राष्ट्र-चेतना के साधक : द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी का समग्र दृष्टिकोण

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    19-Feb-2026
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Guruji
 
डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
भारत के राष्ट्रजीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो सत्ता, पद और प्रचार से दूर रहकर भी युग की दिशा तय करते हैं। वे समय के शोर में नहीं, बल्कि इतिहास की गहराइयों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। ऐसे ही तपस्वी, विचारक और संगठनकर्ता थे माधव सदाशिव गोलवलकर, जिन्हें राष्ट्र ने श्रद्धा से “गुरुजी” कहा। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक थे और 1940 से 1973 तक लगभग 33 वर्षों तक संघ का मार्गदर्शन किया। उनका जीवन भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक व्याख्या का एक सुदृढ़ आधारस्तंभ है।
 
गुरुजी का जन्म 19 फरवरी 1906 को हुआ। बचपन से ही उनमें अध्ययनशीलता, अनुशासन और आत्मसंयम के गुण स्पष्ट दिखाई देते थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उनका जीवन भौतिक उपलब्धियों की ओर नहीं गया, बल्कि आत्मिक साधना और सामाजिक दायित्व की ओर उन्मुख हुआ। वेदांत, उपनिषद, भारतीय दर्शन, इतिहास और संस्कृति का उनका अध्ययन अत्यंत गहरा था। वे आधुनिक शिक्षा से भली-भांति परिचित थे, किंतु उनकी चेतना की जड़ें भारतीय परंपरा में दृढ़ता से स्थापित थीं। यही संतुलन उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी।
 
गुरुजी का व्यक्तित्व सरल था, किंतु प्रभाव अत्यंत गहन। वे कम बोलते थे, परंतु उनके शब्द कार्यकर्ताओं के जीवन को दिशा देने वाले सिद्ध होते थे। उनमें न तो पद का अहंकार था और न ही प्रसिद्धि की कोई आकांक्षा। उनका जीवन स्वयं इस बात का जीवंत उदाहरण था कि त्याग, अनुशासन और निरंतर साधना के माध्यम से समाज को किस प्रकार दिशा दी जा सकती है।
 
1940 में जब गुरुजी ने द्वितीय सरसंघचालक का दायित्व संभाला, तब भारत का समय अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। स्वतंत्रता आंदोलन अपने निर्णायक चरण में था, द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया थी और वैचारिक भ्रम तथा राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण व्याप्त था। इसके बाद देश का विभाजन हुआ, जिसने भारतीय समाज की आत्मा को गहरा आघात पहुँचाया। इसी कालखंड में संघ पर प्रतिबंध लगे, कार्यकर्ताओं को कारावास झेलना पड़ा और संगठन पर गंभीर आरोप लगाए गए। ऐसे कठिन समय में गुरुजी ने धैर्य, विवेक और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ संघ का नेतृत्व किया।
 
गुरुजी का 33 वर्षों का सरसंघचालक काल संघ के इतिहास में विस्तार और स्थायित्व का काल माना जाता है। उन्होंने संगठन को भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के मार्ग पर नहीं, बल्कि अनुशासित, विचारपूर्ण और समाजोन्मुख पथ पर अग्रसर किया। शाखाओं का देशव्यापी विस्तार हुआ, प्रचारक व्यवस्था सुदृढ़ हुई और संघ एक संगठित सामाजिक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ। गुरुजी का स्पष्ट मत था कि संगठन की वास्तविक शक्ति संख्या में नहीं, बल्कि संस्कार में होती है। इसी कारण उन्होंने व्यक्ति-निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
 
प्रचारक जीवन गुरुजी की सोच का केंद्र था। वे स्वयं प्रचारक थे और प्रचारक को केवल संगठनकर्ता नहीं, बल्कि समाज-शिक्षक मानते थे। उनके अनुसार प्रचारक का जीवन त्याग, सादगी, निरंतर अध्ययन और समाज के साथ जीवंत संवाद का जीवन होता है। उन्होंने प्रचारकों को निर्देश दिया कि वे स्थानीय समाज की भाषा, संस्कृति और संवेदनाओं से गहराई से जुड़ें। इसी दृष्टि के कारण संघ का कार्य किसी एक क्षेत्र, भाषा या वर्ग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संपूर्ण भारत में विविध रूपों में विकसित हुआ।
 
गुरुजी की दूरदृष्टि का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न अनुषांगिक संगठनों का उदय था। उनका मानना था कि राष्ट्र का पुनर्निर्माण केवल एक संगठन के माध्यम से संभव नहीं है। समाज के प्रत्येक क्षेत्र शिक्षा, श्रम, राजनीति, सेवा, जनजातीय जीवन और महिला सशक्तिकरण आदि में राष्ट्रभाव से प्रेरित कार्य होना चाहिए। इसी सोच के परिणामस्वरूप अनेक संगठनों का विकास हुआ, जिन्होंने समाज के विभिन्न आयामों में राष्ट्रवादी चेतना का संचार किया।
 
गुरुजी की राष्ट्र-कल्पना अत्यंत व्यापक और गहरी थी। उनके लिए राष्ट्र केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता था, जो सहस्राब्दियों से निरंतर प्रवाहित होता आया है। वे मानते थे कि भारत की एकता का आधार उसकी सांस्कृतिक समरसता है, न कि केवल संवैधानिक या प्रशासनिक व्यवस्थाएँ। उनका राष्ट्रवाद कर्तव्य, संस्कार और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व पर आधारित था। उनके अनुसार व्यक्ति से पहले समाज और समाज से पहले राष्ट्र का स्थान है।
 
विदेश नीति के प्रश्न पर गुरुजी की दृष्टि अत्यंत यथार्थवादी थी। वे विश्व शांति के समर्थक थे, किंतु राष्ट्र-सुरक्षा के प्रश्न पर किसी भी प्रकार के अव्यावहारिक आदर्शवाद को स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने समय रहते आक्रामक विस्तारवादी प्रवृत्तियों को पहचाना और भारत की सीमाओं की सुरक्षा पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उनका स्पष्ट मत था कि भारत को नैतिक शक्ति के साथ-साथ सामरिक रूप से भी सशक्त होना चाहिए, क्योंकि कमजोर राष्ट्र की नैतिक अपील भी प्रभावहीन हो जाती है।
 
पूर्वोत्तर भारत गुरुजी की दृष्टि में कभी हाशिये का क्षेत्र नहीं रहा। वे इसे भारत की सांस्कृतिक विविधता और सामरिक सुरक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग मानते थे। उनका विश्वास था कि जनजातीय समाज भारत की मूल सांस्कृतिक चेतना का वाहक है। वे अलगाववाद को केवल राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि संवाद और आत्मीयता की कमी का परिणाम मानते थे। गुरुजी का आग्रह था कि पूर्वोत्तर भारत को समझने के लिए वहाँ की संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक संरचना का सम्मान आवश्यक है। आज पूर्वोत्तर में दिखाई देने वाला सांस्कृतिक और वैचारिक जागरण कहीं न कहीं गुरुजी की इसी सोच की परिणति है।
 
सामाजिक समरसता गुरुजी के विचारों का केंद्रीय तत्व थी। उनका राष्ट्रवाद समावेशी था। वे समाज के प्रत्येक वर्ग को राष्ट्र-निर्माण का सहभागी मानते थे। जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर विभाजन को वे राष्ट्र के लिए घातक मानते थे। उनके अनुसार सामाजिक समरसता केवल नारों से नहीं, बल्कि व्यवहार, सेवा और संवेदनशीलता से स्थापित होती है। यही कारण है कि उन्होंने सेवा कार्यों को संघ जीवन का अभिन्न अंग बनाया।
 
आज के वैश्विक परिदृश्य में गुरुजी की वैचारिक विरासत और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। जब विकास, शक्ति और राजनीति की दौड़ तीव्र है, तब वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि सांस्कृतिक जड़ों के बिना विकास खोखला होता है। वे सिखाते हैं कि राष्ट्र का निर्माण तात्कालिक सफलताओं से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संस्कारों से होता है।
 
उपसंहार के रूप में कहा जा सकता है कि द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी भारतीय राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक शिल्पकार थे। उनका जीवन त्याग, विचार और संगठन की त्रिवेणी है। 19 फरवरी उनकी जन्म-जयंती केवल स्मरण का दिवस नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर है। गुरुजी आज भी हमें यह सिखाते हैं कि राष्ट्र-सेवा कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक सतत साधना है।