कैप्टन स्मित मच्छार की वीरता में दिखाई दी गीता की विश्वबंधुत्व भावना

जब घायल पायलट ने बचाई जिंदगियां

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    03-Oct-2026
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कैप्टन स्मित मच्छार की वीरता में दिखाई दी गीता की विश्वबंधुत्व भावना
 
विशेष आलेख
डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
 
 
भारत की संस्कृति केवल अपनी रक्षा और अपने सुख की बात नहीं करती, बल्कि समस्त मानवता के कल्याण की कामना करती है। हमारी सभ्यता का मूल स्वर संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व; घृणा नहीं, करुणा; कट्टरता नहीं, संवाद; और स्वार्थ नहीं, लोककल्याण है।
 
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं
 
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥”
 श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 12, श्लोक 13
 
अर्थात जो व्यक्ति किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है, अहंकार और ममता से ऊपर उठकर सुख-दुःख में समभाव रखता है - वही श्रेष्ठ आध्यात्मिक जीवन का अधिकारी है।
 
गीता का यह संदेश आज की दुनिया के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। विशेषकर तब, जब दुनिया के अनेक हिस्सों में हिंसा, कट्टरता, घृणा और आतंक मानवता के सामने चुनौती बने हुए हैं।
 
इसी पृष्ठभूमि में भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार की वह घटना सामने आती है, जिसमें संकट की घड़ी में उन्होंने अपने जीवन की परवाह से पहले विमान में सवार यात्रियों के जीवन को महत्व दिया।
 
जब कुछ क्षणों में सैकड़ों जिंदगियों का फैसला होना था
 
रिपोर्टों के अनुसार, फ्लाईदुबई की उड़ान के दौरान कॉकपिट में गंभीर संकट उत्पन्न हुआ। कैप्टन स्मित मच्छार घायल हो गए। विमान के सामने ऐसी परिस्थिति थी जिसमें थोड़ी-सी चूक सैकड़ों यात्रियों के जीवन पर भारी पड़ सकती थी।
 
लेकिन घायल होने के बावजूद कैप्टन मच्छार ने हार नहीं मानी। उन्होंने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में सफलता प्राप्त की, जिससे स्थिति को नियंत्रित करने का अवसर मिला और अंततः विमान को सुरक्षित रूप से उतारा जा सका।
 
यह केवल एक पायलट की तकनीकी दक्षता की कहानी नहीं है।
 
यह कर्तव्य के प्रति समर्पण और मानव जीवन के प्रति संवेदना की कहानी है।
 
अपने जीवन से पहले दूसरों का जीवन
 
संकट की सामान्य स्थिति में मनुष्य सबसे पहले अपने जीवन की रक्षा के बारे में सोचता है। यह स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है।
 
लेकिन असाधारण व्यक्ति वही होता है जो अपने व्यक्तिगत भय और संकट से ऊपर उठकर दूसरों की सुरक्षा के लिए खड़ा हो जाए।
 
कैप्टन मच्छार के सामने भी भय और संकट था। शरीर घायल था, लेकिन मन में एक जिम्मेदारी थी - विमान में बैठे लोगों को सुरक्षित रखना।
 
यहीं से उनकी वीरता का वास्तविक अर्थ सामने आता है।
 
वीरता केवल युद्धभूमि में दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं।
 
कभी वीरता आकाश में हजारों फीट की ऊंचाई पर कॉकपिट के भीतर भी दिखाई देती है।
 
गीता का संदेश और पायलट की कर्मभूमि
 
गीता का संदेश किसी एक व्यक्ति, समुदाय या देश तक सीमित नहीं है।
 
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां…”
 
किसी प्राणी से द्वेष न करना और सबके प्रति मैत्री तथा करुणा रखना - यह मानवता की सार्वभौमिक भावना है।
 
आज दुनिया को इसी विचार की आवश्यकता है।
 
धर्म के नाम पर कट्टरता, विचार के नाम पर हिंसा और पहचान के नाम पर घृणा मानव सभ्यता को कमजोर करती है। इसके विपरीत भारतीय दर्शन मनुष्य को जोड़ने की बात करता है।
 
इसीलिए भारतीय चिंतन में कहा गया
 
“वसुधैव कुटुम्बकम्।”
 
पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
 
और इसी भावना का विस्तार है
 
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”
 
सब सुखी हों, सब निरोग हों।
 
कैप्टन मच्छार ने किसी मंच पर इन सिद्धांतों का भाषण नहीं दिया। उन्होंने संकट की घड़ी में अपने कर्म से मानव जीवन को प्राथमिकता देकर इन मूल्यों की एक व्यावहारिक झलक प्रस्तुत की।
 
भारतीय संस्कृति कट्टरता नहीं, करुणा सिखाती है
 
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में अनेक मार्ग हैं, अनेक विचार हैं, अनेक उपासना पद्धतियां हैं। फिर भी भारतीय चिंतन में मनुष्य को जोड़ने वाली एक साझा चेतना दिखाई देती है।
 
गीता का “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” हमें बताता है कि आध्यात्मिकता का अर्थ किसी दूसरे के प्रति घृणा पैदा करना नहीं है।
 
सच्ची शक्ति वह है जो कमजोर की रक्षा करे।
 
सच्ची वीरता वह है जो संकट में भी संयम रखे।
 
सच्चा धर्म वह है जो मानवता को जोड़ता है।
 
और सच्ची संस्कृति वह है जो अपने साथ-साथ दूसरे के जीवन और सम्मान की रक्षा करना सिखाती है।
 
इसीलिए कैप्टन मच्छार की घटना को केवल विमानन क्षेत्र की घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें मानवता के लिए भी एक बड़ा संदेश छिपा है।
 
‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा
 
आज का युग व्यक्तिवाद का युग है। मनुष्य अपने अधिकारों और अपने हितों के बारे में सजग है। लेकिन किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक शक्ति इस बात से तय होती है कि उसमें व्यक्ति दूसरों के अधिकार और जीवन के प्रति कितना संवेदनशील है।
भारतीय संस्कृति हमें ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा सिखाती है।
 
यही यात्रा परिवार को समाज बनाती है।
 
यही समाज को राष्ट्र बनाती है।
 
और यही राष्ट्रों को विश्व-परिवार की ओर ले जाती है।
 
कैप्टन मच्छार की वीरता में यही भाव दिखाई देता है - मेरी सुरक्षा के साथ इन यात्रियों की सुरक्षा भी मेरी जिम्मेदारी है।
 
दुनिया को युद्ध नहीं, मानवता की आवश्यकता है
 
आज दुनिया अनेक प्रकार के तनावों से गुजर रही है। कहीं युद्ध है, कहीं आतंकवाद है, कहीं धार्मिक कट्टरता है और कहीं सामाजिक विभाजन।
 
ऐसे समय में भारत की ओर दुनिया आशा से देखती है तो उसका एक कारण हमारी वह सांस्कृतिक दृष्टि भी है, जो कहती है
 
“वसुधैव कुटुम्बकम्।”
 
यह विचार किसी एक धर्म के वर्चस्व की घोषणा नहीं करता। यह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की कल्पना है।
 
गीता का संदेश भी इसी व्यापक मानवीय धरातल पर समझा जा सकता है।
 
द्वेष से द्वेष बढ़ता है।
करुणा से विश्वास बढ़ता है।
हिंसा से भय पैदा होता है।
मानवता से सुरक्षा का भाव पैदा होता है।
 
वीरता का सम्मान, मानवता का संदेश
 
कैप्टन स्मित मच्छार की घटना हमें यह भी सिखाती है कि किसी व्यक्ति की महानता केवल उसके पद से नहीं होती।
 
पायलट होना उनका पेशा था।
 
लेकिन संकट में यात्रियों के जीवन को बचाने के लिए स्वयं को जोखिम में डालना उनके चरित्र और कर्तव्यबोध की अभिव्यक्ति थी।
 
उनका साहस आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरक उदाहरण बन सकता है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, मनुष्य अपने विवेक, प्रशिक्षण, धैर्य और कर्तव्य से उसे चुनौती दे सकता है।
 
उनके साहस को शत-शत नमन।
 
उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना।
 
और इस पूरी घटना से विश्व के लिए एक संदेश-
 
मानवता किसी सीमा, भाषा या पहचान की मोहताज नहीं है।
भारत की प्रार्थना है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
 
अर्थात-
 
सब सुखी हों, सब निरोग हों, सबका जीवन मंगलमय हो और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
 
यही भारतीय संस्कृति का विश्व-संदेश है।
 
यही वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है।
 
और यही वह चेतना है, जिसमें वीरता केवल अपने लिए लड़ना नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन की रक्षा के लिए खड़े होना बन जाती है।
 
कैप्टन स्मित मच्छार को शत-शत नमन।
 
मानवता को नमन।
 
भारतीय संस्कृति की इस विश्वबंधुत्व भावना को नमन।