डॉ मयंक चतुर्वेदी
जब किसी फिल्म से इतना भय पैदा हो जाए कि उसकी रिलीज से पहले न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़े तो समझ लीजिए कि मामला सच के असहज हो जानेवाले से संबंधित है। द केरल स्टोरी 2 आज ठीक उसी मोड़ पर खड़ी है। 27 फरवरी 2026 को सिनेमाघरों में आने जा रही इस फिल्म पर फिलहाल केरल उच्च न्यायालय ने अस्थायी रोक लगा दी है। याचिकाएं दायर हुईं आरोप लगे कि फिल्म राज्य की छवि खराब करेगी सांप्रदायिक तनाव फैलाएगी समाज को बांटेगी। किंतु मूल प्रश्न कोई पूछने को तैयार नहीं कि क्या केरल विधानसभा में रखी गई रिपोर्टें भी प्रोपगैंडा हो सकती है?
फिल्म 2023 में आई द केरल स्टोरी का सीक्वल है। पहली फिल्म की तरह इसका विषय भी छल से धर्मांतरण है लेकिन इस बार कथा केरल से आगे बढ़कर मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक जाती है। ट्रेलर में कहा गया है कि यह वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है। यह कहते ही हंगामा शुरू हो गया। कुछ फिल्मकारों और अपने आपको सेक्युलर कहनेवालों ने इसे प्रोपगैंडा बताया। कोर्ट में फिल्म को चुनौती देने पहुंचे याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म केरल को सांप्रदायिक रंग में रंगती है और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाती है। तब निर्देशक ने सार्वजनिक रूप से चुनौती दी कि यदि कुछ भी गलत सिद्ध हो जाए तो वे फिल्म निर्माण छोड़ देंगे। कहना होगा कि यह आत्मविश्वास यूं ही नहीं आता है, इसके पीछे तथ्य होते हैं।
25 फरवरी 2026 को केरल उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई और न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की एकलपीठ ने निर्माताओं से कहा कि अंतिम निर्णय तक फिल्म के अधिकार जारी न किए जाएं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा दिए गए यू\ए प्रमाणपत्र पर भी सवाल उठाए गए। अदालत ने पूछा कि यदि विषय इतना संवेदनशील है तो ए प्रमाणपत्र क्यों नहीं दिया गया। लेकिन यह प्रश्न बड़ा है कि क्या किसी राज्य का नाम शीर्षक में आ जाना ही उसकी गरिमा पर हमला है? अगर ऐसा है तो फिर गो गोवा गॉन वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई या दिल्ली बेली जैसी फिल्मों ने भी अपने अपने शहरों की छवि बिगाड़ी होगी ?
वस्तुत: इस संदर्भ में कहना होगा कि यह विवाद नया नहीं है। 2023 में आई “द केरल स्टोरी” भी कानूनी चुनौतियों से गुजरी थी। उससे पहले 2022 में “द कश्मीर फाइल्स” को लेकर भी देश भर में याचिकाएं दायर हुईं। हर बार तर्क यही था कि फिल्म से सामाजिक सद्भाव बिगड़ेगा। हर बार अदालतों ने संतुलन साधते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी महत्व दिया।
अब आइए मूल प्रश्न पर आते हैं, छल से धर्मांतरण का मुद्दा। किसी का धर्म बदलने का अर्थ यह नहीं है कि बल, प्रलोभन या धोखे से धर्म परिवर्तन किया जाए। संविधान इसकी अनुमति नहीं देता। इसी कारण उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश उत्तराखंड गुजरात और हरियाणा जैसे राज्यों ने विशेष कानून बनाए हैं। यह कानून यूं ही नहीं बने, इसके पीछे शिकायतें और हजारों की संख्या में अब तक दर्ज मामले रहे ।
राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो जबरन धर्मांतरण का अलग से समेकित आंकड़ा जारी नहीं करता। इसलिए बहस अक्सर भावनात्मक हो जाती है। लेकिन जहां राज्य कानून हैं वहां दर्ज आंकड़े मौजूद हैं और केरल का मामला तो विधानसभा में रखी गई रिपोर्टों से भी जुड़ा है।
2011 की जनगणना बताती है कि केरल में मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत थी जबकि 1951 में यह 17.4 प्रतिशत थी। 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी वृद्धि दर 12.8 प्रतिशत रही जबकि राज्य की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत थी। उसी अवधि में हिंदुओं की वृद्धि दर 2.23 प्रतिशत और ईसाइयों की 1.38 प्रतिशत रही। स्पष्ट है कि वृद्धि दर में अंतर है। इसके पीछे केवल धर्मांतरण कारण नहीं, मुसलमानों की उच्च प्रजनन दर, सामाजिक संरचना और अन्य कारक भी हैं। लेकिन धर्मांतरण को पूरी तरह नकार देना भी तथ्यों से आंख मूंदना होगा।
2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने केरल विधानसभा में बताया कि 2006 से 2012 के बीच 7713 लोगों ने इस्लाम धर्म अपनाया जिनमें 2667 लड़कियां थीं। रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर मामले अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े थे। यह कोई फिल्मी संवाद नहीं बल्कि सरकार द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक सूचना थी। 2015 में केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल के मुखपत्र जाग्रता ने दावा किया कि 2005 से 2012 के बीच लगभग चार हजार लड़कियों का धर्मांतरण हुआ जिनमें ज्यादातर ने इस्लाम स्वीकार किया।
स्वभाविक है कि यदि किसी अवधि में हजारों लोग धर्म बदलते हैं तो समाजशास्त्रीय अध्ययन की आवश्यकता होती है और जिसमें कि जब विशेष वर्ग के प्रति अचानक से आकर्षण दिखे, तब संदेह पैदा होना स्वभाविक है। ऐसे में केरल की इस सच्चाई को आज कोई भी नकार नहीं सकता है। इसलिए फिल्म में जो दिखाया गया है, वह वास्तव में उन तमाम युवतियों का भोगा हुआ यथार्थ है, जिससे वे दिनरात गुजरी हैं। ये सच है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है लेकिन वह निरर्थक भी नहीं है। यदि हर संवेदनशील विषय पर रोक लगेगी तो सिनेमा केवल मनोरंजन का खोखला माध्यम बनकर रह जाएगा। अदालतें कानून देखेंगी, सार्वजनिक व्यवस्था शालीनता और नैतिकता। लेकिन समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह कठिन प्रश्नों का सामना करने को तैयार है।
सच यह है कि धर्मांतरण का प्रश्न बहुआयामी है; फिर भी यदि आधिकारिक आंकड़े मौजूद हैं, यदि विधानसभा में रिपोर्ट रखी गई है, यदि मीडिया ने धर्मांतरण के रुझानों पर विश्लेषण किया है तो इस विषय पर फिल्म बनाना अवैध कैसे हो सकता है? “द केरल स्टोरी 2” को न्यायालय में चुनौती दीजिए, जरूर दीजिए, तथ्यों की जांच कीजिए प्रमाणपत्र पर बहस कीजिए। किंतु यह मत कहिए कि विषय अस्तित्वहीन है। क्योंकि आंकड़े मौजूद हैं जनगणना के, विधानसभा के और मीडिया रिपोर्टों के।
अब फिल्म रुकेगी या रिलीज होगी यह न्यायालय तय करेगा। पर बहस रुकेगी नहीं। और शायद यही लोकतंत्र की असली ताकत है सवाल पूछने की असहमति जताने की और तथ्यों को परखने की स्वतंत्रता सभी को समान रूप से भारतीय संविधान देता है। अंततः सच कोर्ट के आदेश से नहीं बदलता। कहना होगा कि वह आंकड़ों में दर्ज रहता है, दस्तावेजों में सुरक्षित रहता है और समय-समय पर सामने आ जाता है। इसलिए आज प्रश्न यह नहीं कि फिल्म पर रोक लगी या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या हम उन तथ्यों से सामना करने को तैयार हैं जिन्हें हम देखना नहीं चाहते। क्योंकि इतिहास गवाह है फिल्में रोकी जा सकती हैं लेकिन आंकड़ों को आज कोई नहीं नकार सकता, जो देश भर में चिल्ला चिल्ला कार कह रहे हैं कि लव जिहाद के निशाने पर हिन्दू एवं अन्य गैर मुस्लिम लड़किया हैं! इस्लामिक कन्वर्जन का खेल पूरी तरह से योजनाबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा है, जिस पर कि हर हाल में रोक लगना ही चाहिए।