दानवीर नहीं, राष्ट्रनिर्माण के आर्थिक आधार-स्तंभ थे भामाशाह

भामाशाह जयंती (28 जून): राष्ट्रधर्म, त्याग और स्वाभिमान के अमर पुरोधा

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    28-Jun-2026
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डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
 
 
जिस धन से राष्ट्र सुरक्षित हो, वही धन पवित्र कहलाता है।
जिस जीवन से मातृभूमि का गौरव बढ़े, वही जीवन सफल होता है।
इतिहास केवल तलवार चलाने वालों को ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वालों को भी अमर कर देता है।
 
 
भारत के गौरवशाली इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपने पराक्रम, त्याग, तपस्या और राष्ट्रनिष्ठा से आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श स्थापित किए। कुछ ने रणभूमि में तलवार उठाकर मातृभूमि की रक्षा की, तो कुछ ने अपने ज्ञान, संगठन, नीति और धन-संपदा के माध्यम से राष्ट्र की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा की। ऐसे ही महान राष्ट्रपुरुष थे भामाशाह, जिनका नाम भारतीय इतिहास में त्याग, राष्ट्रभक्ति, निष्ठा और समर्पण के सर्वोच्च प्रतीकों में लिया जाता है। 28 जून को उनकी जयंती केवल एक महापुरुष का जन्मोत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को पुनः स्मरण करने का अवसर है।
 
 
भामाशाह का जन्म 28 जून 1547 को मेवाड़ में हुआ। उनके पिता भारमल मेवाड़ राज्य के प्रतिष्ठित अधिकारी थे। परिवार में राष्ट्रसेवा, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की परंपरा थी। इन्हीं संस्कारों ने बालक भामाशाह के व्यक्तित्व को आकार दिया। वे बचपन से ही बुद्धिमान, दूरदर्शी, साहसी और संगठन-कुशल थे। आगे चलकर वे मेवाड़ के महान योद्धा महाराणा प्रताप के सबसे विश्वसनीय सहयोगी, वित्त मंत्री, सेनानायक और रणनीतिक सलाहकार बने।
 
 
सोलहवीं शताब्दी का भारत विदेशी सत्ता के विस्तार का साक्षी था। मुगल सम्राट अकबर अधिकांश भारतीय राज्यों को अपने अधीन कर चुका था, किंतु मेवाड़ के स्वाभिमानी शासक महाराणा प्रताप ने कभी भी पराधीनता स्वीकार नहीं की। उन्होंने स्वराज, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए आजीवन संघर्ष किया। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध के बाद परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हो गईं। युद्ध में अपार साहस के बावजूद संसाधनों की कमी के कारण महाराणा प्रताप को अरावली के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में रहकर संघर्ष जारी रखना पड़ा। उनके पास न पर्याप्त सेना थी, न धन और न ही युद्ध सामग्री। इतिहास में वर्णित है कि अनेक अवसरों पर उनके परिवार को घास की रोटी तक खानी पड़ी।
 
 
ऐसे कठिन समय में जब अनेक सहयोगियों ने साथ छोड़ दिया, तब भामाशाह ने अपने राष्ट्रधर्म का परिचय दिया। उन्होंने अपने भाई ताराचंद के साथ मिलकर अपनी समस्त संचित संपत्ति महाराणा प्रताप के चरणों में समर्पित कर दी। यह केवल धन का दान नहीं था, बल्कि राष्ट्र की स्वतंत्रता को पुनर्जीवित करने का संकल्प था। कहा जाता है कि इस धन से लगभग पच्चीस हजार सैनिकों का कई वर्षों तक भरण-पोषण और युद्ध संचालन संभव हुआ। इसी आर्थिक शक्ति ने महाराणा प्रताप को पुनः सेना संगठित करने, युद्ध की तैयारी करने और मेवाड़ के अधिकांश क्षेत्रों को वापस प्राप्त करने का सामर्थ्य प्रदान किया।
 
 
भामाशाह का यह त्याग भारतीय इतिहास में अद्वितीय है। उन्होंने अपना धन किसी यश, प्रसिद्धि या धार्मिक प्रदर्शन के लिए नहीं दिया, बल्कि मातृभूमि की रक्षा और स्वाधीनता के लिए समर्पित किया। यही कारण है कि उनका दान भारतीय संस्कृति में राष्ट्रधर्म की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना जाता है। यदि महाराणा प्रताप स्वतंत्रता के संघर्ष के प्रतीक हैं, तो भामाशाह उस संघर्ष की आर्थिक शक्ति और आत्मबल के प्रतीक हैं।
 
 
इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी राष्ट्र की रक्षा केवल सैनिकों के साहस से नहीं होती। युद्ध के लिए संसाधन चाहिए, संसाधनों के लिए मजबूत अर्थव्यवस्था चाहिए और अर्थव्यवस्था के लिए ऐसे राष्ट्रभक्त चाहिए जो व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखें। भामाशाह ने यह सिद्ध किया कि राष्ट्रनिर्माण में आर्थिक योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना रणभूमि में शौर्य प्रदर्शन।
 
 
भामाशाह केवल दानवीर ही नहीं, बल्कि कुशल प्रशासक, दूरदर्शी अर्थशास्त्री और उत्कृष्ट संगठनकर्ता भी थे। उन्होंने मेवाड़ की वित्त व्यवस्था को मजबूत बनाया और संकट की घड़ी में राज्य की आर्थिक रीढ़ बनकर खड़े रहे। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि राष्ट्र की रक्षा तलवार और खजाने दोनों के संतुलित सहयोग से होती है।
 
 
आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब भामाशाह का जीवन और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आज राष्ट्रसेवा का स्वरूप बदल गया है। अब देश की सेवा केवल सीमा पर जाकर ही नहीं, बल्कि शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, उद्योग, कृषि, चिकित्सा, सामाजिक सेवा, पर्यावरण संरक्षण और ईमानदार कर भुगतान के माध्यम से भी की जा सकती है। यदि देश का प्रत्येक सक्षम नागरिक अपने संसाधनों, ज्ञान और समय का कुछ भाग समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित करे, तो यही भामाशाह के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
 
 
नई पीढ़ी को भामाशाह को इसलिए याद रखना चाहिए क्योंकि उन्होंने सिखाया कि राष्ट्र सबसे पहले है। उन्होंने बताया कि धन का वास्तविक मूल्य तभी है जब वह समाज और राष्ट्र के कल्याण में लगे। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों से समझौता नहीं करना चाहिए। आज जब भौतिक सफलता को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना जा रहा है, तब भामाशाह का जीवन हमें याद दिलाता है कि चरित्र, त्याग और राष्ट्रभक्ति ही मनुष्य को अमर बनाते हैं।
 
 
विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भामाशाह के जीवन का अध्ययन केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग के रूप में नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण के आदर्श के रूप में कराया जाना चाहिए। युवाओं को यह समझना होगा कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों का दायित्व नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। जिस दिन समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य को भामाशाह की भावना से निभाने लगेगा, उस दिन भारत आत्मनिर्भर, समृद्ध और विश्वगुरु बनने की दिशा में और अधिक सशक्त होगा।
 
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भामाशाह की जयंती को केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित न रखें, बल्कि उनके जीवन-दर्शन को अपने व्यवहार में उतारें। राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखें, ईमानदारी को जीवन का आधार बनाएं, समाज के कमजोर वर्गों की सहायता करें, शिक्षा और संस्कारों को बढ़ावा दें तथा अपने संसाधनों का उपयोग राष्ट्र और समाज के उत्थान के लिए करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
 
 
भामाशाह का जीवन हमें यह संदेश देता है कि इतिहास उन्हीं लोगों को अमर करता है जो अपने जीवन को किसी महान उद्देश्य के लिए समर्पित कर देते हैं। महाराणा प्रताप की तलवार और भामाशाह का त्याग दोनों ने मिलकर मेवाड़ के स्वाभिमान और भारत की स्वतंत्रता की चेतना को जीवित रखा। इसलिए भामाशाह केवल इतिहास के एक पात्र नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रचेतना के अमर दीपस्तंभ हैं।
 
 
धन का अहंकार नहीं, राष्ट्र का सम्मान होना चाहिए।
संपत्ति का संग्रह नहीं, समाज का उत्थान होना चाहिए।
भामाशाह का जीवन हमें यही संदेश देता है कि मातृभूमि से बढ़कर कोई संपदा नहीं होती और राष्ट्रधर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
 
 
वंदे मातरम्।