प्रसिद्धि परांगमुख गोविन्द कृष्ण भुस्कुटे

संघ नींव में ज्ञात - अज्ञात विसर्जित पुष्प श्रृंखला 237

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    13-Jun-2026
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भाऊसाहब भुस्कुटे के नाम से प्रसिद्ध गोविन्द कृष्ण भुस्कुटे का जन्म 14 जून, 1915 को बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) में हुआ था । संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी की दृष्टि बड़ी अचूक थी। उन्होंने ढूंढ-ढूंढकर ऐसे हीरे एकत्र किये, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन और परिवार की चिन्ता किये बिना पूरे देश में संघ कार्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 18 वीं सदी में भाऊसाहब भुस्कुटे के अधिकांश पूर्वजों को जंजीरा के किलेदार सिद्दी ने मार डाला था। जो किसी तरह बच गये, वे पेशवा की सेना में भर्ती हो गये। उनके शौर्य से प्रभावित होकर पेशवा ने उन्हें बुरहानपुर, टिमरनी और निकटवर्ती क्षेत्र की जागीर उपहार में दे दी थी। उस क्षेत्र में लुटेरों का बड़ा आतंक था, पर इनके पुरखों ने उन्हें कठोरता से समाप्त किया। इस कारण इनके परिवार को पूरे क्षेत्र में बड़े आदर से देखा जाता था।
 
 
इनका परिवार टिमरनी की विशाल गढ़ी में रहता था। भाऊसाहब सरदार कृष्णराव एवं माता अन्नपूर्णा की एकमात्र सन्तान थे। अतः इन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं देखना पड़ा। प्राथमिक शिक्षा अपने स्थान पर ही पूरी कर वे पढ़़ने के लिये नागपुर आ गये। वर्ष 1932 की विजयादशमी से वे नियमित शाखा पर जाने लगे। वर्ष 1933 में उनका सम्पर्क डॉ. हेडगेवार जी से हुआ। भाऊसाहब ने वर्ष 1937 में बी.ए. ऑनर्स, 1938 में एम.ए. तथा 1939 में कानून की परीक्षायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसी दौरान उन्होंने संघ शिक्षा वर्गों का प्रशिक्षण भी पूरा किया और संघ योजना से प्रतिवर्ष शिक्षक के रूप में देश भर के वर्गों में जाने लगे।
 
 
जब भाऊसाहब ने प्रचारक बनने का निश्चय किया, तो वंश समाप्ति के भय से घर में खलबली मच गई, क्योंकि वे अपने माता-पिता की एकमात्र सन्तान थे। प्रारम्भ में उन्हें झांसी भेजा गया, पर फिर डॉ. हेडगेवार ने उन्हें गृहस्थ जीवन अपनाकर प्रचारक जैसा काम करने की अनुमति दी। वर्ष 1941 में उनका विवाह हुआ और इस प्रकार वे गृहस्थ प्रचारक बने। वे संघ से केवल प्रवास व्यय लेते थे, शेष खर्च वे अपनी जेब से करते थे। यद्यपि भाऊसाहब बहुत सम्पन्न परिवार के थे, परन्तु उनका रहन सहन इतना साधारण था कि किसी को ऐसा अनुभव ही नहीं होता था। प्रवास के समय अत्यधिक निर्धन कार्यकर्ता के घर रुकने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। धार्मिक वृत्ति के होने के बाद भी वे देश और धर्म के लिये घातक बनीं रूढ़ियों तथा कार्य में बाधक धार्मिक परम्पराओं से दूर रहते थे। द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी सब कार्यकर्ताओं को भाऊसाहब से प्रेरणा लेने को कहते थे।
 
 
वर्ष 1948 में गांधी हत्याकाण्ड के समय उन्हें गिरफ्तार कर छह मास तक होशंगाबाद जेल में रखा गया, पर मुक्त होते ही उन्होंने संगठन के आदेशानुसार फिर सत्याग्रह कर दिया। इस बार वे प्रतिबंध समाप्ति के बाद ही जेल से बाहर आये। आपातकाल में वर्ष 1975 से 1977 तक पूरे समय वे जेल में रहे। जेल में उन्होंने अनेक स्वयंसेवकों को संस्कृत तथा अंग्रेजी सिखाई। जेल में ही उन्होंने ‘हिन्दू धर्म: मानव धर्म’ नामक ग्रन्थ की रचना की।
 
 
उन पर प्रान्त कार्यवाह से लेकर क्षेत्र प्रचारक तक के दायित्व रहे। भारतीय किसान संघ की स्थापना होने पर श्री दत्तोपन्त ठेंगड़ी जी के साथ भाऊसाहब भी उसके मार्गदर्शक रहे। 75 वर्ष पूरे होने पर कार्यकर्ताओं ने उनके ‘अमृत महोत्सव’ की योजना बनायी। भाऊसाहब इसके लिये बड़ी कठिनाई से तैयार हुये। वे कहते थे कि मैं उससे पहले ही भाग जाऊँगा और तुम ढूँढते रह जाओगे। वसंत पंचमी (21 जनवरी, 1991) की तिथि इसके लिये निश्चित की गयी, परन्तु उससे बीस दिन पूर्व 1 जनवरी, 1991 को उनका स्वर्गवास हो गया। इस प्रकार एक ओर पुष्प संघ नींव में विसर्जित हो गया।।
 
 
।। भारत माता की जय।।
सन्दर्भ : जीवन दीप जले भाग -1
संकलन - स्वयंसेवक एवं टीम