नीरज जाटव
पत्रकार, शिवपुरी
शिवपुरी के प्रसिद्ध मंशापूर्ण हनुमान जी मंदिर में आप सभी गए होंगे, लेकिन क्या आपको यह जानकारी है कि इस मंदिर का नाम मंशापूर्ण क्यों रखा गया? क्या किसी चमत्कार के कारण इसका यह नाम पड़ा? इस मंदिर की हनुमान जी की प्रतिमा में क्या विशेष है? संभवतः देश में इस प्रकार की यह पहली प्रतिमा है, और किन शर्तों पर अतुलित बलधामा प्रकट हुए थे?
यह सत्य है कि नौहरी स्थित सिद्ध क्षेत्र के प्रसिद्ध श्री मंशापूर्ण हनुमान जी मंदिर की प्रतिमा स्वयंभू है। यह प्रतिमा प्रकट हुई थी। मंदिर के पुजारी श्री अरुण शर्मा ने बताया कि आज से लगभग 250 वर्ष पूर्व मेरे दादाजी स्वर्गीय पंडित चतुर्भुज शर्मा के पिता स्वर्गीय श्री कुंजीलाल शर्मा को स्वप्न आया, जिसमें हनुमान जी ने कहा कि इस कुएं के पास मेरी प्रतिमा है, इसे बाहर निकालो। स्वप्न में उन्होंने यह शर्त भी रखी कि प्रतिमा को निकालते समय कोई क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए।
स्वर्गीय श्री कुंजीलाल शर्मा को जब यह स्वप्न आया, तो वे गांव के लोगों के साथ हनुमान जी द्वारा बताए गए स्थान, एक कुएं पर पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें कोई प्रतिमा दिखाई नहीं दी और वे निराश होकर लौट आए। उसी रात पुनः स्वप्न आया कि आप सही स्थान पर पहुंचे थे, मैं एक चिरोल के पेड़ में धंसा हुआ हूं।
इसके बाद गांव के सभी लोग पुनः उसी स्थान पर पहुंचे और चिरोल के पेड़ की खोज की। वहां प्रतिमा का कंधा दिखाई दिया। शर्त के अनुसार ग्रामीणों ने अत्यंत सावधानी से प्रतिमा को इस प्रकार निकाला कि वह कहीं से भी खंडित न हो। बाद में उस प्रतिमा को स्थापित किया गया। जानकारी के लिए बता दें कि प्रतिमा का प्राकट्य स्थल मंदिर के पीछे है, अब उस कुएं को पाट दिया गया है।
वर्तमान में मंशापूर्ण हनुमान जी का भव्य मंदिर दिखाई देता है, लेकिन प्रारंभ में पत्थरों से निर्मित एक छोटे कक्ष में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की गई थी, जिसे आम भाषा में ‘मड़िया’ कहा जाता है।
इस प्रतिमा में शक्ति नहीं, शक्ति का संयमित प्रदर्शन है: ब्राह्मण रूप में है प्रतिमा
हनुमान जी का एक नाम अतुलित बलधामा है। हनुमान का अर्थ ही शक्ति है। आपने हनुमान जी की शक्ति से जुड़े अनेक प्रसंग सुने होंगे और उनकी कई प्रतिमाओं के दर्शन भी किए होंगे। सामान्यतः अधिकांश प्रतिमाओं में हनुमान जी के एक हाथ में गदा और दूसरे हाथ में पर्वत होता है।
लेकिन मंशापूर्ण हनुमान जी मंदिर की प्रतिमा इससे भिन्न है। यह राम मिलन के प्रसंग को जीवंत करती हुई प्रतीत होती है। इस प्रतिमा में हनुमान जी का एक हाथ कमर पर रखा है और दूसरा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में है। यह जनेऊधारी प्रतिमा है और ब्राह्मण रूप को दर्शाती है।
कुछ लोगों का मत है कि यह प्रतिमा नृत्य मुद्रा में है। मान्यता है कि जब हनुमान जी पहली बार अपने आराध्य प्रभु श्रीराम से ब्राह्मण रूप में मिले, तो उस आनंद में वे नृत्य करने लगे। इस प्रकार की प्रतिमा भारत में अन्यत्र दुर्लभ है।
सीधे शब्दों में कहें तो यह प्रतिमा केवल शक्ति का नहीं, बल्कि भक्ति की अविरल धारा का प्रदर्शन करती है।