दीपावली : अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का महापर्व

सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश : आत्मशुद्धि, शक्ति, समर्पण, समृद्धि और विश्वकल्याण का प्रतीक है दीपोत्सव

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    05-Nov-2026
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दीपावली : अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का महापर्व 
 
 
डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
 
 
सनातन भारतीय संस्कृति में दीपावली केवल दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और उत्सव मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह भारतीय जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक निरंतरता का महापर्व है। यह पर्व मनुष्य को उसके भीतर विद्यमान अंधकार को मिटाकर ज्ञान, विवेक, सत्य, सदाचार और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा देता है। दीपावली का प्रत्येक दीपक एक संदेश देता है कि परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, सत्य, धर्म और सद्कर्म की ज्योति कभी बुझनी नहीं चाहिए।
 
दीपावली भारतीय सभ्यता का ऐसा उत्सव है, जिसमें आध्यात्मिकता और भौतिक समृद्धि, शक्ति और भक्ति, परंपरा और आधुनिकता तथा व्यक्तिगत आनंद और सामाजिक उत्तरदायित्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यह पर्व केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विश्व के अनेक देशों में भारतीय मूल के नागरिकों और सनातन संस्कृति के अनुयायियों के माध्यम से वैश्विक सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
 
दीपावली : असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय
 
दीपावली का सबसे व्यापक और लोकप्रिय सांस्कृतिक संदर्भ भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास के पश्चात लंका के अत्याचारी राजा रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटने से जुड़ा है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अयोध्या आगमन केवल एक राजा की घर वापसी नहीं थी, बल्कि वह धर्म, मर्यादा, न्याय, कर्तव्य और लोककल्याण की पुनर्स्थापना का प्रतीक था।
 
अयोध्यावासियों ने अपने आराध्य श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के स्वागत में दीप प्रज्वलित किए। यह परंपरा इस बात का प्रतीक बनी कि जब समाज अन्याय, अहंकार और अत्याचार के विरुद्ध एकजुट होता है, तब अंततः विजय धर्म और सत्य की ही होती है।
 
रावण केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि अहंकार, सत्ता के दुरुपयोग, अनैतिकता, अन्याय और अधर्म की प्रवृत्तियों का प्रतीक भी है। इसी प्रकार श्रीराम का चरित्र सत्य, संयम, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और आदर्श शासन का प्रतिनिधित्व करता है।
 
इसलिए दीपावली हमें यह संदेश देती है कि वास्तविक विजय केवल बाहरी शत्रुओं पर प्राप्त नहीं होती, बल्कि अपने भीतर के रावण अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और अहंकार पर विजय प्राप्त करना भी उतना ही आवश्यक है।
 
दीपावली के पांच दिनों का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व
 
दीपावली का उत्सव सामान्यतः पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत धनतेरस से होती है और भाई दूज के साथ यह पर्व संपन्न होता है। अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक परंपराओं और तिथियों के अनुसार कुछ अंतर भी देखने को मिलता है। प्रत्येक दिन का अपना धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक महत्व है।
 
1. धनतेरस : स्वास्थ्य, समृद्धि और शुभ आरंभ का संदेश
 
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस मनाया जाता है। इसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं। इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा का विशेष महत्व है। समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि के अमृत कलश के साथ प्रकट होने की पौराणिक मान्यता है। आयुर्वेद और स्वास्थ्य परंपरा में उन्हें विशेष सम्मान प्राप्त है।
 
इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा भी की जाती है। सोना, चांदी, धातु के बर्तन और उपयोगी वस्तुएं खरीदने की परंपरा है। इसका मूल संदेश है कि समृद्धि का आधार स्वास्थ्य, परिश्रम, विवेकपूर्ण धनार्जन और सदुपयोग होना चाहिए।
 
2. नरक चतुर्दशी : नकारात्मकता और बुराइयों से मुक्ति
 
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के अत्याचार का अंत किए जाने की पौराणिक कथा इससे जुड़ी है।
 
यह दिन संदेश देता है कि समाज और व्यक्ति दोनों को भय, हिंसा, अन्याय, अज्ञान और नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्त होना चाहिए। बाहरी स्वच्छता के साथ मन की स्वच्छता भी आवश्यक है।
 
3. दीपावली : प्रकाश, लक्ष्मी, गणेश और मंगल का महापर्व
 
अमावस्या की रात्रि को दीपावली का मुख्य पर्व मनाया जाता है। इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। लक्ष्मी समृद्धि और ऐश्वर्य की प्रतीक हैं, जबकि गणेश बुद्धि, विवेक और विघ्नों के निवारण के प्रतीक हैं।
 
इसका संदेश है कि धन के साथ विवेक, समृद्धि के साथ संस्कार और सफलता के साथ विनम्रता भी होनी चाहिए। केवल धनवान होना पर्याप्त नहीं, बल्कि धन का उपयोग समाज और राष्ट्र के कल्याण में करना भी आवश्यक है।
 
4. गोवर्धन पूजा : प्रकृति संरक्षण और सामूहिकता का संदेश
 
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का आयोजन होता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत धारण करने की कथा प्रकृति, पर्यावरण, गौवंश और सामूहिक संरक्षण के महत्व को सामने लाती है।
 
यह पर्व सिखाता है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग है। धरती, जल, वन, पर्वत, पशु और कृषि का संरक्षण मानव जीवन की अनिवार्य जिम्मेदारी है।
 

5. भाई दूज : परिवार, स्नेह और सामाजिक संबंधों की मजबूती
 
कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भाई दूज मनाई जाती है। इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगाकर उसके सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती है।
 
यह पर्व भाई-बहन के पवित्र संबंध, पारिवारिक एकता, स्नेह, विश्वास और परस्पर उत्तरदायित्व को मजबूत करता है।
 
इस प्रकार पांच दिनों का दीपोत्सव जीवन के पांच महत्वपूर्ण आयामों को सामने रखता है - स्वास्थ्य, शुद्धि, समृद्धि, प्रकृति संरक्षण और पारिवारिक एकता। यह एक ऐसा सांस्कृतिक विधान है, जो व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज तक जीवन को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास करता है।
 
धनतेरस से पहले का संदेश : समृद्धि से पहले स्वास्थ्य और परिश्रम
 
धनतेरस से दीपोत्सव का आरंभ होना अपने आप में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संकेत है। भारतीय परंपरा में धन को केवल मुद्रा, सोना या संपत्ति के रूप में नहीं देखा गया है। वास्तविक धन में स्वास्थ्य, ज्ञान, सदाचार, श्रम, परिवार, संबंध और आत्मिक संतोष भी शामिल हैं।
 
भगवान धन्वंतरि का स्मरण इस बात का प्रतीक है कि स्वस्थ शरीर ही जीवन के सभी सुखों और उपलब्धियों का आधार है। यदि स्वास्थ्य नहीं है तो धन और वैभव भी आनंद नहीं दे सकते।
 
धनतेरस का एक आर्थिक और सामाजिक पक्ष भी है। इस अवसर पर बाजारों में खरीदारी बढ़ती है, कारीगरों, छोटे व्यापारियों, स्वर्णकारों, कुम्हारों और स्थानीय उत्पादकों को रोजगार मिलता है। मिट्टी के दीपक खरीदना, स्थानीय शिल्पकारों का समर्थन करना और स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करना इस उत्सव को आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ता है।
 
इसलिए धनतेरस का संदेश केवल खरीदारी तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका वास्तविक अर्थ है - स्वस्थ जीवन, परिश्रम से अर्जित धन, ईमानदार व्यापार और समाज के प्रति आर्थिक उत्तरदायित्व।
 
दीपक : भारतीय दर्शन में आत्मा और चेतना का प्रतीक
 
दीपावली में मिट्टी का छोटा-सा दीपक सबसे बड़ा सांस्कृतिक संदेश देता है। मिट्टी का दीपक हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। उसमें डाला गया तेल या घी हमारी साधना और समर्पण का प्रतीक है, उसकी बाती हमारे संकल्प का और उसकी लौ ज्ञान तथा चेतना का प्रतीक है।
 
एक दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। यही भारतीय जीवन-दर्शन का मूल तत्व है - स्वयं आगे बढ़ो, लेकिन दूसरों के मार्ग को भी प्रकाशित करो।
 
दीपक का प्रकाश किसी के साथ भेदभाव नहीं करता। वह अमीर और गरीब, छोटे और बड़े, जाति और वर्ग का अंतर नहीं देखता। उसका प्रकाश सभी को समान रूप से मिलता है। यही समरसता, समानता और मानवता का संदेश है।
 
दीपावली हमें यह भी सिखाती है कि अंधकार को कोसने से प्रकाश नहीं होता, उसके लिए एक दीपक जलाना पड़ता है। इसी प्रकार समाज में बुराइयों की आलोचना करना पर्याप्त नहीं, बल्कि अपने आचरण से सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत करना आवश्यक है।
 
दीपावली और सनातन संस्कृति की शक्ति चेतना
 
दीपावली का आध्यात्मिक स्वरूप शक्ति, साधना और समर्पण से भी जुड़ा हुआ है। माता लक्ष्मी की आराधना के माध्यम से हम समृद्धि की कामना करते हैं, माता सरस्वती के माध्यम से ज्ञान और विवेक का महत्व समझते हैं तथा शक्ति स्वरूपा देवी के माध्यम से अन्याय और नकारात्मकता के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
 
सनातन संस्कृति में शक्ति और भक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। शक्ति का उद्देश्य संरक्षण है, विनाश नहीं; समृद्धि का उद्देश्य लोककल्याण है, केवल व्यक्तिगत उपभोग नहीं; और ज्ञान का उद्देश्य अहंकार बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण जीवन जीना है।
 
दीपावली हमें यही संतुलन सिखाती है। समाज में जब धर्म, नैतिकता और न्याय कमजोर होते हैं, तब केवल उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं होता। आवश्यकता होती है सामूहिक चेतना, साहस, संगठन और सकारात्मक संकल्प की।
 
यही कारण है कि दीपावली का संदेश केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के उत्थान तक विस्तृत है।
 
श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश : दैवी गुणों की स्थापना
 
दीपावली की मूल भावना को श्रीमद्भगवद्गीता के एक महत्वपूर्ण श्लोक से भी समझा जा सकता है-
 
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥
 
- श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 5
 
अर्थात् दैवी संपदा मुक्ति का कारण है और आसुरी संपदा बंधन का कारण मानी गई है। हे अर्जुन! तुम शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी संपदा से युक्त हो।
 
गीता का यह संदेश दीपावली की आत्मा को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार है। दया, सत्य, अहिंसा, क्षमा, त्याग, संयम, विनम्रता और आत्मनियंत्रण जैसे गुण दैवी संपदा हैं। इसके विपरीत अहंकार, क्रोध, लोभ, छल, हिंसा और दूसरों का शोषण आसुरी प्रवृत्तियां हैं।
 
दीपावली का वास्तविक उत्सव तभी सार्थक होगा जब हम अपने भीतर दैवी गुणों का विकास करें और आसुरी प्रवृत्तियों का त्याग करें।
 
दीपावली : पर्यावरण, सामाजिक समरसता और आत्मनिर्भरता का पर्व
 
आधुनिक समय में दीपावली के स्वरूप में भी कुछ आवश्यक बदलावों की अपेक्षा है। उत्सव की मूल भावना को बनाए रखते हुए हमें पर्यावरण और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सजग रहना चाहिए।
 
मिट्टी के दीपक जलाना, स्थानीय कारीगरों से खरीदारी करना, जरूरतमंद परिवारों के साथ खुशियां बांटना, अनावश्यक दिखावे से बचना और ध्वनि एवं वायु प्रदूषण को नियंत्रित रखना समय की मांग है।
 
दीपावली का अर्थ यह नहीं कि एक परिवार के घर में हजारों दीप जलें और उसके पड़ोस में कोई परिवार अभाव के अंधकार में रहे। दीपोत्सव का वास्तविक अर्थ है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति इस आनंद में सहभागी बने।
 
गरीब परिवारों के बच्चों को वस्त्र, मिठाई और शिक्षा सामग्री देना, वृद्धजनों के साथ समय बिताना, अस्पतालों और सेवा संस्थानों में जरूरतमंदों की सहायता करना दीपावली की मानवीय भावना को मजबूत करता है।
 
यह पर्व हमें उपभोग के स्थान पर संवेदनशीलता, प्रदर्शन के स्थान पर परोपकार और व्यक्तिगत आनंद के स्थान पर सामूहिक आनंद की प्रेरणा देता है।
 
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में दीपावली : वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश
 
दीपावली आज भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, सिंगापुर, मलेशिया, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अनेक अन्य देशों में दीपावली उत्साहपूर्वक मनाई जाती है।
 
दुनिया के विभिन्न देशों में बसे भारतीय मूल के नागरिक दीपावली के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पारिवारिक परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुंचा रहे हैं। अनेक देशों में सार्वजनिक आयोजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, दीप प्रज्वलन और सामुदायिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।
 
दीपावली का वैश्विक संदेश किसी एक धर्म, समुदाय या देश तक सीमित नहीं है। इसका मूल भाव है कि मानवता के सामने उपस्थित चुनौतियों का समाधान ज्ञान, विवेक, सत्य, सहिष्णुता, सहयोग और शांति से संभव है।
 
आज विश्व युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, सामाजिक संघर्ष, पर्यावरण संकट, आर्थिक असमानता और मानसिक तनाव जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में दीपावली का प्रकाश मानवता को एक सकारात्मक दिशा दे सकता है।
 
भारतीय संस्कृति का सूत्र वाक्य-
 
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
 
अर्थात् यह अपना है और यह पराया है, ऐसी गणना संकीर्ण विचार वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों के लिए संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार है।
 
यह भावना दीपावली के वैश्विक संदेश को और व्यापक बनाती है। दीपावली हमें सिखाती है कि प्रकाश की कोई सीमा नहीं होती। एक स्थान पर जलाया गया दीपक दूसरे दीपक को प्रकाशित कर सकता है, बिना अपना प्रकाश कम किए। इसी प्रकार ज्ञान, सद्भाव, करुणा और प्रेम बांटने से घटते नहीं, बल्कि बढ़ते हैं।
 
भारतीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव
 
दीपावली भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर है। वस्त्र उद्योग, हस्तशिल्प, मिट्टी के दीपक, आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स, मिठाई, खाद्य प्रसंस्करण, सजावटी सामग्री और परिवहन जैसे अनेक क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां तेज होती हैं।
 
यह पर्व करोड़ों छोटे व्यापारियों, दुकानदारों, कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय उत्पादकों की आजीविका से जुड़ा है।
 
भारत की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था में दीपावली की भूमिका इस बात का उदाहरण है कि परंपराएं केवल अतीत की स्मृतियां नहीं होतीं, बल्कि वे वर्तमान अर्थव्यवस्था और भविष्य की संभावनाओं को भी दिशा देती हैं।
 
यदि दीपावली पर हम स्थानीय उत्पादों, स्वदेशी वस्तुओं और पारंपरिक शिल्प को प्राथमिकता दें तो यह उत्सव आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को भी मजबूत कर सकता है।
 
दीपावली का वास्तविक संकल्प : अपने भीतर एक दीप जलाएं
 
आज आवश्यकता है कि दीपावली को केवल एक वार्षिक उत्सव के रूप में न देखा जाए, बल्कि इसे जीवन के आचरण में उतारा जाए।
 
हम संकल्प लें कि-
* असत्य के स्थान पर सत्य को अपनाएंगे।
* अन्याय के सामने मौन नहीं रहेंगे।
* अपने भीतर के अहंकार, लोभ और क्रोध को नियंत्रित करेंगे।
* परिवार और समाज में प्रेम, सद्भाव और समरसता बढ़ाएंगे।
* प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जंतुओं के संरक्षण के प्रति जिम्मेदार रहेंगे।
* परिश्रम, ईमानदारी और नैतिकता से समृद्धि अर्जित करेंगे।
* जरूरतमंदों के जीवन में भी खुशियों का दीप जलाएंगे।
* भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रगौरव को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाएंगे।
 
यही दीपावली की वास्तविक साधना है।
 
प्रकाश का पर्व, मानवता का संकल्प
 
दीपावली सनातन संस्कृति की वह शाश्वत परंपरा है, जो हर वर्ष हमें अपने जीवन, विचारों और आचरण का पुनर्मूल्यांकन करने का अवसर देती है। यह हमें बताती है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटा-सा दीपक उसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त है।
 
भगवान श्रीराम का आदर्श हमें मर्यादा और कर्तव्य का बोध कराता है। माता लक्ष्मी की आराधना हमें समृद्धि और सदुपयोग का संदेश देती है। भगवान गणेश की पूजा विवेक और शुभारंभ की प्रेरणा देती है। भगवान धन्वंतरि का स्मरण स्वास्थ्य का महत्व समझाता है और गोवर्धन पूजा प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का बोध कराती है।
 
इसलिए दीपावली केवल घरों को प्रकाशित करने का पर्व नहीं, बल्कि विचारों, संस्कारों, संबंधों और समाज को प्रकाशित करने का अवसर है।
 
आज जब दुनिया को शांति, सद्भाव, सहिष्णुता और नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता है, तब भारत की सनातन संस्कृति का यह महापर्व संपूर्ण मानवता को एक सार्वभौमिक संदेश देता है - सत्य का मार्ग अपनाओ, धर्म का संरक्षण करो, ज्ञान का प्रकाश फैलाओ और संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए कार्य करो।
 
अंततः दीपावली की सार्थकता केवल इस बात में नहीं है कि हमारे घर कितने दीपों से जगमगा रहे हैं, बल्कि इसमें है कि हमारे कारण कितने जीवनों में प्रकाश पहुंच रहा है।
 
आइए, इस दीपावली पर केवल घरों में नहीं, अपने हृदय में भी दीप जलाएं। अपने भीतर के अंधकार को मिटाएं और सत्य, सेवा, समर्पण, शक्ति तथा सद्भाव के प्रकाश से भारत ही नहीं, संपूर्ण विश्व को आलोकित करने का संकल्प लें।
 
शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसम्पदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
 
अर्थात् दीपज्योति कल्याण, आरोग्य और समृद्धि प्रदान करे तथा हमारे भीतर की नकारात्मक बुद्धि का नाश करे। उस पवित्र दीपज्योति को नमन है।