझने और उसकी घटनाओं की गणना करने के लिए प्रेरित किया।
 
 
प्राचीन भारतीय चिंतन में आकाश का अध्ययन केवल धार्मिक विश्वास का विषय नहीं था। समय की गणना, ऋतुओं की पहचान, नक्षत्रों की स्थिति, सूर्य और चंद्रमा की गति तथा ग्रहण जैसी घटनाओं के निरीक्षण ने धीरे धीरे एक व्यवस्थित खगोलीय परंपरा को जन्म दिया। इस परंपरा में वेदांग ज्योतिष, सूर्य सिद्धांत, आर्यभटीय, पंचसिद्धांतिका, ब्रह्मस्फुटसिद्धांत और सिद्धांत शिरोमणि जैसे ग्रंथ महत्वपूर्ण पड़ाव बने। कई शताब्दियों बाद इसी जिज्ञासा ने आधुनिक विज्ञान, रॉकेट और उपग्रहों का रूप लिया और चंद्रमा तक पहुंचने की क्षमता विकसित की।
 
 
यह कहना उचित है कि आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान मूल में प्राचीन खगोल जिज्ञासाऔर ज्ञान रहा है। भले ही दोनों के उपकरण, पद्धतियां अलग हैं। लेकिन आकाश को जानने की जिज्ञासा और गणना पर आधारित ज्ञान की एक लंबी परंपरा अवश्य दिखाई देती है। यही इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।
 
 
छह वेदांगों में ज्योतिष का विशेष स्थान है। वेदांग ज्योतिष का प्रमुख उद्देश्य वैदिक अनुष्ठानों के लिए उचित समय का निर्धारण करना था। इसके माध्यम से सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों से संबंधित ऐसी जानकारी व्यवस्थित की गई जिससे दिन, मास, ऋतु और अन्य कालखंडों की गणना की जा सके। इस परंपरा से महर्षि लगध का नाम संबद्ध माना जाता है। हालांकि ग्रंथ के काल और लेखकत्व से जुड़े कुछ प्रश्नों पर विद्वानों में मतभेद हैं। वेदांग ज्योतिष के आरंभिक श्लोकों में समय की संरचना को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है -
 
 
पञ्चसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम्।
दिनर्त्वयनमासाङ्गं प्रणम्य शिरसा शुचिः॥
 
अर्थात यहां पांच वर्ष के युग के साथ दिन, ऋतु, अयन और मास को समय व्यवस्था के अंगों के रूप में देखा गया है। आगे कहा गया है:
 
ज्योतिषामयनं कृत्स्नं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः।
विप्राणां सम्मतं लोके यज्ञकालार्थसिद्धये॥
  
अर्थात ज्योतिष से संबंधित ज्ञान को क्रमपूर्वक प्रस्तुत किया जाएगा ताकि उचित समय का निर्धारण किया जा सके। इससे स्पष्ट होता है कि आरंभिक खगोलीय अध्ययन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य आकाशीय घटनाओं के आधार पर काल व्यवस्था को समझना था।
 
 
कृषि प्रधान समाज में इसका महत्व बहुत अधिक था। ऋतु का समय, वर्ष का विभाजन और सूर्य तथा चंद्रमा के चक्र केवल धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े विषय नहीं थे, बल्कि दैनिक जीवन और कृषि व्यवस्था के लिए भी उपयोगी थे।
 
समय के साथ खगोलीय ज्ञान अधिक गणनात्मक और व्यवस्थित होता गया। सूर्य सिद्धांत की परंपरा इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें ग्रहों की गति, समय की गणना, नक्षत्र, ग्रहण, पृथ्वी तथा आकाशीय गोल से जुड़े विषयों पर विचार मिलता है।
 
पांचवीं शताब्दी के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट इस ज्ञान परंपरा में निर्णायक स्थान रखते हैं। उनकी रचना आर्यभटीय गणित, कालगणना और खगोल विज्ञान को अत्यंत संक्षिप्त संस्कृत छंदों में प्रस्तुत करती है। पृथ्वी के घूर्णन से संबंधित उनका प्रसिद्ध श्लोक है:
 
अनुलोमगतिनौस्थः पश्यत्यचलां विलोमगाम्।
अचलानि भानि तद्वत्समपश्चिमगानि लङ्कायाम्॥
 
इसका भाव यह है कि जैसे गति करती हुई नाव में बैठा व्यक्ति किनारे की स्थिर वस्तुओं को विपरीत दिशा में गतिशील देखता है, वैसे ही पृथ्वी के घूमने के कारण आकाशीय पिंडों की गति का अनुभव होता है। आर्यभटीय के गोलपाद में यह विचार स्पष्ट रूप से मिलता है।
 
 
आर्यभट्ट का महत्व केवल पृथ्वी के घूर्णन संबंधी विचार तक सीमित नहीं है। उन्होंने ग्रहों की स्थिति और गति की गणना, समय की सूक्ष्म व्यवस्था, त्रिकोणमितीय गणनाओं और ग्रहण संबंधी गणना को व्यवस्थित गणितीय रूप दिया। उनके यहां आकाश को समझने की कोशिश अनुमान से अधिक गणना और निरीक्षण पर आधारित दिखाई देती है।
 
 
आर्यभट्ट के बाद खगोलीय चिंतन का विकास रुका नहीं। छठी शताब्दी के वराहमिहिर ने पंचसिद्धांतिका की रचना की। इस ग्रंथ का महत्व इसलिए विशेष है कि इसमें उस समय प्रचलित पांच खगोलीय सिद्धांतों का विवेचन मिलता है। इससे पता चलता है कि विद्वान केवल अपनी परंपरा के ज्ञान तक सीमित नहीं थे, बल्कि उपलब्ध विभिन्न खगोलीय विचारों को समझने और उनका तुलनात्मक अध्ययन करने का प्रयास भी करते थे। वराहमिहिर की बृहत्संहिता भी आकाशीय घटनाओं, मौसम, ग्रहों और प्राकृतिक संकेतों से जुड़े अनेक विषयों को समेटती है। इस तरह खगोल विज्ञान का संबंध व्यापक प्राकृतिक अध्ययन से जुड़ता गया।
 
 
सातवीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने ब्रह्मस्फुटसिद्धांत की रचना की। गणित और खगोल विज्ञान के इतिहास में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ग्रहों की स्थिति, ग्रहण, उदय और अस्त जैसी गणनाओं के साथ उन्होंने गणितीय नियमों को भी व्यवस्थित किया। बाद में उनका खंडखाद्यक भी खगोलीय गणनाओं की महत्वपूर्ण कड़ी बना।
 
 
बारहवीं शताब्दी में भास्कराचार्य द्वितीय ने सिद्धांत शिरोमणि की रचना की। इसके गोलाध्याय और ग्रहगणित संबंधी भागों में खगोलीय गणनाओं का विस्तृत विवेचन मिलता है। इस क्रम से स्पष्ट होता है कि आर्यभट्ट के बाद खगोलीय ज्ञान किसी एक समय पर ठहर नहीं गया था। अलग अलग आचार्यों ने गणना, सिद्धांत और व्याख्या के स्तर पर इसे आगे बढ़ाया।
 
 
आकाश को देखने परखने के साधन समय के साथ बदलते गए। आंखों से निरीक्षण, गणना और खगोलीय सारणियों की परंपरा आगे चलकर दूरबीन, फोटोग्राफी, रेडियो विज्ञान, कंप्यूटर और अंतरिक्ष यानों तक पहुंची। आधुनिक विज्ञान की संस्थागत व्यवस्था विकसित होने के साथ भारत में भी अंतरिक्ष अनुसंधान का एक नया अध्याय शुरू हुआ।
 
 
डॉ. विक्रम साराभाई ने अंतरिक्ष विज्ञान को केवल ग्रहों और तारों की खोज तक सीमित नहीं माना। उनके विचार में अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग संचार, मौसम, शिक्षा और विकास की आवश्यकताओं के लिए किया जाना चाहिए। 1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति का गठन हुआ। 1963 में थुंबा से पहला साउंडिंग रॉकेट प्रक्षेपित किया गया। 1969 में इसरो की स्थापना हुई और 1972 में अंतरिक्ष आयोग तथा अंतरिक्ष विभाग की स्थापना के साथ अंतरिक्ष कार्यक्रम को संस्थागत आधार मिला।
 
 
प्रोफेसर सतीश धवन ने इस संस्थागत आधार को मजबूत किया और प्रक्षेपण यान तथा उपग्रह कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया। प्रोफेसर यू आर राव ने उपग्रह तकनीक के विकास और संचार तथा प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग में अंतरिक्ष तकनीक को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके मार्गदर्शन में 1975 के आर्यभट्ट सहित अनेक उपग्रह विकसित हुए।
 
 
19 अप्रैल 1975 को भारत का पहला उपग्रह आर्यभट्ट अंतरिक्ष में पहुंचा। इसका नाम पांचवीं शताब्दी के महान खगोलशास्त्री आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था। उपग्रह का डिजाइन और निर्माण भारत में हुआ था। इसमें एक्स रे खगोल विज्ञान, सौर भौतिकी और वायुमंडलीय अध्ययन से जुड़े प्रयोग किए गए।
 
 
यह प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एक ओर प्राचीन काल का आर्यभट्ट आकाशीय पिंडों की गति को गणित के माध्यम से समझने का प्रयास कर रहा था और दूसरी ओर आधुनिक काल का आर्यभट्ट उपग्रह अंतरिक्ष में जाकर वैज्ञानिक प्रयोग कर रहा था। दोनों के बीच तकनीकी समानता नहीं है, लेकिन नाम और ज्ञान की जिज्ञासा के स्तर पर एक सुंदर सांस्कृतिक सेतु अवश्य दिखाई देता है।
 
 
इसके बाद भास्कर, रोहिणी, एप्पल, इनसैट और दूरसंवेदी उपग्रहों की श्रृंखला ने अंतरिक्ष तकनीक को देश के विकास से जोड़ा। संचार, मौसम, प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में उपग्रहों की भूमिका बढ़ती गई।
 
 
22 अक्टूबर 2008 को चंद्रयान प्रथम का प्रक्षेपण हुआ। यह पहला भारतीय चंद्र मिशन था। इस अभियान ने चंद्रमा की सतह का रासायनिक, खनिज और भूवैज्ञानिक अध्ययन किया। चंद्रयान प्रथम में भारत के साथ कई अन्य देशों के वैज्ञानिक उपकरण भी शामिल थे। इस मिशन ने चंद्रमा पर जल से संबंधित महत्वपूर्ण प्रमाण उपलब्ध कराने में भूमिका निभाई।
 
 
चंद्रयान द्वितीय ने इससे आगे बढ़कर चंद्रमा की सतह पर उतरने और रोवर चलाने का प्रयास किया। लैंडर के उतरने में सफलता नहीं मिली, लेकिन ऑर्बिटर आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। असफलता ने अगले अभियान के लिए तकनीकी अनुभव उपलब्ध कराया।
 
 
फिर आया चंद्रयान तृतीय। 14 जुलाई 2023 को इसका प्रक्षेपण हुआ और 23 अगस्त 2023 को विक्रम लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी उच्च अक्षांश वाले क्षेत्र में सफल सॉफ्ट लैंडिंग की। प्रज्ञान रोवर ने चंद्र सतह पर वैज्ञानिक अध्ययन किया। इस उपलब्धि के बाद 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में घोषित किया गया।
 
 
आर्यभट्ट से चंद्रयान तक की यात्रा को केवल गौरव की कहानी मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह मूलतः जिज्ञासा की कहानी है। महर्षि लगध से संबद्ध वेदांग ज्योतिष में समय और नक्षत्रों को समझने की कोशिश दिखाई देती है। सूर्य सिद्धांत में खगोलीय गणनाओं का विस्तार मिलता है। आर्यभट्ट पृथ्वी और ग्रहों की गति को गणित से समझते हैं। वराहमिहिर विभिन्न सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं। ब्रह्मगुप्त गणित और खगोल को आगे बढ़ाते हैं। भास्कराचार्य इस परंपरा को और परिष्कृत करते हैं।
 
 
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष तकनीक को समाज से जोड़ते हैं। सतीश धवन संस्थागत क्षमता को मजबूत करते हैं। यू आर राव उपग्रह तकनीक को आगे बढ़ाते हैं। फिर चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य एल वन और एक्सपोसैट जैसे अभियान सौरमंडल और ब्रह्मांड को समझने की नई संभावनाएं खोलते हैं। इसरो के अनुसार चंद्रयान प्रथम, मंगल ऑर्बिटर मिशन, चंद्रयान द्वितीय, आदित्य एल वन और अन्य वैज्ञानिक अभियानों ने सौरमंडल और ब्रह्मांड के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आंकड़े उपलब्ध कराए हैं।
 
 
इस पूरी यात्रा को देखते हुए यह कहना अधिक उचित है कि प्राचीन खगोलीय ज्ञान आधुनिक अंतरिक्ष कार्यक्रम का सीधा तकनीकी स्रोत नहीं है, बल्कि यह उस दीर्घ बौद्धिक परंपरा का हिस्सा है जिसमें आकाश को देखकर प्रश्न पूछना, उसकी गति को समझना और गणना के माध्यम से प्रकृति के नियमों को जानना महत्वपूर्ण माना गया।