-डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
संत रविदास भारतीय संत परंपरा के ऐसे महापुरुष हैं, जिनका जीवन, विचार और कर्म सामाजिक समरसता की जीवंत मिसाल हैं। आज उनकी जन्मतिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनके जीवन से जुड़े उन प्रसंगों को समझना है, जिनके माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज को समानता, करुणा और मानव गरिमा का मार्ग दिखाया। संत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी के निकट एक साधारण चर्मकार परिवार में हुआ। उस समय समाज जातिगत भेदभाव और छुआछूत से ग्रस्त था, किंतु रविदास जी ने इन सामाजिक सीमाओं को अपने आचरण और साधना से निरर्थक सिद्ध किया।
उनके जीवन की एक अत्यंत प्रसिद्ध घटना है, काशी के पंडितों और तथाकथित उच्च जाति के लोगों द्वारा उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास। कहा जाता है कि उनकी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा से असहज होकर कुछ लोगों ने उनकी भक्ति और पवित्रता की परीक्षा लेने के लिए उन्हें गंगा स्नान और यज्ञ-कर्म से जुड़ी शर्तों में उलझाने का प्रयास किया। संत रविदास ने बिना किसी विरोध या क्रोध के यह स्पष्ट किया कि शुद्धता बाहरी कर्मकांड में नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता में है। इसी भाव से उनके मुख से निकली पंक्ति—“मन चंगा तो कठौती में गंगा”—केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का दर्शन बन गई। यह घटना भारतीय समाज को यह संदेश देती है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप मानव के भीतर बसता है, न कि उसकी जाति या सामाजिक स्थिति में।
संत रविदास के जीवन से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण प्रसंग उनकी शिष्या मीरा का है। राजघराने में जन्मी मीरा का एक साधारण चर्मकार संत के चरणों में बैठना उस समय की सामाजिक संरचना के लिए एक बड़ी चुनौती था। किंतु रविदास जी ने न तो मीरा की राजसी पहचान को महत्व दिया और न ही अपनी सामाजिक स्थिति को हीन समझा। गुरु और शिष्य के इस संबंध ने यह सिद्ध कर दिया कि भक्ति और ज्ञान के क्षेत्र में जन्म, जाति और वर्ग का कोई स्थान नहीं होता। यह प्रसंग भारतीय समरसता की उस परंपरा को उजागर करता है, जहाँ विचार और आस्था सामाजिक दीवारों को तोड़ देते हैं।
संत रविदास का विश्वास ईश्वर की सर्वव्यापकता में था। वे मानते थे कि ईश्वर प्रत्येक प्राणी में समान रूप से विद्यमान है। उनका जीवन स्वयं इस विश्वास का प्रमाण है। वे अपने श्रम से आजीविका चलाते हुए भी उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था तक पहुँचे। यह भारतीय जीवन-दर्शन की विशेषता है, जहाँ श्रम और साधना, दोनों को समान सम्मान प्राप्त है। उनका यह आचरण समाज के उस वर्ग के लिए प्रेरणा बना, जिसे लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया था।
उनकी कल्पना का “बेगमपुरा” केवल काव्यात्मक स्वप्न नहीं, बल्कि उनके जीवन-अनुभवों से उपजा सामाजिक आदर्श है। बेगमपुरा ऐसा समाज है जहाँ न कोई भय है, न शोषण, न ऊँच-नीच। यह वही समाज है, जिसे संत रविदास अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर देखना चाहते थे—एक समरस, न्यायपूर्ण और मानवीय भारत।
आज के संदर्भ में संत रविदास का जीवन और विचार दोनों ही गहन संदेश देते हैं। जब समाज फिर से पहचान, जाति और वर्ग के आधार पर विभाजन की ओर बढ़ता दिखाई देता है, तब संत रविदास के जीवन प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि भारतीय समाज की वास्तविक शक्ति समरसता में है, टकराव में नहीं। वे सिखाते हैं कि सामाजिक परिवर्तन केवल नारों से नहीं, बल्कि जीवन में उतारे गए मूल्यों से आता है।
संत रविदास किसी एक वर्ग या समुदाय के संत नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की चेतना हैं। उनकी जन्मतिथि हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम उनके जीवन से प्रेरणा लेकर अपने आचरण में समरसता, करुणा और समानता को स्थान दें। यही संत रविदास के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और भारतीय सामाजिक एकता का सुदृढ़ आधार