पारंपरिक विशेषज्ञता पर आधुनिक कानून की मार: सपेरा समुदाय के सांस्कृतिक और आर्थिक विस्थापन का विश्लेषण

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    17-Aug-2026
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नागपंचमी

 
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
 वरिष्ठ पत्रकार 
 
 
भारतीय सनातन परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहाँ प्रकृति, वनस्पति और जीव-जंतुओं को मनुष्य के प्रतिद्वंद्वी के रूप में कभी नहीं देखा गया है। यह सभी तो जीवन के सहयात्री के रूप में हैं। इसी विचार के केंद्र में है भारत की 'नाग संस्कृति'। भगवान शिव के कंठ का आभूषण 'वासुकी' और भगवान विष्णु का शयन-आसन 'शेषनाग' होना इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति ने भयानक समझे जाने वाले जीवों को भी दिव्यता प्रदान की।
 
 
इस नाग संस्कृति और आम जनमानस के बीच की जीवंत कड़ी रहा है, 'सपेरा समुदाय' (जिन्हें विभिन्न राज्यों में नाथ, जोगी, कालबेलिया या सपेला कहा जाता है)। सदियों से इस घुमंतू समुदाय ने मानव और वन्यजीव के बीच एक ऐसा अनूठा संतुलन बनाया, जिसे आधुनिक विज्ञान आज भी पूरी तरह समझने में असमर्थ है। परंतु, वर्ष 1972 के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के एकतरफा क्रियान्वयन ने इस पूरी विशेषज्ञता को एक झटके में 'अपराध' घोषित कर दिया।
 
 
नागपंचमी और सपेरा समुदाय का धार्मिक-पारिस्थितिक संबंध
 
 
श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाने वाला 'नागपंचमी' का त्योहार एक ओर प्रत्‍येक हिन्‍दू के लिए धार्मिक अनुष्ठान है, वहीं दूसरी ओर यह एक गहरी पारिस्थितिक (Ecological) सोच का परिणाम है। वर्षा ऋतु में जब सांप अपने बिलों से बाहर निकलते हैं, तब मनुष्यों और सांपों के बीच टकराव की संभावना बढ़ जाती है। सनातन परंपरा ने इस टकराव को टालने के लिए 'नागपूजा' का विधान किया। इस विधान के सबसे बड़े पुरोहित सपेरा समुदाय के लोग थे। वे गांवों और शहरों में जाकर लोगों को सांपों के प्रति भयमुक्त करते थे, उनका दर्शन कराते थे और समाज के भीतर एक धार्मिक चेतना जगाते थे कि 'सांप मारने योग्य नहीं, बल्कि पूजनीय जीव है।'
 
 
यह समुदाय सांपों को 'क्षेत्रपाल' (खेतों का रक्षक) मानता था, क्योंकि वे फसलों को नष्ट करने वाले चूहों का शिकार करते थे। इस प्रकार, नागपंचमी और सपेरों की उपस्थिति ने सदियों तक भारत में सांपों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम किया, किंतु आज, जब सपेरा गलियों में नहीं दिखता, तो लोग आत्मरक्षा के नाम पर घरों में निकलने वाले सांपों को लाठियों से पीट-पीटकर मार डालते हैं। यह आधुनिकता की कैसी विडंबना है कि जिस कानून को सांपों को बचाने के लिए लाया गया था, उसी कानून ने सांपों के सबसे बड़े रक्षकों को ही उनसे दूर कर दिया।
 
 
1972 का कानून: एक समुदाय की आजीविका पर वज्रपात
 
 
भारत सरकार ने जब 1972 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (WPA) लागू किया, तो उसका उद्देश्य निश्चित रूप से वन्यजीवों की तस्करी और क्रूरता को रोकना था। मगर इस कानून का सबसे क्रूर प्रभाव भारत की अनुमानित 10 से 15 लाख की सपेरा आबादी पर पड़ा। बिना किसी पूर्व तैयारी, बिना किसी वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था और बिना किसी व्यवस्थित पुनर्वास के, सदियों पुराने एक पारंपरिक पेशे को रातों-रात 'गैर-कानूनी' घोषित कर दिया गया।
 
 
इस कानून के तहत सांपों को अनुसूची (Schedule) में शामिल किया गया, जिसके कारण सांप को पकड़ना, पास रखना या उसका प्रदर्शन करना 3 से 7 साल की जेल और गैर-जमानती अपराध बन गया। एक घुमंतू समुदाय, जिसके पास न तो खेती के लिए जमीन थी, न स्थायी मकान थे और न ही आधुनिक शिक्षा, वे एक ही झटके में अपनी ही जमीन पर 'अपराधी' बना दिए गए।
 
 
इस संबंध में ऑल इंडिया घुमंतू सपेरा विकास महासंघ जैसी संस्थाओं के आंकड़े बताते हैं कि इस कानून के बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों में सपेरा समुदाय के लाखों परिवार घोर गरीबी, भुखमरी और सामाजिक अलगाव के दलदल में धकेल दिए गए।
 
 
दोहरे मापदंड: चिड़ियाघर बनाम गरीब सपेरा
 
 
राज्य की नीतियों की आलोचना करते हुए यह प्रश्न उठना अनिवार्य है कि जब एक गरीब सपेरा अपनी आजीविका के लिए सांप रखता है, तो उसे 'क्रूरता' और 'अपराध' कहा जाता है, लेकिन जब वही राज्य 'चिड़ियाघर' (Zoo) या 'सफारी' के नाम पर हजारों जंगली जानवरों को लोहे के पिंजरों में कैद करता है और उनसे व्यावसायिक लाभ (टिकट) कमाता है, तो उसे 'संरक्षण' और 'शिक्षा' का नाम दे दिया जाता है। यह न्याय के किस सिद्धांत के अंतर्गत आता है?
 
 
तर्क दिया जाता है कि चिड़ियाघरों में डॉक्टरों की टीम होती है और वैज्ञानिक रखरखाव होता है। परंतु, इस तर्क में सपेरा समुदाय के उस गहन 'पारंपरिक व्यावहारिक विज्ञान' (Ethology) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिसे उन्होंने पीढ़ियों के अनुभव से हासिल किया था। एक सपेरा केवल सांप की फुफकार या मिट्टी पर उसके रेंगने के निशान से उसकी प्रजाति, लिंग और व्यवहार की सटीक जानकारी दे सकता है। क्या किसी आधुनिक विश्वविद्यालय की डिग्री इस व्यावहारिक विशेषज्ञता का मुकाबला कर सकती है? कानून ने इस अनूठे ज्ञान को सहेजने के बजाय उसे नष्ट करना बेहतर समझा।
 
 
पारंपरिक ज्ञान और चिकित्सा का अपूरणीय ह्रास
 
 
सपेरा जाति के पास केवल सांप पकड़ने का हुनर नहीं था, बल्कि उनके पास पारंपरिक औषधियों, जड़ी-बूटियों और सर्पदंश (Snake bite) के इलाज का एक अमूल्य मौखिक खजाना था। चूंकि यह समुदाय घुमंतू था, इसलिए इनका ज्ञान किसी लिखित पुस्तक में नहीं, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मौखिक रूप से ट्रांसफर होता था।
 
 
जब कानून ने इस पेशे पर प्रतिबंध लगाया, तो नई पीढ़ी ने बदनामी और जेल के डर से इस काम से पूरी तरह दूरी बना ली। परिणाम यह हुआ कि वह पारंपरिक ज्ञान, जो भारत की स्वदेशी चिकित्सा पद्धति (Indigenous Knowledge System) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, हमेशा के लिए लुप्त हो गया। आज जब भारत सरकार का आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) पारंपरिक चिकित्सा को पुनर्जीवित करने की बात करता है, तब सपेरा समुदाय के इस नष्ट हो चुके ज्ञान की भरपाई कैसे होगी, इस पर कोई नीति स्पष्ट नहीं है।
 
 
तमिलनाडु का 'इरुला मॉडल': एक अनुकरणीय प्रमाण
 
 
ऐसा नहीं है कि सपेरा समुदाय के ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए उनके पुनर्वास का कोई रास्ता नहीं था। इसका सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण तमिलनाडु की 'इरुला स्नेक कैचर्स इंडस्ट्रियल को-ऑपरेटिव सोसाइटी' है। जब 1972 के कानून से इरुला जनजाति की आजीविका छिनी, तो प्रसिद्ध पर्यावरणविद रोमुलस व्हिटेकर के प्रयासों से सरकार ने एक बीच का रास्ता निकाला।
 
 
सरकार ने इरुला समुदाय के लोगों को कानूनी रूप से सांप पकड़ने और उनका जहर (Venom) निकालने का लाइसेंस दिया। आज, भारत में सांप के काटने से बचने वाली जीवन रक्षक दवाएं (Anti-venom) बनाने के लिए 80% से अधिक जहर यही इरुला समुदाय अपनी विशेषज्ञता से निकालता है। इस सहकारी समिति से उन्हें सम्मानजनक रोजगार भी मिला और देश को जीवन रक्षक दवाएं भी।
 
 
प्रश्न यह उठता है कि जो मॉडल तमिलनाडु के इरुला समुदाय के लिए सफल रहा, उसे उत्तर भारत के नाथ, जोगी और कालबेलिया सपेरा समुदायों के लिए पूरे देश में व्यापक स्तर पर क्यों नहीं लागू किया गया? उत्तर भारत के सपेरों को इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से क्यों नहीं जोड़ा गया? यह राज्य तंत्र की प्रशासनिक उदासीनता और नीतिगत विफलता का एक बड़ा प्रमाण है।
 
 
सांस्कृतिक पहचान का संकट और अधूरे सरकारी प्रयास
 
 
राजस्थान में कालबेलिया समुदाय के नृत्य को यूनेस्को (UNESCO) की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में स्थान मिला, जिससे कुछ कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच मिला, किंतु यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। समुदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी पहचान पत्र (जैसे जाति प्रमाण पत्र, राशन कार्ड) न होने के कारण 'सीड' (SEED) जैसी सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित है। घुमंतू जीवनशैली के कारण उनके बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जा सका, जिससे उनकी सामाजिक स्थिति और बदतर होती चली गई।
 
 
यह सही है कि वन्यजीवों के प्रति क्रूरता का अंत होना चाहिए, मगर जीवों की रक्षा की कीमत इंसानों (विशेषकर समाज के सबसे पिछड़े तबके) को भूखा मारकर चुकाई जाए, इसे किसी भी सभ्य समाज में 'न्याय' नहीं कहा जा सकता।
 
 
सपेरा जाति के पक्ष में सच्ची न्यायप्रियता तभी सुनिश्चित होगी जब सरकार निम्नलिखित कदम उठाएगी:
 
 
1.सर्टिफाइड स्नेक रेस्क्यूअर की नियुक्ति: देश के हर जिले के वन विभाग में सपेरा समुदाय के युवाओं को आधुनिक प्रशिक्षण देकर 'आधिकारिक स्नेक रेस्क्यूअर' के रूप में मानदेय या स्थायी नौकरी पर रखा जाए।
 
 
2.एंटी-वेनम केंद्रों की स्थापना: उत्तर और मध्य भारत में 'इरुला मॉडल' की तर्ज पर सरकारी एंटी-वेनम एक्सट्रैक्शन सेंटर खोले जाएं, जहाँ इन सपेरों के हुनर का उपयोग देश के लिए दवाएं बनाने में हो।
 
 
3.पारंपरिक कला को पेंशन और सुरक्षा: बीन संगीत और लोक कलाओं से जुड़े बुजुर्ग कलाकारों को विशेष सांस्कृतिक पेंशन दी जाए।
 
 
अंत में यही कहना है कि नाग संस्कृति को जीवित रखने का मतलब सांपों को प्रताड़ित करना नहीं है, यह तो वास्‍तव में उस संस्कृति को जनम देने वाले मानव-विशेषज्ञों को सम्मान देना है। सनातन की मूल भावना 'सर्वे भवंतु सुखिनः' तभी चरितार्थ होती है, जब इस आधुनिक युग में प्रकृति के इन प्राचीन संरक्षकों को भी सम्मान और आजीविका का अधिकार मिलेगा। आशा करें केंद्र एवं राज्‍यों की सरकारें इस को जरूर गंभीरता से लेंगी।