
भोपाल। मातृभाषा मंच द्वारा आयोजित तीन दिवसीय मातृभाषा समारोह के दूसरे दिन शनिवार को भव्य सांस्कृतिक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें देश की विविध भाषाओं और लोक कलाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रकवि दिनकर की ओजस्वी कविता के पाठ से हुआ, जिसने हिंदी भाषा के प्रति श्रद्धा जगाई। इस प्रस्तुति में लगभग 20 कलाकारों ने भाग लिया। कार्यक्रम में देश की एकता को बनाए रखने वाली विभिन्न भाषाओं और उनकी सांस्कृतिक धरोहर को मंच पर उकेरा गया। तेलुगु में भरतनाट्यम, मराठी में 'आई साहेब' गीत, मलयालम में 'रिदम ऑफ केरला', गढ़वाली में तांडव नृत्य, उड़िया में संबलपुरी नृत्य, गुजराती में गरबा और पंजाबी में भांगड़ा और गिद्धा की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। पंजाबी भाषा की प्रस्तुति में एक ही परिवार के तीन पीढ़ियों – दादी, बहु, और पोती – ने मिलकर प्रस्तुति देकर सभी का मन मोह लिया। नेपाली भाषा में सीता नाटिका के मंचन ने भावनात्मक संदेश दिया। इसी प्रकार अन्य भाषाओं के कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया, जिनमें संबंधित भाषाई समाज के बच्चों और वरिष्ठजनों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

गुरु तेग बहादुर के बलिदान पर केंद्रित नाटिका
समारोह का मुख्य आकर्षण गुरु तेग बहादुर सिंह जी के बलिदान और धर्मरक्षा की वीर गाथा पर आधारित ऐतिहासिक नाटिका का मंचन रहा। इस प्रस्तुति ने नौवें सिख गुरु के अदम्य साहस और राष्ट्रधर्म के प्रति समर्पण को बखूबी दर्शाया और दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
कार्यक्रम में मातृभाषा मंच द्वारा सभी प्रतिभागी विद्यालयों के कलाकारों को प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि अशोक पांडे जी एवं सोमकांत उमालकर जी उपस्थित रहे।
संध्या कार्यक्रम में देश की सांस्कृतिक एकता और भाषाई विविधता का एक जीवंत चित्रण हुआ। मंच पर देश की विभिन्न भाषाओं और उनकी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को साकार किया गया। तेलुगु भाषा में प्रस्तुत भरतनाट्यम नृत्य ने शास्त्रीयता का अनूठा संगम दिखाया, तो मराठी का 'आई साहेब' गीत मातृभावना की गहराई लेकर आया। मलयालम की 'रिदम ऑफ केरला' ने दक्षिण के लयबद्ध सौंदर्य को उकेरा, वहीं गढ़वाली पांडव नृत्य ने पर्वतीय वीरता का सजीव दर्शन कराया। उड़िया संबलपुरी नृत्य ने लोक कला की मधुरता बिखेरी तो गुजराती गरबे ने उल्लास का संचार किया। पंजाबी भांगड़े ने ऊर्जा और उमंग से सभी को सराबोर कर दिया।
नेपाली भाषा में प्रस्तुत सीता नाटिका के माध्यम से भावनात्मक गहराई और नैतिक संदेश का प्रसार हुआ। इसी प्रकार अन्य भाषाओं के कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया, जिनमें संबंधित भाषाई समाज के बाल कलाकारों से लेकर वरिष्ठजनों तक ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर यह प्रमाणित किया कि मातृभाषा और लोक कला के प्रति समर्पण किसी आयु या पीढ़ी की सीमा नहीं जानता। यह सांध्यकालीन आयोजन वास्तव में देश की सांस्कृतिक संपदा का एक जीवंत महोत्सव बन गया।