आस्था, इतिहास और चमत्कार का संगम: मुरादपुर हनुमान मंदिर

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    02-Apr-2026
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मुरादपुर हनुमान
 
- प्रेमसिंह धाकड़
सामाजिक कार्यकर्ता, विदिशा 
 
 “कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥”
 
 
जामवंत जी कहते हैं - हे तात! इस संसार में ऐसा कौन-सा कार्य है, जो आपसे न हो सके। अर्थात आप सब कुछ करने में समर्थ हैं।
 
विदिशा जिले की गंज बासौदा तहसील के अंतर्गत आने वाला मुरादपुर हनुमान मंदिर, भोपाल से लगभग 110 किलोमीटर और गंज बासौदा से 19 किलोमीटर दूर उदयपुर के पास स्थित है। यह मंदिर न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि संपूर्ण उत्तर भारत के श्रद्धालुओं के लिए गहन श्रद्धा और चमत्कारिक आस्था का केंद्र है। बेतवा नदी के तट के समीप स्थित यह मंदिर अपनी ऐतिहासिकता और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध है।
 
मुरादपुर के हनुमान जी के संबंध में मान्यता है कि यहाँ स्थापित प्रतिमा स्वयंभू है। ऐतिहासिक साक्ष्यों और जनश्रुतियों के अनुसार यह स्थान सदियों पुराना है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह क्षेत्र सघन वनखंड था और हनुमान जी की प्रतिमा एक ऊँचे टीले पर स्थित थी। मंदिर में स्थापित यह प्रतिमा लगभग 900 से 1000 वर्ष पुरानी मानी जाती है। यहाँ हनुमान जी की प्रतिमा विश्राम अवस्था (लेटी हुई) में है, जो अत्यंत दुर्लभ है।
 
स्थानीय लोगों और पुजारियों के अनुसार, हनुमान जी की पूंछ का अंतिम छोर आज तक कोई नहीं खोज पाया है। इसी प्रकार, प्रतिमा के पैरों की गहराई जानने के लिए पहले औरंगजेब तथा बाद में अंग्रेजों द्वारा खुदाई करवाई गई थी। इससे वहाँ एक बड़ा गड्ढा बना, जो अब तालाब का रूप ले चुका है, फिर भी पैर का छोर नहीं मिला।
 
मान्यता है कि द्वापर युग में पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी क्षेत्र, जो राजा विराट की नगरी के समीप माना जाता है, में व्यतीत किया था। कहा जाता है कि इसी स्थान पर भगवान हनुमान ने वृद्ध वानर का रूप धारण कर महाबली भीम का अहंकार तोड़ा था।
 
एक किंवदंती के अनुसार, एक किसान को हल चलाते समय यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जिसका आकार समय के साथ बढ़ता गया। इसी कारण मंदिर के चबूतरे का कई बार विस्तार करना पड़ा।
 
दक्षिणमुखी प्रतिमा होने के कारण शास्त्रों में इसकी पूजा का विशेष महत्व माना गया है। हनुमान जी को संकटमोचन और शत्रु-विनाशक रूप में पूजा जाता है। प्रभु की प्रतिमा सिंदूर से लेपित है और उनके नेत्रों की आभा इतनी सजीव प्रतीत होती है कि भक्तों को लगता है जैसे भगवान उन्हें प्रत्यक्ष देख रहे हों।
 
हनुमान जी के चरणों में शनि देव के दमन और भक्त की रक्षा का भाव स्पष्ट झलकता है। यहाँ नारियल पर लाल कपड़ा बांधकर मनोकामना व्यक्त करने की विशेष परंपरा है। माना जाता है कि यहाँ से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।
 
शनिवार के दिन यहाँ विशेष भीड़ रहती है, क्योंकि हनुमान जी द्वारा शनि देव के मान-मर्दन की मान्यता के कारण भक्त शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या से मुक्ति के लिए तेल और सिंदूर अर्पित करते हैं।
 
यह भी विश्वास किया जाता है कि मंदिर की भभूत (विभूति) और नियमित दर्शन से असाध्य रोगों में लाभ मिलता है।
 
पुरातत्व विभाग के अनुसार, इस क्षेत्र के आसपास प्राचीन सभ्यताओं और महाभारत काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को प्रमाणित करते हैं।
 
यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। विशेषकर हनुमान जन्मोत्सव तथा शनिवार और मंगलवार को यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
 
यह स्थान सामाजिक समरसता का भी केंद्र है, जहाँ सामूहिक विवाह, भंडारे और धार्मिक आयोजन सभी वर्गों को एक सूत्र में जोड़ते हैं। प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट द्वारा धर्मशाला सहित अन्य सुविधाओं का निरंतर विस्तार किया जा रहा है।
 
मुरादपुर वाले हनुमान जी का दरबार आस्था का वह अखंड दीप है, जो सदियों से पूरे क्षेत्र को आलोकित कर रहा है। अपनी ऐतिहासिकता और जाग्रत चैतन्यता के कारण यह मंदिर आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
 
“संकट कटे, मिटे सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।”
जय श्री राम