दरक रहे रिश्ते, टूट रहे परिवार : सोशल मीडिया

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    20-Jul-2026
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दरक रहे रिश्ते, टूट रहे परिवार : सोशल मीडिया
 

आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता
 
 
 
कभी घर का आंगन संवाद का केंद्र हुआ करता था। दिनभर की थकान के बाद परिवार के सदस्य एक साथ बैठते थे, सुख-दुख साझा करते थे और इसी संवाद में रिश्तों की गर्माहट बनी रहती थी। आज वही स्थान मोबाइल स्क्रीन ने ले लिया है। परिवार एक ही छत के नीचे रहता है, लेकिन हर व्यक्ति अपने-अपने डिजिटल संसार में कैद दिखाई देता है। तकनीक ने सुविधाएँ बढ़ाई हैं, परंतु उसने मानवीय संबंधों के सामने ऐसी चुनौतियाँ भी खड़ी कर दी हैं, जिनका प्रभाव समाज की मूल इकाई, अर्थात परिवार, पर स्पष्ट दिखाई देने लगा है।
 
 
सोशल मीडिया का उद्देश्य लोगों को जोड़ना था, लेकिन आज अनेक परिवारों में यही माध्यम दूरियों का कारण बनता दिखाई देता है। पति-पत्नी एक ही कमरे में बैठे होते हैं, किंतु संवाद की जगह दोनों अलग-अलग स्क्रीन पर व्यस्त रहते हैं। प्रेमी-प्रेमिका घंटों ऑनलाइन रहते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में विश्वास और पारदर्शिता का अभाव बढ़ता जाता है। माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताने के बजाय मोबाइल पर अधिक समय देने लगे हैं और बच्चे भी अपने अनुभव परिवार से साझा करने के बजाय उन्हें सोशल मीडिया पर प्रकाशित करना अधिक आवश्यक समझते हैं।
 
 
भारतीय संस्कृति में संबंध केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और विश्वास की नींव पर टिके होते हैं। विश्वास जितना गहरा होता है, संबंध उतने ही स्थायी होते हैं। सोशल मीडिया ने इस विश्वास की परीक्षा पहले से कहीं अधिक कठिन बना दी है। "लास्ट सीन", "ऑनलाइन", "ब्लू टिक", "फॉलो", "लाइक" और "कमेंट" जैसे छोटे-छोटे डिजिटल संकेत कई बार बड़े पारिवारिक विवादों का कारण बन जाते हैं। किसी अजनबी से लगातार बातचीत, पुराने मित्र से पुनः संपर्क या किसी पोस्ट पर अत्यधिक निकटता दर्शाने वाली टिप्पणी अनेक बार संदेह का बीज बो देती है। संदेह जब संवाद से दूर होता है, तो वह अविश्वास का रूप ले लेता है।
 
 
आज अनेक युवा अपने संबंधों का निर्माण सोशल मीडिया के माध्यम से करते हैं। प्रारंभिक आकर्षण, निरंतर चैट और आभासी निकटता उन्हें वास्तविक जीवन से भी अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है। किंतु यही संबंध कई बार झूठी पहचान, आधी-अधूरी जानकारी, कृत्रिम व्यक्तित्व और असत्य अपेक्षाओं पर आधारित होते हैं। जब वास्तविकता सामने आती है, तब निराशा, मानसिक तनाव और संबंध विच्छेद की स्थिति उत्पन्न होती है। प्रेम का स्थान अधिकार की भावना ले लेता है और संवाद का स्थान डिजिटल निगरानी।
 
 
आज एक नई प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जिसमें प्रेम संबंध विश्वास के बजाय निगरानी पर टिकने लगे हैं। एक-दूसरे का मोबाइल जांचना, पासवर्ड मांगना, लोकेशन साझा करवाना और हर गतिविधि पर नज़र रखना सामान्य व्यवहार समझने लगे हैं। यह प्रेम नहीं, बल्कि असुरक्षा की अभिव्यक्ति है। जहां विश्वास समाप्त होता है, वहां संबंध अधिक समय तक टिक नहीं पाते।
 
 
दांपत्य जीवन भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं है। विवाह परस्पर विश्वास, सम्मान और सहयोग का संबंध है, किंतु सोशल मीडिया ने कई बार इसमें अनावश्यक हस्तक्षेप किया है। डिजिटल गोपनीयता और वैवाहिक पारदर्शिता के बीच संतुलन न बन पाने के कारण पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ रहे हैं। अनेक परिवारों में यह प्रश्न विवाद का कारण बन जाता है कि देर रात तक किससे बातचीत हो रही थी, किसी विशेष व्यक्ति की पोस्ट पर बार-बार प्रतिक्रिया क्यों दी जा रही है या मोबाइल का पासवर्ड क्यों बदला गया। ऐसे प्रश्न यदि संवाद से हल न हों तो वे धीरे-धीरे संबंधों की नींव को कमजोर कर देते हैं।
 
 
पारिवारिक न्यायालयों के अनेक अधिवक्ताओं और परामर्शदाताओं का अनुभव है कि वैवाहिक विवादों में अब सोशल मीडिया चैट, स्क्रीनशॉट, डिजिटल संदेश और ऑनलाइन गतिविधियाँ भी साक्ष्य के रूप में सामने आने लगी हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर विवाद का कारण सोशल मीडिया है, बल्कि यह कि डिजिटल जीवन अब वैवाहिक संबंधों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने लगा है।
 
 
सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि कई बार यही अविश्वास हिंसा का रूप भी धारण कर लेता है। समाचारों में समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें सोशल मीडिया पर बने संबंध, ऑनलाइन मित्रता, डिजिटल बातचीत या संदेहास्पद चैट पहले से मौजूद पारिवारिक तनाव को इतना बढ़ा देते हैं कि परिणाम आत्महत्या, हत्या अथवा अन्य गंभीर अपराध के रूप में सामने आता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि इन अपराधों का एकमात्र कारण सोशल मीडिया है, किंतु अनेक मामलों में यह विवाद को तीव्र करने वाला महत्वपूर्ण कारक अवश्य सिद्ध हुआ है। जब संवाद समाप्त हो जाता है और संदेह निर्णय लेने लगता है, तब परिवार टूटते हैं और कभी-कभी अपराध भी जन्म लेते हैं।
 
 
भारत में पिछले कुछ वर्षों के अनेक चर्चित मामलों में देखा गया है कि पति-पत्नी के बीच अविश्वास, विवाहेतर संबंधों की आशंका, सोशल मीडिया पर बनी निकटता अथवा डिजिटल संदेशों ने पहले से चल रहे तनाव को और बढ़ा दिया। कई घटनाओं में बच्चों ने अपने माता-पिता को खो दिया, कई परिवार पूरी तरह बिखर गए और समाज को यह सोचने पर विवश होना पड़ा कि तकनीक का विवेकहीन उपयोग कितना विनाशकारी हो सकता है।
 
 
सोशल मीडिया का एक और दुष्प्रभाव तुलना की संस्कृति है। लोग दूसरों के जीवन का केवल आकर्षक पक्ष देखते हैं। महंगी यात्राएँ, उपहार, उत्सव और कृत्रिम मुस्कानें देखकर अपने जीवन से असंतोष बढ़ने लगता है। पति-पत्नी एक-दूसरे की तुलना दूसरे लोगों से करने लगते हैं। प्रेम संबंधों में अवास्तविक अपेक्षाएँ जन्म लेने लगती हैं। वास्तविक जीवन की छोटी-छोटी कठिनाइयाँ भी असहनीय प्रतीत होने लगती हैं।
 
 
बच्चों पर इसका प्रभाव भी अत्यंत गंभीर है। जब माता-पिता स्वयं मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तब बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिल पाती। वे परिवार के भीतर संवाद के बजाय इंटरनेट पर समाधान खोजने लगते हैं। दादा-दादी की कहानियों, संयुक्त परिवार की सीख और संस्कारों का स्थान एल्गोरिद्म आधारित सामग्री लेने लगती है। परिणामस्वरूप अगली पीढ़ी तकनीकी रूप से सक्षम तो बन रही है, किंतु भावनात्मक रूप से अधिक अकेली भी होती जा रही है।
 
 
भारतीय चिंतन में परिवार को केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं माना गया है। महाउपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य "वसुधैव कुटुम्बकम्" समूची पृथ्वी को परिवार मानने की भावना व्यक्त करता है। यदि हम अपने छोटे परिवार में ही विश्वास, संवाद और आत्मीयता को सुरक्षित नहीं रख पाएंगे, तो व्यापक सामाजिक एकता भी कमजोर होती जाएगी।
 
 
इस संकट का समाधान तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि उसका संयमित और उत्तरदायी उपयोग है। प्रत्येक परिवार को कुछ डिजिटल अनुशासन अपनाने होंगे। भोजन के समय मोबाइल से दूरी, प्रतिदिन कुछ समय परिवार के साथ आमने-सामने संवाद, सप्ताह में एक दिन "डिजिटल अवकाश", बच्चों के स्क्रीन समय पर संतुलित नियंत्रण और पति-पत्नी के बीच खुला एवं ईमानदार संवाद आज समय की आवश्यकता बन चुके हैं। संबंध पासवर्ड से नहीं, विश्वास से सुरक्षित रहते हैं।
 
 
शिक्षण संस्थानों में डिजिटल साक्षरता के साथ डिजिटल नैतिकता का प्रशिक्षण भी अनिवार्य होना चाहिए। युवाओं को यह समझाना होगा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन पूर्ण सत्य नहीं होता। किसी भी संबंध का आधार आभासी आकर्षण नहीं, बल्कि चरित्र, संवेदनशीलता, उत्तरदायित्व और परस्पर सम्मान होना चाहिए।