स्वाधीनता का अप्रतिम योद्धाः हल्दीघाटी के महानायक महाराणा प्रताप की अमर गाथा

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    09-May-2026
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maharna pratap
 
 
 
-डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
 
 
जिस राष्ट्र के अपने वीरों की गाथाएँ होती हैं, उसका इतिहास कभी पराजित नहीं होता। ऐसे ही एक वीर सपूत हुए हैं-मेवाड़ के सिसौदिया राजवंश से ताल्लुक रखने वाले अदम्य साहसी और स्वाभीमानी वीर महाराणा प्रताप। पाठकों को बताता चलूं कि 9 मई को राजस्थान में मेवाड़ के गौरव कहलाने वाले, भारतीय इतिहास की शौर्य गाथाओं में स्वर्णिम अक्षरों में अकित, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करने वाले वीर योद्धा और अदम्य साहस के प्रतीक कहलाने वाले महाराणा प्रताप की जयंती को एक प्रमुख सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दिवस के रूप में मनाया जाता है। महाराणा प्रताप का पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया था, जिनका जन्म 9 मई, 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग, राजस्थान में हुआ था, तथा जिनके पिता का नाम महाराणा उदयसिंह तथा माता का नाम रानी जयवंता बाई था। आपके बचपन का नाम कीका था, जो भील समुदाय द्वारा आपको दिया गया था। विश्व प्रसिद्ध स्वामीभक्त घोड़ा चेतक आपका सच्चा साथी था,
 
 
जिसने हल्दीघाटी के युद्ध में अपनी बहादुरी का परिचय दिया था, जिससे चेतक का नाम आज भी पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि घायल होने के बावजूद चेतक ने 26 फीट लंबे नाले को एक छलांग में पार कर अपने स्वामी (महाराणा प्रताप) के प्राण बचाए थे। महाराणा प्रताप ने उस दौर में मुगलों का जमकर प्रतिरोध किया, जब उत्तर भारत के लगभग लगभग सभी राजा मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। पाठक जानते होंगे कि इतिहास के सबसे भीषण माने जाने वाले युद्ध हल्दीघाटी के युद्ध (18 जून, 1576) में महाराणा प्रताप के पास सीमित सेना थी, जबकि मुगल सेनापति मानसिंह प्रथम के पास विशाल सैन्य बल था। जानकारी मिलती है कि इस युद्ध के बाद ही प्रताप ने छापामार युद्ध (गुरिल्ला वारफेयर) की नीति अपनाई। यहां यह भी गौरतलब है कि हल्दीघाटी का युद्ध वीरता, आत्मसम्मान और अदम्य संकल्प की अमर गाथा है। इतिहास में विवरण मिलता है कि हल्दीघाटी के युद्ध के दौरान इतनी अधिक संख्या में सैनिक वीरगति को प्राप्त प्राप्त हुए थे, कि वहां की मिट्टी लाल हो गई थी। युद्ध स्थल के पास आज भी एक तालाब है जिसे रक्त तलाई कहा जाता है। माना जाता है कि युद्ध के दौरान यह तालाब पूरी तरह रक्त से भर गया था।
 
 
 
बहरहाल, यहां पाठकों को बता दूं कि इतिहासकारों के अनुसार इस युद्ध (हल्दीघाटी के युद्ध) को लेकर अलग-अलग मत हैं। सैन्य दृष्टि से मुगल सेना को बढ़त मिली, क्योंकि युद्धभूमि पर उनका नियंत्रण रहा और महाराणा प्रताप को पहाड़ों की ओर गमन करना पड़ा, लेकिन राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से महाराणा प्रताप को पराजित नहीं माना जाता, क्योंकि वे न तो बंदी बने और न ही उन्होंने कभी मुगल शासक अकबर की अधीनता ही स्वीकार की। गौरतलब कि युद्ध के बाद भी महाराणा प्रताप ने लंबे समय तक संघर्ष जारी रखा और मेवाड़ के बड़े हिस्से को पुनः अपने नियंत्रण में ले लिया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भीलों ने महाराणा प्रताप के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और राणा पूंजा उनके प्रमुख सहयोगियों में थे। गौरतलब है कि इतिहासकार हल्दीघाटी का युद्ध को निर्णायक विजय के बजाय अनिर्णायक युद्ध या मुगलों की सामरिक जीत लेकिन प्रताप की नैतिक विजय मानते हैं। यद्यपि है
 
 
अकबर और महाराणा प्रताप घोर प्रतिद्वंद्वी थे, लेकिन स्वयं अकबर, महाराणा प्रताप की वीरता, स्वाभिमान और संघर्षशीलता का सम्मान करता था। सच तो यह है कि अकबर प्रताप की अदम्य स्वतंत्रता-भावना से प्रभावित बताया जाता है। कहा जाता है कि अकबर ने प्रताप के निधन का समाचार सुनकर दुख व्यक्त किया था। राजस्थानी कवि दुरसा आढ़ा ने वर्णन किया है कि अकबर ने प्रताप की मृत्यु पर कहा कि प्रताप जैसा वीर और स्वाभिमानी राजा दुर्लभ होता है। अकबर कई बार चाहता था कि महाराणा प्रताप उसकी अधीनता स्वीकार कर लें, लेकिन प्रताप ने इसे स्वीकार नहीं किया। गौरतलब है कि अकबर ने कई बार सधि प्रस्ताव भेजे, जिनमें मान सिंह प्रथम तथा राजा टोडरमल जैसे दूत शामिल थे, लेकिन प्रताप ने अधीनता स्वीकार नहीं की। इससे अकबर उनके दृढ़ चरित्र से प्रभावित था। कुछ लोकप्रिय कथनों में अकबर द्वारा प्रताप की प्रशंसा मिलती है, लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि इनमें से कई कथन लोककथाओं और जनश्रुतियों पर आधारित हैं।