डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
14 अगस्त भारत के इतिहास की उन तारीखों में से है, जिसे केवल कैलेंडर की एक तारीख मानकर नहीं देखा जा सकता। पाकिस्तान इस दिन अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है, जबकि भारत के लिए यही दिन 1947 के विभाजन की उस पीड़ा को स्मरण करने का अवसर है, जिसने करोड़ों लोगों के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। भारत सरकार ने 2021 से 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की। इसका उद्देश्य केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि विभाजन से पैदा हुई सामाजिक दरारों, विस्थापन, हिंसा और मानवीय त्रासदी से वर्तमान पीढ़ी को परिचित कराना भी है।
2026 में विभाजन को 79 वर्ष हो रहे हैं। इतने लंबे अंतराल के बाद भी विभाजन की स्मृतियां समाप्त नहीं हुई हैं। वे परिवारों की कहानियों, बिछड़े घरों, उजड़े गांवों, पुरानी तस्वीरों, स्मृतियों और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली उन कथाओं में आज भी जीवित हैं, जिनमें एक रात में सब कुछ छूट जाने की पीड़ा दर्ज है। 1947 का विभाजन दुनिया के सबसे बड़े जन-विस्थापनों में से एक बना; विभिन्न ऐतिहासिक आकलनों में एक करोड़ से अधिक लोगों के विस्थापन और लगभग दस लाख या उससे अधिक लोगों की मृत्यु के अनुमान मिलते हैं।
सवाल केवल यह नहीं कि भारत क्यों बंटा, सवाल यह भी है कि भारत को बांटने की परिस्थितियां किसने पैदा कीं?
विभाजन का इतिहास अत्यंत जटिल है। इसलिए यह कहना कि इसके लिए केवल एक व्यक्ति जिम्मेदार था, इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा। इसके पीछे ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां, साम्प्रदायिक राजनीति का उभार, मुस्लिम लीग की पृथक राष्ट्र की मांग, कांग्रेस के सामने खड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियां, 1946-47 की हिंसा और सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी—इन सभी की भूमिका थी।
1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद मुस्लिम लीग की राजनीति क्रमशः पृथक मुस्लिम राष्ट्र की मांग की ओर बढ़ी। मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने अलग राष्ट्र की मांग को राजनीतिक आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनाया।
दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व लंबे समय तक अखंड भारत और साझा राष्ट्रवाद के पक्ष में रहा। महात्मा गांधी की कल्पना में भारत केवल राजनीतिक भूगोल नहीं था। वह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकात्मता वाला राष्ट्र था। गांधी विभाजन को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे और अंतिम समय तक हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा अखंडता की भावना को लेकर चिंतित रहे।
लेकिन इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं जब आदर्श और राजनीतिक वास्तविकता आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। 1947 में भारत इसी कठिन मोड़ पर खड़ा था।
ब्रिटिश सत्ता की भूमिका को कैसे देखा जाए?
विभाजन की कहानी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की भूमिका के बिना अधूरी है। लंबे समय तक अपनाई गई ऐसी नीतियों ने धार्मिक और सामुदायिक पहचान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने में भूमिका निभाई, जिसने अलग-अलग राजनीतिक हितों को संस्थागत आधार दिया।
1947 में लॉर्ड माउंटबेटन भारत के अंतिम वायसराय बने। 3 जून 1947 को घोषित योजना—जिसे माउंटबेटन योजना या 3 जून योजना कहा जाता है—ने ब्रिटिश भारत के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया निर्धारित की। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेतृत्व ने इस योजना को स्वीकार किया।
यहां इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या सत्ता हस्तांतरण की जल्दी ने विभाजन की मानवीय कीमत को बढ़ा दिया?
इस प्रश्न का उत्तर इतिहासकारों के बीच बहस का विषय रहा है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि सीमा निर्धारण की प्रक्रिया अत्यंत कम समय में पूरी हुई। पंजाब और बंगाल के विभाजन के लिए सर सिरिल रैडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग बनाया गया। रैडक्लिफ भारत की सामाजिक और भौगोलिक जटिलताओं से लगभग अपरिचित थे और उन्हें सीमा निर्धारण के लिए बहुत सीमित समय मिला। परिणामस्वरूप ऐसी सीमा बनी जिसने गांव, खेत, परिवार, व्यापारिक संबंध और सामाजिक जीवन तक को विभाजित कर दिया।
कांग्रेस नेतृत्व की ऐतिहासिक जिम्मेदारी
इतिहास का निष्पक्ष मूल्यांकन करते समय कांग्रेस नेतृत्व के निर्णयों पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
जवाहरलाल नेहरू और अन्य कांग्रेस नेताओं ने अंततः विभाजन की योजना स्वीकार की। यह निर्णय किसी उत्सव का निर्णय नहीं था, बल्कि अत्यंत कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में लिया गया निर्णय था। 1946-47 में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा, प्रशासनिक संकट और सत्ता हस्तांतरण की अनिश्चितता ने नेतृत्व के सामने सीमित विकल्प छोड़े थे।
कांग्रेस नेतृत्व के सामने एक बड़ा प्रश्न था—क्या अखंड भारत के लिए संघर्ष जारी रखा जाए, भले ही उससे व्यापक गृहयुद्ध की आशंका बढ़े, या विभाजन स्वीकार करके शीघ्र सत्ता हस्तांतरण और एक मजबूत भारतीय राज्य के निर्माण की दिशा में बढ़ा जाए?
कांग्रेस ने दूसरा रास्ता चुना।
इस निर्णय की आलोचना भी हुई और आज भी होती है। आलोचकों का तर्क है कि यदि नेतृत्व अधिक दृढ़ता दिखाता तो विभाजन को टाला जा सकता था। समर्थकों का तर्क है कि 1947 की परिस्थितियों में विभाजन को स्वीकार करना एक त्रासद लेकिन व्यावहारिक राजनीतिक समझौता था।
इतिहास का न्याय इन दोनों पक्षों को समझे बिना पूरा नहीं हो सकता।
मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की भूमिका
विभाजन के राजनीतिक इतिहास में मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की भूमिका केंद्रीय थी। मुस्लिम लीग ने मुस्लिमों के लिए पृथक राजनीतिक राष्ट्र की अवधारणा को मजबूत किया और अंततः पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कराने में सफलता प्राप्त की।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि मुस्लिम समाज एकसमान राजनीतिक इकाई नहीं था। अनेक मुस्लिम नेता, संगठन और आम नागरिक विभाजन के समर्थक नहीं थे। इसलिए पूरे मुस्लिम समाज को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराना ऐतिहासिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से अनुचित होगा।
विभाजन की जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व और तत्कालीन राजनीतिक प्रक्रियाओं की थी, किसी धार्मिक समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं।
गांधी : सत्ता से बाहर, लेकिन राष्ट्र की आत्मा के साथ
विभाजन के समय महात्मा गांधी की स्थिति विशेष रूप से मार्मिक थी।
जिस व्यक्ति ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आंदोलन बनाया, जो हिन्दू-मुस्लिम एकता को राष्ट्रीय स्वतंत्रता की बुनियादी शर्त मानता था, वह स्वतंत्र भारत के सत्ता हस्तांतरण समारोह से अलग बंगाल और बाद में दिल्ली में सांप्रदायिक शांति के लिए संघर्ष कर रहा था।
यह दृश्य अपने आप में इतिहास का बड़ा संदेश है।
एक ओर दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण की तैयारी थी, दूसरी ओर देश के अनेक हिस्सों में मनुष्य मनुष्य का शत्रु बन रहा था।
गांधी के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल अंग्रेजों का जाना नहीं था। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ था—भारत की आत्मा का स्वतंत्र होना, समाज का एक होना और मनुष्य के भीतर से भय का समाप्त होना।
इसलिए विभाजन गांधी के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी पीड़ाओं में से एक था।
लाखों लोगों की त्रासदी : इतिहास के आंकड़ों के पीछे छिपे मनुष्य
विभाजन को केवल आंकड़ों में देखना उसकी वास्तविक त्रासदी को छोटा कर देता है।
किसी के लिए वह अपना गांव था।
किसी के लिए ancestral घर।
किसी के लिए खेत।
किसी के लिए मंदिर या मस्जिद।
किसी के लिए बचपन की गलियां।
और किसी के लिए वह घर था जिसमें कई पीढ़ियों की स्मृतियां बसती थीं।
अचानक लोगों से कहा गया कि अब यह भूमि उनके लिए दूसरी हो चुकी है।
लाखों लोग पैदल चले। रेलगाड़ियां शरणार्थियों से भर गईं। अनेक परिवार हमेशा के लिए बिछड़ गए। महिलाएं हिंसा की सबसे बड़ी पीड़ितों में रहीं। बच्चों ने अपने माता-पिता खोए और परिवारों ने अपने प्रियजनों को।
विभाजन ने केवल भारत का भूगोल नहीं बदला; उसने भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक मनोवृत्ति को भी गहरे प्रभावित किया।
क्या अखंड भारत की कल्पना समाप्त हो गई?
यहां ‘अखंड भारत’ को केवल किसी राजनीतिक सीमा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।
भारत की सभ्यता हजारों वर्षों से राजनीतिक सीमाओं से कहीं व्यापक सांस्कृतिक चेतना में विकसित हुई। रामायण, महाभारत, बौद्ध परंपरा, तीर्थ परंपरा, व्यापारिक मार्ग, भाषायी संपर्क और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ा।
स्वतंत्रता संग्राम के अनेक सेनानियों के लिए भी भारत केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि भारत माता था।
उन लोगों के लिए जिन्होंने अपने प्राण राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए दिए, देश का विभाजन निस्संदेह एक गहरी ऐतिहासिक पीड़ा थी।
लेकिन आज अखंड भारत की भावना का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि पड़ोसी देशों के नागरिकों के प्रति वैमनस्य पैदा किया जाए। इसका व्यापक अर्थ सांस्कृतिक एकात्मता, सभ्यतागत स्मृति, मानवीय संबंध और उस साझा विरासत की पहचान हो सकता है जिसे राजनीतिक सीमाओं ने पूरी तरह समाप्त नहीं किया।
14 अगस्त हमें क्या संदेश देता है?
14 अगस्त का सबसे बड़ा संदेश यह है कि राष्ट्र को विभाजित करना आसान है, लेकिन विभाजन की कीमत पीढ़ियां चुकाती हैं।
धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और राजनीतिक पहचान के आधार पर समाज को स्थायी खांचों में बांटने की राजनीति अंततः राष्ट्र की सामाजिक शक्ति को कमजोर करती है।
आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां राजनीतिक मतभेद होंगे, सरकार और विपक्ष के बीच संघर्ष होगा, विचारधाराओं की प्रतिस्पर्धा होगी—और यही लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
लेकिन राजनीतिक असहमति को सामाजिक शत्रुता में बदल देना लोकतंत्र को कमजोर करता है।
विभाजन का सबसे बड़ा सबक यही है कि राजनीतिक संघर्ष लोकतांत्रिक रहना चाहिए, सामाजिक संबंध मानवीय बने रहने चाहिए और राष्ट्रीय एकता को दलगत राजनीति से ऊपर रखना चाहिए।
जिम्मेदारी तय करते समय इतिहास को प्रतिशोध का हथियार न बनाएं
आज जब विभाजन की चर्चा होती है, तब एक प्रश्न बार-बार उठता है—“इसके लिए जिम्मेदार कौन था?”
इस प्रश्न का उत्तर खोजना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है कि इतिहास को प्रतिशोध का हथियार न बनाया जाए।
ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों की जिम्मेदारी थी।
मुस्लिम लीग की पृथकतावादी राजनीति की जिम्मेदारी थी।
तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व के राजनीतिक निर्णयों की भी ऐतिहासिक समीक्षा आवश्यक है।
माउंटबेटन प्रशासन की जल्दबाजी और सीमा निर्धारण की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठे हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—1946-47 की साम्प्रदायिक हिंसा ने उस राजनीतिक वातावरण को भयावह बना दिया था जिसमें विभाजन संभव हुआ।
लेकिन इन राजनीतिक जिम्मेदारियों को किसी धर्म या समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी में बदल देना इतिहास के साथ अन्याय होगा।
आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा सबक
आज की पीढ़ी ने विभाजन देखा नहीं है। उसने केवल उसके बारे में पढ़ा है।
इसलिए 14 अगस्त का महत्व बढ़ जाता है।
नई पीढ़ी को यह बताया जाना चाहिए कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं थी। इसके पीछे असंख्य बलिदान थे। और विभाजन ने स्वतंत्रता के साथ-साथ एक ऐसी मानवीय त्रासदी भी जन्म दी, जिसकी स्मृति आज तक जीवित है।
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसलिए केवल शोक का दिन नहीं होना चाहिए। यह राष्ट्रीय संकल्प का दिन भी होना चाहिए।
संकल्प—कि भारत की एकता अक्षुण्ण रहेगी।
संकल्प—कि राजनीतिक मतभेद राष्ट्र-विरोधी वैमनस्य में नहीं बदलेंगे।
संकल्प—कि धर्म के आधार पर नागरिकों के बीच घृणा नहीं फैलाई जाएगी।
संकल्प—कि इतिहास को भुलाया नहीं जाएगा, लेकिन इतिहास की पीड़ा को भविष्य की नफरत में भी परिवर्तित नहीं किया जाएगा।
संकल्प—कि भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है।
पाकिस्तान का 14 अगस्त और भारत का 14 अगस्त
एक ही तारीख दोनों देशों में दो अलग-अलग स्मृतियां लेकर आती है।
पाकिस्तान के लिए यह राष्ट्र-निर्माण की स्मृति है।
भारत के लिए यह स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर उस कीमत को याद करने का अवसर है, जो विभाजन के कारण करोड़ों लोगों ने चुकाई।
इन दोनों स्मृतियों के बीच एक गहरी ऐतिहासिक विडंबना छिपी है—एक ही घटना किसी के लिए राष्ट्र की स्थापना है और किसी दूसरे के लिए घर, परिवार और स्मृतियों के टूटने की कहानी।
भारत के लिए 14 अगस्त इसलिए केवल अतीत का शोक नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी है।
विभाजन की राख से एकता का संकल्प
1947 में भारत का भूगोल विभाजित हुआ, लेकिन भारतीय सभ्यता समाप्त नहीं हुई।
सीमाएं बदलीं, लेकिन स्मृतियां नहीं बदलीं।
परिवार बिछड़े, लेकिन उनकी कहानियां पीढ़ियों तक चलती रहीं।
विभाजन ने हमें यह कठोर सत्य सिखाया कि राष्ट्र केवल नक्शे पर खींची गई रेखाओं से नहीं बनते। राष्ट्र मनुष्यों के विश्वास, साझा स्मृतियों, सांस्कृतिक चेतना और पारस्परिक संबंधों से बनते हैं।
इसलिए 14 अगस्त को केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि भारत क्यों बंटा?
आज का अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—हम ऐसा भारत कैसे बनाएं जिसे फिर कभी किसी विभाजनकारी राजनीति के सामने अपनी एकता की कीमत न चुकानी पड़े?
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का वास्तविक उद्देश्य शायद इसी प्रश्न का उत्तर तलाशना है।
जो लोग 1947 में अपना घर खोकर भी भारत आए, जिन्होंने शून्य से जीवन शुरू किया, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोकर भी राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया—उनकी पीड़ा हमारे लिए केवल इतिहास नहीं, राष्ट्रीय चेतना की विरासत है।
उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम इतिहास को याद रखें, उससे सीखें और भारत की एकता, अखंडता, लोकतांत्रिक चेतना तथा सामाजिक समरसता को और मजबूत करें।
14 अगस्त हमें अतीत की राख में झांकने के लिए नहीं, भविष्य के भारत की नींव और मजबूत करने के लिए दिया गया एक ऐतिहासिक अवसर है।
विभाजन को भूलना इतिहास से विश्वासघात होगा;
विभाजन की पीड़ा को नफरत में बदलना भविष्य से विश्वासघात होगा।
यही 14 अगस्त का सबसे बड़ा संदेश है।