राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख : सेवा, त्याग और अंत्योदय का भारतीय मॉडल

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    27-Feb-2026
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nana ji
 
 
डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
 
नानाजी देशमुख की जयंती केवल एक महान व्यक्तित्व की जन्मतिथि का स्मरण नहीं है, बल्कि यह भारतीय सार्वजनिक जीवन में मूल्यों, त्याग और राष्ट्रसेवा की उस परंपरा को पुनःस्मरण करने का अवसर है, जो आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है। नानाजी देशमुख का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सत्ता, संगठन और समाज, तीनों को एक ही जीवन में साधा जा सकता है, बशर्ते लक्ष्य आत्मोन्नति नहीं, राष्ट्रोन्नति हो।
 
वे ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने स्वयं को कभी केंद्र में नहीं रखा, बल्कि विचार, समाज और अंतिम व्यक्ति को ही अपने समस्त प्रयासों का केंद्र बनाया। नानाजी का जीवन किसी पद, प्रतिष्ठा या पुरस्कार की कथा नहीं, बल्कि वह एक सतत साधना है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को समाज के लिए घिस देता है और बदले में कुछ भी नहीं चाहता।
 
नानाजी देशमुख का व्यक्तित्व तप, त्याग और अनुशासन से निर्मित हुआ था। उनका सादा जीवन, सीमित आवश्यकताएँ और निजी सुख-सुविधाओं से पूर्ण विरक्ति भारतीय सनातन परंपरा के उस आदर्श को साकार करती है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवन को समाज की धरोहर मानता है। उन्होंने कभी अपने लिए कुछ संचित नहीं किया। न घर, न बैंक बैलेंस, न पारिवारिक उत्तराधिकार। उनका जीवन इस प्रश्न का उत्तर है कि क्या आधुनिक युग में भी संन्यास संभव है और नानाजी का जीवन स्पष्ट रूप से कहता है कि हाँ, संभव है, यदि संन्यास पलायन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व की चरम अवस्था हो।
 
उनका जीवन निर्णायक रूप से तब आकार लेता है जब वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ते हैं। संघ उनके लिए केवल एक संगठन नहीं था, बल्कि वह जीवन की दिशा, साधना और संकल्प था। एक आजीवन प्रचारक के रूप में उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र और समाज को समर्पित कर दिया। उनका प्रचारक जीवन अत्यंत कठोर था जिसमें निश्चित निवास का अभाव, सीमित साधन, निरंतर प्रवास और निरंतर संपर्क। किंतु इसी जीवन ने उन्हें भारत के सामाजिक यथार्थ से गहरे रूप में जोड़ दिया। वे केवल विचार नहीं गढ़ते थे, बल्कि विचारों को समाज की जमीन पर उतारते थे।
 
नानाजी की संगठनात्मक दृष्टि व्यक्ति-केंद्रित नहीं, व्यवस्था-केंद्रित थी। वे जानते थे कि व्यक्ति नश्वर है, किंतु यदि व्यवस्था सुदृढ़ हो, तो विचार अमर हो जाते हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं को केवल आदेश नहीं दिए, बल्कि उन्हें गढ़ा, संवारा और आत्मनिर्भर बनाया। उनकी शैली में कहीं भी अहंकार नहीं था। वे वरिष्ठ होते हुए भी सहकर्मी की तरह व्यवहार करते थे। यही कारण था कि उनके साथ काम करने वाले स्वयं को केवल अनुयायी नहीं, बल्कि सहभागी मानते थे। यह संगठनात्मक संस्कृति आज भी दुर्लभ है।
 
राजनीति में नानाजी देशमुख का प्रवेश किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की परिणति नहीं था। वे सत्ता के आकर्षण से नहीं, बल्कि राष्ट्र की आवश्यकता के कारण राजनीति में आए। जब वे भारत सरकार में मंत्री बने, तब भी उनका जीवन वैसा ही सादा रहा जैसा पहले था। न विशेषाधिकारों का प्रदर्शन, न पद की आड़ में दूरी। मंत्री पद उनके लिए साध्य नहीं, साधन था। उन्होंने यह दिखाया कि राजनीति भी नैतिक हो सकती है, यदि उसका आधार सेवा और संयम हो।
 
भारतीय राजनीति में नानाजी देशमुख का सबसे बड़ा योगदान संभवतः यह है कि उन्होंने स्वेच्छा से सत्ता का त्याग किया। जिस राजनीति में पद छोड़ना कमजोरी माना जाता है, वहाँ नानाजी ने त्याग को शक्ति का प्रतीक बना दिया। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीति जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। यह त्याग किसी असफलता का परिणाम नहीं था, बल्कि यह एक उच्चतर सेवा की ओर प्रस्थान था। सत्ता छोड़कर समाज की ओर लौटना भारतीय लोकतंत्र में अत्यंत दुर्लभ उदाहरण है।
 
राजनीति से संन्यास के बाद नानाजी देशमुख ने चित्रकूट को अपनी कर्मभूमि बनाया। यहीं से उनका ग्रामोदय का महान प्रयोग प्रारंभ होता है। नानाजी का मानना था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और जब तक गाँव सशक्त नहीं होंगे, तब तक राष्ट्र का विकास अधूरा रहेगा। उन्होंने ग्राम विकास को सरकारी योजनाओं या अनुदानों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक चेतना और स्वावलंबन से जोड़ा। चित्रकूट में उनका कार्य किसी परियोजना की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रयोगशाला की तरह विकसित हुआ।
 
नानाजी का ग्रामोदय मॉडल पश्चिमी विकास अवधारणाओं से सर्वथा भिन्न था। उनके लिए विकास का अर्थ केवल आय बढ़ाना नहीं था, बल्कि व्यक्ति की गरिमा, समाज की समरसता और संस्कृति की रक्षा भी विकास का अभिन्न अंग थी। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, जल-संरक्षण और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने लाभार्थी की मानसिकता को समाप्त कर सहभागी की चेतना विकसित की। लोग योजना के उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माण के भागीदार बने।
 
अंत्योदय नानाजी देशमुख के चिंतन का केंद्रबिंदु था। उनके लिए समाज का अंतिम व्यक्ति केवल दया का पात्र नहीं था, बल्कि वह विकास की धुरी था। नानाजी का अंत्योदय किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि व्यवहार की तरह था। वे मानते थे कि जिस समाज में अंतिम व्यक्ति सशक्त नहीं है, वह समाज नैतिक रूप से भी कमजोर है। यही कारण है कि उनके ग्राम विकास मॉडल में आत्मसम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया गया।
 
नानाजी का चिंतन एकात्म मानव दर्शन से गहराई से जुड़ा हुआ था। उनके लिए मानव केवल आर्थिक प्राणी नहीं था, बल्कि वह शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक स्तरों का समन्वय था। इसीलिए उनका विकास मॉडल केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्यों को विकास का आधार बनाया। आज जब विकास को केवल GDP और आंकड़ों में मापा जाता है, नानाजी का मॉडल एक मानवीय विकल्प प्रस्तुत करता है।
 
आज की राजनीति में जब मुफ्त योजनाएँ और तात्कालिक लाभ वोट-राजनीति का साधन बनते जा रहे हैं, नानाजी देशमुख का ग्रामोदय मॉडल एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। वे मानते थे कि जो व्यवस्था समाज को स्थायी रूप से आश्रित बना दे, वह कल्याण नहीं, बल्कि दीर्घकालिक हानि है। उनका आग्रह था कि सहायता अस्थायी होनी चाहिए और आत्मनिर्भरता स्थायी। यह विचार आज के भारत के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
 
नानाजी देशमुख का जीवन युवाओं के लिए एक मौन लेकिन प्रभावशाली संदेश है। वे यह सिखाते हैं कि सादा जीवन कमजोरी नहीं, बल्कि चरित्र की शक्ति है। वे यह बताते हैं कि संगठन अनुशासन नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का माध्यम है। और वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रसेवा केवल सत्ता में रहकर ही नहीं होती, बल्कि सत्ता छोड़कर भी की जा सकती है।
 
नानाजी देशमुख के जीवन और कार्य पर आधारित संग्रहालय केवल स्मृति-स्थल नहीं होना चाहिए। वह विचारों का विश्वविद्यालय, ग्राम विकास की प्रयोगशाला और नैतिक राजनीति का प्रशिक्षण केंद्र बन सकता है। ऐसा संग्रहालय आने वाली पीढ़ियों को यह सिखा सकता है कि राष्ट्र निर्माण घोषणाओं से नहीं, बल्कि जीवन-आचरण से होता है।
 
नानाजी देशमुख का जीवन भारतीय लोकतंत्र, समाज और संस्कृति के लिए एक जीवंत आदर्श है। उन्होंने सिद्ध किया कि संगठन सत्ता से बड़ा हो सकता है, त्याग राजनीति से श्रेष्ठ हो सकता है और गाँव राष्ट्र की रीढ़ हो सकते हैं। उनकी जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि भारत का भविष्य उसी दिन सुरक्षित होगा, जिस दिन अंत्योदय केवल भाषणों में नहीं, बल्कि जीवन-व्यवहार में उतरेगा। नानाजी देशमुख का जीवन इसी विश्वास का अमर प्रमाण है।