डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
भारत की सनातन परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो अज्ञान से ज्ञान की ओर, असत्य से सत्य की ओर और संकीर्णता से व्यापकता की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करती है। इसी गुरु-परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है—गुरु पूर्णिमा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दृष्टि से भी गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन, समर्पण, अनुशासन और राष्ट्रकार्य के प्रति पुनः संकल्प लेने का अवसर है। संघ में व्यक्ति-पूजा के स्थान पर आदर्श, विचार और राष्ट्र को सर्वोच्च माना गया है। इसी कारण संघ ने अपने गुरु के रूप में किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि भगवा ध्वज को स्वीकार किया है।
भगवा ध्वज भारतीय त्याग, तपस्या, ज्ञान, शौर्य और समर्पण का प्रतीक है। संघ के स्वयंसेवक गुरु पूर्णिमा के अवसर पर इसी भगवा ध्वज के समक्ष अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं और अपने जीवन, समय, सामर्थ्य तथा अपनी क्षमता के अनुसार राष्ट्रकार्य में योगदान का संकल्प लेते हैं।
संघ के इतिहास में गुरु पूर्णिमा का विशेष स्थान है। संघ के आधिकारिक इतिहास के अनुसार 1928 में पहली बार गुरुपूर्णिमा उत्सव मनाया गया। इसी कालखंड में संघ की कार्यपद्धति में गुरु दक्षिणा की परंपरा का भी प्रारंभ हुआ। प्रथम गुरु दक्षिणा उत्सव में कुल 84 रुपये का समर्पण हुआ था। यह राशि अपने आप में महत्वपूर्ण इसलिए नहीं थी कि वह कितनी थी, बल्कि इसलिए कि उसने संघ के आर्थिक स्वावलंबन और स्वयंसेवक के व्यक्तिगत समर्पण की एक विशिष्ट परंपरा की नींव रखी।
संघ की स्थापना के प्रारंभिक वर्षों में ही यह स्पष्ट हो गया था कि संगठन का संचालन बाहरी आर्थिक सहायता पर निर्भर न होकर स्वयंसेवकों के स्वैच्छिक योगदान और समर्पण से होना चाहिए। गुरु दक्षिणा इसी भाव का प्रतीक बनी।
इस प्रकार गुरु पूर्णिमा संघ के लिए तीन प्रमुख भावों का पर्व बन गई—श्रद्धा, भगवा ध्वज के प्रति; समर्पण, राष्ट्र और समाज के प्रति; और संकल्प, स्वयं के चरित्र निर्माण तथा राष्ट्रसेवा के प्रति।
संघ का गुरु कौन है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक है कि उसने किसी व्यक्ति को अपना गुरु नहीं माना। संघ ने भगवा ध्वज को गुरु स्वीकार किया है।
इसका गहरा दार्शनिक अर्थ है। व्यक्ति परिवर्तनशील है। व्यक्ति का जीवन सीमित है। लेकिन विचार, आदर्श और राष्ट्र का जीवन दीर्घकालीन होता है। इसलिए संघ ने अपने गुरु के रूप में ऐसे प्रतीक को स्वीकार किया, जो भारतीय संस्कृति के हजारों वर्षों के त्याग, तपस्या, ज्ञान और राष्ट्रधर्म का प्रतिनिधित्व करता है।
भगवा ध्वज स्वयंसेवक को यह स्मरण कराता है कि संगठन में व्यक्ति नहीं, ध्येय सर्वोपरि है।
संघ के सरसंघचालक भी स्वयं को गुरु नहीं मानते। वे संघ के कार्य का मार्गदर्शन करने वाले प्रमुख कार्यकर्ता होते हैं। यही कारण है कि संघ में गुरु दक्षिणा किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि भगवा ध्वज के माध्यम से उस महान राष्ट्रीय ध्येय को अर्पित की जाती है, जिसके लिए स्वयंसेवक काम करता है।
गुरु दक्षिणा केवल धन का समर्पण नहीं
सामान्य अर्थों में गुरु दक्षिणा का अर्थ गुरु को धन या वस्तु अर्पित करना माना जाता है। लेकिन संघ की परंपरा में गुरु दक्षिणा का अर्थ इससे कहीं व्यापक है।
यह स्वयंसेवक के जीवन में समर्पण की भावना को जागृत करने का माध्यम है।
स्वयंसेवक अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरु दक्षिणा अर्पित करता है। इसमें राशि का बड़ा या छोटा होना मुख्य नहीं है। मुख्य बात यह है कि स्वयंसेवक अपने परिश्रम से अर्जित धन में से राष्ट्रकार्य के लिए स्वेच्छा से कुछ अंश समर्पित करता है।
इसलिए गुरु दक्षिणा को संघ की आर्थिक स्वावलंबन की परंपरा के साथ-साथ आत्मसमर्पण की साधना भी कहा जा सकता है।
गुरु पूर्णिमा के दिन संघ में कार्यक्रम कैसे होता है?
संघ की स्थानीय परंपराओं और परिस्थितियों के अनुसार कार्यक्रम के स्वरूप में कुछ अंतर हो सकता है, लेकिन सामान्यतः गुरु पूर्णिमा अथवा गुरु दक्षिणा कार्यक्रम में भगवा ध्वज के समक्ष स्वयंसेवक एकत्रित होते हैं। ध्वज प्रणाम किया जाता है। स्वयंसेवक भगवा ध्वज को गुरु मानकर प्रणाम करते हैं। यह व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि आदर्श और ध्येय के प्रति नमन होता है।
इसके बाद संघ प्रार्थना होती है। सामूहिक प्रार्थना के माध्यम से राष्ट्र, समाज और संगठन के प्रति स्वयंसेवक अपने संकल्प को पुनः स्मरण करता है।
कार्यक्रम में आमंत्रित वक्ता अथवा संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता गुरु पूर्णिमा, भारतीय गुरु-परंपरा, संघ के ध्येय और वर्तमान सामाजिक चुनौतियों पर विचार रखते हैं।
इसके बाद गुरु दक्षिणा समर्पण का कार्यक्रम होता है। स्वयंसेवक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार गुरु दक्षिणा अर्पित करता है। यह समर्पण सामान्यतः व्यक्तिगत रूप से और स्वैच्छिक भाव से किया जाता है।
गुरु दक्षिणा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है आत्ममंथन। स्वयंसेवक स्वयं से प्रश्न करता है—मैंने राष्ट्र के लिए क्या किया और आगे क्या करना है? इस अवसर पर स्वयंसेवक अपने जीवन में अधिक समय, अधिक अनुशासन, अधिक सेवा और अधिक सामाजिक सक्रियता का संकल्प लेता है।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार : संगठन ही साधना
संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संगठन को व्यक्ति-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में विकसित किया। उनके लिए संघ का लक्ष्य केवल शाखा चलाना नहीं था, बल्कि ऐसे स्वयंसेवक तैयार करना था जो समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पित जीवन जी सकें।
गुरु पूर्णिमा की दृष्टि से डॉ. हेडगेवार की कार्यपद्धति का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही था कि राष्ट्रकार्य किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक शक्ति का परिणाम होना चाहिए।
उन्होंने संघ को व्यक्ति-केंद्रित न बनाकर ध्येय-केंद्रित बनाया। आगे चलकर भगवा ध्वज को गुरु स्वीकार करने की परंपरा इसी दृष्टि को मजबूत करती है।
श्री माधव सदाशिव गोलवलकर 'श्री गुरुजी' : व्यक्ति नहीं, तत्व महत्वपूर्ण
दूसरे सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर, जिन्हें संघ परिवार में स्नेहपूर्वक 'श्री गुरुजी' कहा जाता है, ने स्वयंसेवक के चरित्र, अनुशासन और आत्मीयता पर विशेष बल दिया।
उनके विचारों में स्वयंसेवक केवल शाखा में उपस्थित रहने वाला व्यक्ति नहीं है। वह अपने व्यक्तिगत जीवन, परिवार, व्यवसाय और सामाजिक व्यवहार में भी संघ के संस्कारों को अभिव्यक्त करता है।
गुरु पूर्णिमा के संदर्भ में श्री गुरुजी की दृष्टि का सार यह कहा जा सकता है कि गुरु दक्षिणा केवल धन देना नहीं, बल्कि अपने जीवन को ध्येय के अनुकूल बनाने की साधना है।
बालासाहब देवरस : सामाजिक परिवर्तन का संकल्प
तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने संघ के कार्य को सामाजिक समरसता और सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा।
उनकी दृष्टि में समाज की एकता केवल भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार में समानता, आत्मीयता और सामाजिक सहभागिता से स्थापित होगी।
गुरु पूर्णिमा का अवसर स्वयंसेवक को यह प्रश्न पूछने की प्रेरणा देता है—क्या मेरा समर्पण केवल संगठन तक सीमित है या समाज के अंतिम व्यक्ति तक भी पहुंच रहा है?
इस दृष्टि से गुरु दक्षिणा का अर्थ सेवा, सामाजिक समरसता और समाज के प्रति जिम्मेदारी को स्वीकार करना भी है।
प्रो. राजेंद्र सिंह 'रज्जू भैया' : सरलता और आत्मीयता
चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह 'रज्जू भैया' अपने सरल व्यक्तित्व और आत्मीय व्यवहार के लिए जाने जाते थे।
उनके जीवन में गुरु-परंपरा का अर्थ था—ज्ञान, विनम्रता और सेवा।
गुरु पूर्णिमा का संदेश उनके जीवन से यह मिलता है कि ज्ञान का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह समाज के काम आए। इसलिए स्वयंसेवक का जीवन जितना सरल होगा, उतना ही वह समाज के साथ आत्मीय संबंध स्थापित कर सकेगा।
कुप्प. सी. सुदर्शन : स्वदेशी और आत्मनिर्भरता
पांचवें सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन ने स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और भारतीय चिंतन पर विशेष बल दिया।
गुरु दक्षिणा की परंपरा में भी आत्मनिर्भरता का यही तत्व दिखाई देता है। संघ का संगठन अपने कार्य के लिए स्वयंसेवकों के स्वैच्छिक योगदान पर आधारित रहने का प्रयास करता है।
इस दृष्टि से गुरु दक्षिणा केवल आर्थिक योगदान नहीं, बल्कि 'हम अपने ध्येय के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं'—इस भाव की अभिव्यक्ति है।
डॉ. मोहन भागवत : स्वयंसेवक से समाज तक
वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ के कार्य को व्यक्ति निर्माण, सामाजिक सहभागिता और राष्ट्र निर्माण से जोड़ते हुए अनेक अवसरों पर स्वयंसेवक के व्यापक दायित्व की चर्चा की है।
उनकी दृष्टि में संघ का कार्य केवल शाखा के एक घंटे तक सीमित नहीं है; स्वयंसेवक के व्यक्तिगत, पारिवारिक, सार्वजनिक और आजीविका से जुड़े शेष जीवन में भी संघ के संस्कारों की अभिव्यक्ति होनी चाहिए।
गुरु पूर्णिमा का भी मूल संदेश यही है—समर्पण के साथ आत्ममंथन।
प्रचारक : गुरु दक्षिणा की जीवंत प्रतिमूर्ति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति में प्रचारकों का विशेष महत्व है। प्रचारक वह स्वयंसेवक है जो अपने व्यक्तिगत जीवन की सुविधाओं को पीछे रखकर संघकार्य और समाजकार्य के लिए अपना जीवन समर्पित करता है।
यदि गुरु दक्षिणा को केवल आर्थिक समर्पण के रूप में देखा जाए तो उसका अर्थ सीमित हो जाएगा। संघ के प्रचारक का जीवन इस परंपरा के व्यापक अर्थ को सामने रखता है।
प्रचारक अपने जीवन का सबसे मूल्यवान धन—अपना समय, अपनी ऊर्जा, अपनी प्रतिभा, अपना ज्ञान और अपना अनुभव—समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित करता है।
इस दृष्टि से प्रचारक का जीवन स्वयं में एक प्रकार की जीवंत गुरु दक्षिणा है।
गुरु पूर्णिमा : स्वयंसेवक के लिए आत्ममंथन का दिन
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर संघ का स्वयंसेवक केवल यह नहीं सोचता कि उसने गुरु दक्षिणा में कितनी राशि दी। वह यह भी विचार करता है—मैंने समाज के लिए कितना समय दिया? मैंने कितने लोगों को जोड़ा? क्या मेरे व्यवहार में सेवा और आत्मीयता दिखाई देती है? क्या मैं समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील हूँ? क्या मैं अपने परिवार और व्यवसाय के साथ राष्ट्र के प्रति भी अपना दायित्व निभा रहा हूँ?
यही कारण है कि गुरु दक्षिणा को संघ की दृष्टि से एक प्रकार का वार्षिक आत्मपरीक्षण भी माना जा सकता है।
गुरु दक्षिणा : संघ की आर्थिक स्वावलंबन की आधारशिला
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति में गुरु दक्षिणा का एक व्यावहारिक पक्ष भी है।
किसी भी संगठन को अपने कार्यों के संचालन के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। संघ ने अपने कार्य के लिए स्वयंसेवकों के स्वैच्छिक योगदान को महत्व दिया।
इससे दो बातें सुनिश्चित होती हैं—पहली, संगठन अपने कार्य के लिए समाज और स्वयंसेवकों के सहयोग पर आधारित रहता है। दूसरी, स्वयंसेवक को यह अनुभव होता है कि वह केवल संगठन का सदस्य नहीं, बल्कि उसके कार्य का सहभागी और उत्तरदायी घटक है।
इस अर्थ में गुरु दक्षिणा आर्थिक स्वावलंबन और संगठनात्मक सहभागिता—दोनों का माध्यम बनती है।
गुरु पूर्णिमा और संघ : परंपरा से आधुनिकता तक
आज जब समाज तेजी से बदल रहा है, तकनीक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन रही है और व्यक्तिगत जीवन अधिक व्यस्त हो रहा है, तब गुरु पूर्णिमा का महत्व और बढ़ जाता है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नाम नहीं है।
व्यक्ति की सफलता तभी सार्थक है, जब वह समाज के लिए उपयोगी बने।
आज की परिस्थितियों में गुरु पूर्णिमा का संदेश और भी व्यापक हो जाता है—
ज्ञान मिले तो विनम्रता आए।
सामर्थ्य मिले तो सेवा बढ़े।
सफलता मिले तो समाज का स्मरण रहे।
और जीवन मिले तो राष्ट्र के काम आए।
निष्कर्ष : गुरु दक्षिणा से राष्ट्र दक्षिणा तक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए गुरु पूर्णिमा केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं है। यह एक ऐसी परंपरा है, जो स्वयंसेवक को अपने जीवन का मूल्यांकन करने और अपने ध्येय के प्रति पुनः समर्पित होने का अवसर देती है।
भगवा ध्वज के समक्ष अर्पित गुरु दक्षिणा वस्तुतः एक प्रतीक है—उस महान भारतीय परंपरा के प्रति श्रद्धा का, जिसने त्याग और तपस्या को जीवन का आदर्श माना।
संघ के लिए गुरु व्यक्ति नहीं, ध्येय है।
गुरु दक्षिणा धन नहीं, समर्पण है।
शाखा केवल कार्यक्रम नहीं, व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला है।
प्रचारक केवल कार्यकर्ता नहीं, समर्पित जीवन का उदाहरण है।
और स्वयंसेवक केवल संगठन का सदस्य नहीं, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिक है।
इसलिए गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश यही है कि हम अपने जीवन में किसी महान आदर्श को स्थान दें और उस आदर्श के प्रति अपने समय, श्रम, प्रतिभा और सामर्थ्य को समर्पित करें।
भगवा ध्वज के समक्ष झुकता हुआ स्वयंसेवक वस्तुतः अपने अहंकार को झुकाता है।
गुरु दक्षिणा में अर्पित धन केवल मुद्रा नहीं, बल्कि श्रद्धा का प्रतीक है।
और जब यह श्रद्धा सेवा में बदलती है, सेवा समर्पण में बदलती है और समर्पण राष्ट्रनिर्माण में बदलता है—तभी गुरु पूर्णिमा का वास्तविक अर्थ साकार होता है।
यही गुरु पूर्णिमा है।
यही गुरु दक्षिणा है।
और यही राष्ट्रकार्य की साधना है।