उम्माह पर भारी पड़ी राष्ट्रीयता: मलेशिया में रोहिंग्या विवाद ने सामने ला दी इस्लामी एकता के दावों की सच्‍चाई

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    30-Jun-2026
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- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार
 
 
इस्लामी चिंतन में "उम्माह" एक ऐसा मजहबी (धार्मिक) शब्द है, जिसमें व्यापक तौर पर इस्‍लामिक जीवन की सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक अवधारणा शामिल है। इसका मूल भाव यह है कि दुनिया भर के मुसलमान नस्ल, भाषा, भूगोल और राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर एक साझा समुदाय का हिस्सा हैं। इस अवधारणा के अनुसार, किसी भी कोने में रहने वाला मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है और संकट की घड़ी में उसकी सहायता करना उसका धार्मिक और नैतिक दायित्व है, लेकिन जब आदर्शों की यह ऊँची इमारत वास्तविक जीवन की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से टकराती है, तब कई बार एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है। "उम्माह" धरा का धरा रह जाता है और उस पर राष्‍ट्रीयता सदैव विजय प्राप्‍त करती है।
 
 
ऐसे में ये "उम्माह" की सोच गैर मुसलमानों के लिए तो काम करती है, लेकिन परस्‍पर इस्‍लाम के अनुयायियों के लिए एक सीमा के बाद इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता, जहां उसके परस्‍पर आर्थिक और सामाजिक हित टकराने लगते हैं।
 
 
दरअसल, आज मलेशिया में रोहिंग्या शरणार्थियों के साथ क्‍या हो रहा है? वही हो रहा है जो एक देश में बाहर से आए घुसपैठियों के साथ व्‍यवहार होना चाहिए! यहां "उम्माह" कहीं गुम हो गया है! क्‍योंकि यहां चल रहा विवाद इसी विरोधाभास को उजागर कर रहा है। जिस देश ने वर्षों तक रोहिंग्या मुसलमानों को कभी इस्‍लाम के होने के आधार पर शरण दी, वहीं अब बड़ी संख्या में स्थानीय मुसलमान उन्हें देश से बाहर निकालने की मांग कर रहे हैं। यह स्थिति यही बता रही है कि राष्ट्रीय हित और नागरिकता की भावना इस्‍लाम के "उम्माह" की अवधारणा पर भारी पड़ रही है!
 
 
मलेशिया में रोहिंग्या विवाद
 
म्यांमार से भागे रोहिंग्या मुसलमान लंबे समय से मलेशिया को एक सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखते रहे हैं। मुस्लिम बहुल मलेशिया ने भी उन्हें आश्रय दिया, लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। हाल के महीनों में सोशल मीडिया पर रोहिंग्या विरोधी अभियान तेज हुआ है। Change.org पर शुरू हुई एक याचिका में मलेशियाई सरकार से मांग की गई कि रोहिंग्या शरणार्थियों को किसी तीसरे देश में पुनर्स्थापित किया जाए या उन्हें म्यांमार के निकट क्षेत्रों में सहायता प्रदान की जाए, पर अपने शहरों, कस्‍बों, गांवों से इन रोहिंग्‍याओं को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाए। इस याचिका को लाखों लोगों का समर्थन मिला।
 
 
याचिका में दावा किया गया कि रोहिंग्या समुदाय की बढ़ती उपस्थिति से संसाधनों, सामाजिक सेवाओं और बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है। साथ ही सुरक्षा और सामाजिक संतुलन को लेकर भी चिंताएँ व्यक्त की गईं। मलेशिया के स्थानीय नागरिकों का एक वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि सीमित संसाधनों वाले देश में प्राथमिकता किसे मिलनी चाहिए; अपने नागरिकों को या शरणार्थियों को? यहां के मूल निवासियों का तर्क है कि मलेशिया 1951 के यूएन शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए शरणार्थियों को कानूनी रूप से काम करने या सरकारी सुविधाओं का पूरा अधिकार प्राप्त नहीं है। अब फिर हम क्‍यों इन रोहिंग्‍याओं का बोझ ढो रहे हैं? ये रोहिंग्‍या शरणार्थी प्रत्‍यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार और संसाधनों पर दबाव डाल रहे हैं।
 
 
स्थानीय नागरिकों का इसके साथ एक तर्क यह भी है कि नागरिक अधिकार और राष्ट्रीय हित किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी होते हैं। उनके अनुसार, सिर्फ धार्मिक समानता किसी देश के संसाधनों पर समान अधिकार का आधार नहीं बन सकती। स्‍वभाविक है कि यह दृष्टिकोण आधुनिक राष्ट्र-राज्य की उस अवधारणा से जुड़ा है जिसमें राज्य की पहली जवाबदेही अपने नागरिकों के प्रति मानी जाती है।
 
 
विवाद के सामाजिक और आर्थिक कारण
 
रोहिंग्या समुदाय को लेकर असंतोष उनके सांस्कृतिक कारणों या उनके पलायनवादी होने के कारण से ही नहीं है, इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक कारक भी महत्वपूर्ण हैं। बीते दिनों बकरीद के अवसर पर हुई कुर्बानी के बाद फैली गंदगी और उससे जुड़े विवादों ने भी सोशल मीडिया पर असंतोष को बढ़ावा दिया। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि जो समुदाय स्वयं सहायता पर निर्भर है, वह इतने बड़े पैमाने पर पशु खरीदने में सक्षम कैसे हुआ? इन सवालों ने पहले से मौजूद नाराजगी को और हवा दी। अब मलेशिया के लाखों लोग इन रोहिंग्‍याओं को हर हाल में अपने देश से बाहर करना चाहते हैं।
 
 
प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम का कहना है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने या उन्हें किसी तीसरे देश में बसाने के प्रयास अब तक विफल रहे हैं। वे कहते हैं, “म्यांमार के नागरिकों, विशेषकर रोहिंग्याओं को मेरी सलाह है कि उन्हें भी हमारे नियमों का पालन करना होगा। उनकी इमारतों और व्यवसायों को नियमों का पालन करना होगा। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो हमारे पास कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।” उन्होंने कहा कि जनता को सभी प्रकार के दुर्व्यवहार की सूचना अधिकारियों को देनी चाहिए, जो कानून के आधार पर कार्रवाई करेंगे।
 
 
पेराक में मंजुंग जिले में रोहिंग्याओं की सबसे बड़ी बस्ती होने की खबर पर टिप्पणी करने के लिए पूछे जाने पर, अलवी ने कहा कि पुलिस इस मामले पर राज्य सरकार के साथ चर्चा करेगी और शरणार्थियों की नियमित रूप से निगरानी करेगी, जिनमें से अधिकांश के पास संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) कार्ड हैं। यहां पूरा इस्‍लामी उम्‍माह धरा का धरा रह गया! वास्‍तव में मलेशिया में हो रहीं रोहिग्‍याओं पर कार्रवाइयां इस बात का सबूत हैं कि किसी भी देश में जाकर आप एक मजहब या धर्म के आधार पर अपनी मनमानी नहीं चला सकते हैं। शरणार्थी सदैव शरणार्थी ही रहता है, जब तक कि उस देश के लोग या सरकार नहीं चाहती।
 
 
भारत में रोहिंग्‍याओं को इस तरह मदद मिल रही
 
अब भारत के संदर्भ में इसे समझते हैं। भारत में जब भी रोहिंग्‍याओं पर केंद्र या कोई राज्‍य सरकार कार्रवाई करती है, कई इस्‍लामिक संगठन खड़े हो जाते हैं, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में पीआइएल तक लगा दी जाती हैं। भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोहिंग्या प्रवासियों का समर्थन करने वाले, उन्हें कानूनी सहायता देने वाले और मानवीय मदद पहुंचाने वाले संगठनों तथा व्यक्तियों की एक लंबी सूची है।
 
 
इन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में देखा जा सकता है- एक वे कानूनविज्ञ और मानवाधिकार संगठन (NGOs) हैं, जिनके द्वारा भारत की अदालतों (सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट) में रोहिंग्याओं के अधिकारों, उनकी बच्चों की शिक्षा और निर्वासन (Deportation) के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है।
 
 
रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (ROHRINGYA): यह भारत में सक्रिय मुख्य एनजीओ है जो सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाने और राशन जैसी बुनियादी सुविधाएं दिलाने के लिए याचिकाएं दायर करता रहा है. ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क (HRLN): वरिष्ठ वकील कॉलीन गोंजाल्विस का यह संगठन रोहिंग्या प्रवासियों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करता है और उनकी गिरफ्तारी या निर्वासन के खिलाफ अदालतों में पैरवी करता है।
 
 
बंदी मुक्ति कमेटी (पश्चिम बंगाल): यह संगठन भारत की जेलों या डिटेंशन सेंटरों में बंद प्रवासियों की रिहाई के लिए काम करता है.वर्किंग ग्रुप ऑन अल्टरनेटिव स्ट्रेटेजीज (दिल्ली): मानवाधिकारों और शरणार्थियों के कानूनी अधिकारों की वकालत करने वाला दिल्ली स्थित समूह.केरल मुस्लिम कल्चर सेंटर (KMCC): दक्षिण भारत और दिल्ली के कुछ इलाकों में रोहिंग्या प्रवासियों को वित्तीय और सामाजिक सहायता देने में शामिल रहा है.एक्शनएड एसोसिएशन (ActionAid India): शरणार्थियों की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करने और उनके स्वास्थ्य-शिक्षा की वकालत करने वाला संगठन है।
 
 
रोहिंग्‍याओं के समर्थन में बिछा एनजीओ का जाल
 
दूसरे नंबर पर आती हैं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और वैश्विक संगठन- UNHCR (संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त): संयुक्त राष्ट्र की यह एजेंसी भारत में रह रहे रोहिंग्याओं की पहचान कर उन्हें 'शरणार्थी कार्ड' (Refugee Card) जारी करती है, ताकि उन्हें सुरक्षा मिल सके।एम्नेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International): यह वैश्विक मानवाधिकार संगठन भारत सरकार द्वारा रोहिंग्याओं को म्यांमार वापस भेजने (Deportation) के फैसलों का कड़ा विरोध करता है और उनकी सुरक्षा की मांग करता है।ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch): वैश्विक स्तर पर म्यांमार सेना की कार्रवाई को उजागर करने और भारत सहित अन्य देशों से रोहिंग्याओं को न निकालने की अपील करने वाला संगठन है।
 
 
वकीलों की पूरी फौज है, रोहिंग्‍याओं के पास
 
इसी तरह से तीसरे क्रमांक पर वे प्रमुख व्यक्ति और वकील (जो कोर्ट में पैरवी करते हैं)अदालतों में रोहिंग्याओं के समर्थन में याचिकाएं लगाने और उनके मानवाधिकारों की बहस करने वाले हैं, इनमें आज प्रमुख नाम: कॉलीन गोंजाल्विस (Senior Advocate): इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्याओं की तरफ से कई महत्वपूर्ण केस लड़े हैं। प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल: वरिष्ठ वकीलों के तौर पर इन्होंने रोहिंग्याओं के मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला देकर उनके जबरन निर्वासन पर रोक लगाने की मांग की है। कोर्ट में पैरवी करने वाले अन्य वरिष्ठ वकीलों में डॉ. राजीव धवन, डॉ. अश्विनी कुमार (पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और वरिष्ठ वकील का प्रमुखता से नाम आता है।
 
 
मोहम्मद सलीमुल्लाह और मोहम्मद शाकिर: ये स्वयं रोहिंग्या शरणार्थी हैं, जिन्होंने सबसे पहले भारत सरकार के निर्वासन कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।सरकारी जांच और विवादभारतीय गृह मंत्रालय और खुफिया एजेंसियों ने समय-समय पर देश की आंतरिक सुरक्षा को देखते हुए इन संगठनों की गतिविधियों पर नजर रखी है। सरकार का मानना है कि कुछ संगठन अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देने और प्रवासियों के फर्जी आधार कार्ड या राशन कार्ड बनवाने में मदद करते हैं, जिसे लेकर जम्मू-कश्मीर और असम जैसे राज्यों में जांच भी चल रही हैं।
 
 
जमात-उलेमा-ए-हिंद करता है व्‍यापक स्‍तर पर मदद
 
भारत में पहले उल्लेखित संगठनों के अलावा कई अन्य धार्मिक, सामाजिक, कानूनी और मानवाधिकार समूह तथा प्रख्यात व्यक्ति भी हैं जो रोहिंग्याओं को भारत में आश्रय देने, उनके बच्चों की शिक्षा, मुफ्त कानूनी सहायता और मानवीय मदद का समर्थन करते रहे हैं।मुख्य नामों में इस्‍लामिक मजहबी संगठन जमात-उलेमा-ए-हिंद (Jamiat Ulema-e-Hind) है, यह भारत का प्रमुख मुस्लिम संगठन है, जो दिल्ली, हरियाणा (नूंह) और अन्य राज्यों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को सर्दियों में कंबल, राशन और वित्तीय सहायता जैसी मानवीय राहत प्रदान करता है।
 
 
मल्टीपल एक्शन रिसर्च ग्रुप (MARG): यह एनजीओ विस्थापितों और शरणार्थियों को कानूनी तौर पर सशक्त बनाने, उनके बुनियादी अधिकारों के लिए काम करता है।रेड क्रिसेंट सोसाइटी ऑफ इंडिया (RCSI): मुंबई स्थित मुख्यालय वाला यह संगठन भारत में रहने वाले और पड़ोसी देशों (जैसे बांग्लादेश के कॉक्स बाजार कैंप) में शरण लिए हुए रोहिंग्याओं के लिए "ऑपरेशन ह्यूमैनिटी" के तहत राहत सामग्री और चिकित्सा सहायता भेजता रहा है।
 
 
स्थानीय और क्षेत्रीय जमीनी समूह में हैदराबाद के स्थानीय एनजीओ और बाल-हितैषी समूह: हैदराबाद (जहां भारत में रोहिंग्याओं की एक बड़ी आबादी है) में कई स्थानीय नागरिक समाज संगठन काम कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के कुछ स्थानीय गैर-सरकारी संगठन (CSOs): सुरक्षा एजेंसियों की जांच के अनुसार, जम्मू क्षेत्र (जैसे नरवाल, सुजवा और भटिंडी बस्तियों) में कुछ स्थानीय सामाजिक संगठन और मदरसे सक्रिय हैं, जो रोहिंग्याओं को वहां रहने, काम ढूंढने और बुनियादी नागरिक सुविधाएं जुटाने में मदद करते रहे हैं।
 
 
यानी एक तरफ मुस्‍लिम देश मलेशिया है जो ‘उम्‍माह’ की सोच से ऊपर उठकर अपने राष्‍ट्र को प्राथमिकता देते हुए पहले अपने नागरिकों की चिंता करने की बात करता है । साथ ही वहां के नागरिक भी पहले अपने देश के लोगों के लिए खड़े होने की और मलेशिया से रोहिंग्‍याओं को बाहर करने के लिए आन्‍दोलन चला रहे हैं, तो दूसरी ओर कथित भारत के मुसलमान, कई एनजीओ और एडवोकेट, राजनेता हैं जो रोहिंग्‍याओं को भारत में हर सुविधा देने के लिए कार्य कर रहे हैं! क्‍या इन घुसपैठियों के कारण से भारत पर दबाव नहीं पड़ रहा है?
 
 
धज्‍ज‍ियां उड़ रही है उम्‍माह की, लड़ रहे हैं आपस में मुस्‍लिम देश !
 
वर्तमान में दुनिया के कई मुस्लिम-बहुल देश सीधे युद्ध, प्रॉक्सी वॉर या गंभीर आंतरिक संघर्षों में उलझे हुए हैं। मुख्य रूप से 6 से 7 देश इस टकराव का केंद्र बने हुए हैं, सऊदी अरब बनाम ईरान, यह क्षेत्र में वर्चस्व की सबसे बड़ी जंग है। दोनों देश यमन और सीरिया जैसे देशों में 'प्रॉक्सी वॉर' (छद्म युद्ध) लड़ रहे हैं।
 
 
यमन और सीरिया: यमन में ईरान-समर्थित हुती विद्रोहियों और सऊदी-समर्थित सरकार के बीच जंग जारी है। सीरिया में शिया-नेतृत्व वाली सरकार और सुन्नी विद्रोही गुट आपस में लड़ रहे हैं।
 
 
सूडान और लीबिया: सूडान में दो मुस्लिम सैन्य जनरलों के बीच सत्ता के लिए भीषण गृहयुद्ध चल रहा है। लीबिया भी वर्षों से दो प्रतिद्वंद्वी सरकारों और सशस्त्र गुटों के बीच बंटा हुआ है।आपसी लड़ाई के मुख्य कारणशिया-सुन्नी संप्रदायवाद: ईरान (शिया प्रधान) और सऊदी अरब (सुन्नी प्रधान) के बीच धार्मिक और भू-राजनीतिक नेतृत्व की होड़ इस संघर्ष की सबसे बड़ी वजह है।
 
 
सत्ता और तानाशाही: लीबिया और सूडान जैसे देशों में मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं न होने के कारण सेना और विद्रोही गुटों में सत्ता हथियाने का खूनी संघर्ष चल रहा है। इसी तरह से पाकिस्‍तान और अफगानिस्‍तान में अघोषित युद्ध चल रहा है। पाकिस्‍तान सेना कभी भी अफगानिस्‍तान में घुस कर अफगानियों को मार देती है, इसी प्रकार से अफगान इन दिनों पाकिस्‍तान में आए दिन बम फोड़ रहे हैं।
 
 
यानी कि यहां इस्‍लाम की अवधारणा ‘उम्‍माह’ के कोई मायने नहीं रहते हैं, लेकिन जहां इस्‍लाम का राज्‍य नहीं, जैसे भारत, श्रीलंका, नेपाल एवं अन्‍य भारतीय उपमहाद्वीप के देश एवं यूरोपीय, अमेरिकन देश वहां ‘उम्‍माह’ सिर चढ़कर बोल रहा है! “राजनीतिक इस्‍लाम” वहां अपने पूरे प्रभाव में है। जिसमें गैर मुसलमानों की जहां भी सत्‍ता है, सबसे पहले ‘उम्‍माह’ के नाम पर लोगों को उकसाकर, भड़काकर वहां सत्‍ता पर काबिज होना है। बाद में फिर आपस में लड़ते रहेंगे, मरते रहेंगे! संसाधनों पर कब्‍जे करते रहेंगे! जैसा कि कई मुस्‍ल‍िम देशों के बीच आज हम युद्ध या युद्ध जैसे हालातों के रूप में स्‍थ‍िति देख ही रहे हैं।
 
 
ऐसे में फिलहाल “उम्‍माह” गैर मुसलमानों के ऊपर घोषित और अघोषित यु्द्ध के रूप में नजर आ रहा है, जिसमें गैर मुसलमानों के लिए शांति से रहने के लिए कोई स्‍थान नहीं है! भारत जैसे गैर मुस्‍लि‍म देशों में उम्‍माह दिनों दिन हावी होता हुआ नजर आ रहा है!