डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
भरोसे की आड़ में अपराध और मासूमियत के साथ विश्वासघात
समाज में कुछ अपराध ऐसे होते हैं, जो केवल कानून का उल्लंघन नहीं होते, बल्कि मानवीय विश्वास, सामाजिक नैतिकता और बच्चों की सुरक्षा के बुनियादी सिद्धांतों को भी झकझोर देते हैं। मध्य प्रदेश में प्यारे मियां उर्फ अब्दुल अय्यूब से जुड़ा नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण का मामला इसी श्रेणी में आता है। इस प्रकरण ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि जब किसी व्यक्ति के पास सामाजिक संपर्क, आर्थिक संसाधन और प्रभाव का सहारा हो, तो उसका दुरुपयोग रोकने के लिए हमारी व्यवस्था कितनी सतर्क है।
27 अक्टूबर 2026 को भोपाल की विशेष पॉक्सो अदालत ने इस मामले में प्यारे मियां को दस अलग-अलग आजीवन कारावास की सजाएं सुनाईं। इनमें आठ सजाएं उसके शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास की हैं। अदालत ने कुल 77 लाख 64 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। इसी प्रकरण में उसकी सहयोगी राबिया बी को 20 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। प्यारे मियां को जबलपुर जेल से भोपाल की अदालत में पेश किया गया था। इसीलिए इस घटना को जबलपुर में सुनाया गया फैसला कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। यह सजा भोपाल की विशेष अदालत ने सुनाई है।
यह फैसला लगभग छह वर्ष पहले सामने आए उस प्रकरण का महत्वपूर्ण कानूनी पड़ाव है, जिसमें पांच नाबालिग बच्चियों से जुड़े यौन अपराधों की सुनवाई हुई। मामले का विवरण बताता है कि अपराध का तरीका केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं था, बल्कि नौकरी और बेहतर भविष्य की उम्मीद का कथित तौर पर अनुचित लाभ उठाने से जुड़ा था।
अपराध की पृष्ठभूमि: नौकरी का लालच और भरोसे का दुरुपयोग
अभियोजन पक्ष के अनुसार, प्यारे मियां वर्ष 2014 से नाबालिग लड़कियों को निशाना बना रहा था। उसे लेकर अदालत में प्रस्तुत मामले में यह आरोप सामने आया कि वह बच्चियों को घर में प्रतिमाह 10 हजार रुपये वेतन पर नौकरी दिलाने का प्रलोभन देता था। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और बेहतर अवसरों की तलाश कर रही लड़कियों के लिए ऐसा प्रस्ताव आकर्षक हो सकता था।
नौकरी का आश्वासन किसी भी परिवार के लिए सामान्यतः भरोसे और भविष्य की उम्मीद से जुड़ा होता है। लेकिन जब इसी भरोसे को किसी की असुरक्षा का लाभ उठाने के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो वह छल और शोषण का माध्यम बन जाता है। इस मामले में अभियोजन ने आरोप लगाया कि नौकरी का लालच देकर बच्चियों को अपने संपर्क में लाया गया और बाद में उनका यौन शोषण किया गया।
प्रकरण में राबिया बी की भूमिका भी सामने आई। अभियोजन के मुताबिक, वह बच्चियों को प्यारे मियां के पास ले जाने में मदद करती थी। अदालत ने उसे भी दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बच्चों के विरुद्ध अपराधों में केवल प्रत्यक्ष अपराध करने वाले व्यक्ति की भूमिका ही नहीं, बल्कि अपराध को संभव बनाने, पीड़ितों को उसके संपर्क में लाने और शोषण के लिए परिस्थितियां तैयार करने वाले सहयोगियों की भूमिका की भी जांच आवश्यक होती है।
जुलाई 2020: पुलिस की गश्त से सामने आया मामला
इस मामले का सार्वजनिक खुलासा जुलाई 2020 में हुआ। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 11 और 12 जुलाई की दरमियानी रात भोपाल के रातीबड़ क्षेत्र में पुलिस गश्त के दौरान पांच नाबालिग बच्चियां मिली थीं। वे संदिग्ध परिस्थितियों में थीं और नशे की हालत में पाई गई थीं।
पुलिस की पूछताछ और बाद में हुई काउंसलिंग के दौरान बच्चियों ने अपने साथ हुई घटनाओं के बारे में जानकारी दी। इसके बाद मामला पुलिस की जांच के दायरे में आया और शाहपुरा क्षेत्र में स्थित एक फ्लैट से जुड़ी गतिविधियों की पड़ताल की गई।
अभियोजन के अनुसार, बच्चियों को जन्मदिन मनाने के बहाने शाहपुरा क्षेत्र के एक फ्लैट पर बुलाया गया था। वहां पार्टी के दौरान उन्हें शराब पिलाए जाने और उनके साथ यौन अपराध किए जाने के आरोप सामने आए। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ बच्चियों के साथ कथित तौर पर अलग-अलग समय पर अन्य घटनाएं भी हुई थीं।
यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी नाबालिग की असुरक्षा, आर्थिक विवशता या बेहतर जीवन की इच्छा का फायदा उठाकर उसे अपराध की परिस्थिति में पहुंचाया जा सकता है? कानून और समाज, दोनों का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। किसी बच्ची की उम्र, उसकी परिस्थितियां या उसकी किसी व्यक्ति से पूर्व परिचितता उसके विरुद्ध यौन अपराध को उचित नहीं ठहरा सकती।
छिपे कैमरे, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और ब्लैकमेल के आरोप
इस प्रकरण में जांच से संबंधित समाचारों में एक और गंभीर पहलू सामने आया। पुलिस को संबंधित फ्लैट से छिपे हुए कैमरे मिलने की जानकारी दी गई। रिपोर्टों के अनुसार, इन कैमरों के माध्यम से बच्चियों के वीडियो बनाए जाते थे और बाद में उनका इस्तेमाल उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए किया जाता था। पुलिस को वहां से एक पिस्तौल मिलने की जानकारी भी प्रकाशित हुई, जिसका इस्तेमाल पीड़िताओं को डराने-धमकाने के लिए किए जाने का आरोप था।
इन विवरणों का महत्व केवल अपराध की गंभीरता तक सीमित नहीं है। यह उस संभावित तंत्र की ओर संकेत करता है, जिसमें किसी पीड़ित को पहले प्रलोभन देकर संपर्क में लाया जाता है, फिर उसका शोषण किया जाता है और उसके बाद भय या दबाव के माध्यम से उसे चुप रखने की कोशिश की जाती है।
यदि किसी पीड़िता को यह भय हो कि उसकी तस्वीरें या वीडियो सार्वजनिक कर दिए जाएंगे, तो उसके लिए परिवार, पुलिस या किसी विश्वसनीय व्यक्ति के सामने अपनी बात रखना और भी कठिन हो सकता है। नाबालिगों के मामलों में इस प्रकार का दबाव उनकी सुरक्षा और मानसिक स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट में लोक अभियोजक पी. एन. सिंह राजपूत ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को मामले में महत्वपूर्ण बताया। ऐसे साक्ष्य आधुनिक आपराधिक जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, किसी विशेष इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य ने किस आरोप को किस सीमा तक सिद्ध किया, इसका सटीक विवरण न्यायालय के निर्णय और आधिकारिक अभिलेखों से ही निर्धारित किया जाना चाहिए।
पीड़िताओं के बयान: न्याय की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार
यौन अपराधों की जांच और सुनवाई में पीड़िताओं के बयान अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इस मामले में भी पुलिस की पूछताछ, काउंसलिंग और उसके बाद की जांच के दौरान बच्चियों की ओर से जानकारी सामने आने की बात प्रकाशित हुई है।
नाबालिग पीड़िताओं के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया सामान्य पूछताछ से अलग संवेदनशीलता की मांग करती है। उन्हें ऐसा वातावरण मिलना चाहिए, जहां वे बिना डर, दबाव या अपमान के अपनी बात रख सकें। उनके बयान की जांच अन्य उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप की जाती है।
इस प्रकरण में बच्चियों के बयानों के शब्दशः विवरण, प्रत्येक पीड़िता की गवाही, जिरह के दौरान पूछे गए प्रश्न और प्रत्येक आरोप पर अदालत की अलग-अलग टिप्पणियां उपलब्ध समाचारों में पूरी तरह दर्ज नहीं हैं। इसलिए उनके नाम, व्यक्तिगत परिस्थितियां या कथित बयान गढ़कर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िताओं की पहचान उजागर करना उनकी निजता और सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकता है। उनकी पहचान सुरक्षित रखते हुए ही ऐसी घटनाओं पर सार्वजनिक चर्चा की जानी चाहिए।
कुछ प्रकाशित रिपोर्टों में इस प्रकरण के खुलासे के बाद एक पीड़िता की आत्महत्या का भी उल्लेख है। यह अत्यंत संवेदनशील विवरण है। इसकी परिस्थितियों, कारणों और मामले से उसके संबंध के बारे में कोई निष्कर्ष निकालने से पहले आधिकारिक अभिलेखों की पुष्टि आवश्यक है।
अभियोजन पक्ष की पैरवी और न्यायालय की भूमिका
इस मामले में शासन की ओर से लोक अभियोजक पी. एन. सिंह राजपूत ने पैरवी की। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, विशेष पॉक्सो अदालत की न्यायाधीश कुमुदिनी पटेल ने आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद दोषियों को सजा सुनाई।
किसी आपराधिक मुकदमे में अभियोजन की जिम्मेदारी केवल आरोप दोहराना नहीं होती। उसे न्यायालय के समक्ष साक्ष्य और गवाहों के आधार पर आरोपों को सिद्ध करना होता है। दूसरी ओर, न्यायालय का दायित्व उपलब्ध साक्ष्यों, लागू कानून और बचाव पक्ष के तर्कों पर विचार करते हुए निष्पक्ष निर्णय देना है।
इस मामले में बचाव पक्ष के वकील के नाम, उनकी विस्तृत दलीलों, गवाहों से की गई जिरह और न्यायालय द्वारा प्रत्येक तर्क पर दिए गए निष्कर्षों का पर्याप्त विवरण उपलब्ध समाचार सामग्री में नहीं मिलता। इसलिए यह कहना कि बचाव पक्ष ने कोई विशेष दलील दी या अदालत ने उसे किसी खास कारण से खारिज किया, आधिकारिक निर्णय देखे बिना उचित नहीं होगा।
फिर भी, सजा का घोषित परिणाम स्पष्ट है। विशेष अदालत ने प्यारे मियां को दस अलग-अलग आजीवन कारावास की सजाएं और 77.64 लाख रुपये का जुर्माना दिया। इनमें आठ सजाएं उसके शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास की हैं। सहयोगी राबिया बी को 20 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।
यह दंड इस बात को रेखांकित करता है कि बच्चों के विरुद्ध गंभीर यौन अपराधों के मामलों में दोषसिद्धि होने पर अदालत कठोर सजा दे सकती है। साथ ही, न्यायिक प्रक्रिया का प्रत्येक निष्कर्ष अदालत के आदेश और साक्ष्यों के आधार पर ही समझा जाना चाहिए।
पॉक्सो कानून और बच्चों की सुरक्षा का प्रश्न
बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने के लिए भारत में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 यानी पॉक्सो कानून लागू है। यह कानून नाबालिगों के विरुद्ध यौन अपराधों को संबोधित करता है और ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था करता है।
इस मामले से समाज के सामने कई प्रश्न उभरते हैं। क्या नौकरी दिलाने के नाम पर नाबालिगों से संपर्क करने वाले व्यक्तियों की पर्याप्त जांच होती है? क्या परिवारों और बच्चों को सुरक्षित रोजगार तथा ऑनलाइन-ऑफलाइन संपर्कों के जोखिमों के बारे में जागरूक किया जाता है? क्या किसी बच्ची के असामान्य व्यवहार, भय या मानसिक तनाव को समय रहते समझा जाता है?
इन प्रश्नों का समाधान केवल कठोर दंड से नहीं होगा। इसके लिए पुलिस, विद्यालयों, परिवारों, सामाजिक संस्थाओं और बाल संरक्षण तंत्र के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है।
बच्चों को यह सिखाना भी महत्वपूर्ण है कि किसी अनजान या प्रभावशाली व्यक्ति का आकर्षक प्रस्ताव अपने आप में उसकी विश्वसनीयता का प्रमाण नहीं होता। नौकरी, उपहार, घूमने या किसी समारोह में बुलाने के बहाने यदि कोई व्यक्ति गोपनीयता बनाए रखने, अकेले मिलने या अनुचित व्यवहार करने का दबाव बनाए, तो बच्चे को बिना भय किसी भरोसेमंद वयस्क से सहायता लेने का अवसर मिलना चाहिए।
समाज के लिए चेतावनी: चुप्पी अपराधी को ताकत देती है
ऐसे मामलों में परिवारों और समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यौन शोषण के शिकार बच्चों को दोषी ठहराने, उन पर संदेह करने या उन्हें सामाजिक कलंक का भय दिखाने के बजाय उनकी बात सुनना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
किसी बच्ची के साथ अपराध होने पर उसकी पहचान सार्वजनिक करना, उसकी निजी तस्वीरें साझा करना या उसके चरित्र पर प्रश्न उठाना उसके साथ अन्याय को और बढ़ा सकता है। समाज को यह समझना होगा कि अपराध की जिम्मेदारी अपराध करने वाले व्यक्ति की होती है, पीड़ित बच्चे की नहीं।
यदि किसी बच्चे के साथ दुर्व्यवहार की आशंका हो, तो परिवार को पुलिस, बाल कल्याण तंत्र या बाल सहायता सेवा से संपर्क करना चाहिए। भारत में बच्चों की सहायता के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 उपलब्ध है।
कठोर सजा के साथ सुरक्षित बचपन का संकल्प
प्यारे मियां प्रकरण का फैसला केवल एक आपराधिक मुकदमे का अंत नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर सामाजिक चेतना का विषय भी है। नौकरी और बेहतर भविष्य का प्रलोभन देकर नाबालिगों का कथित शोषण किए जाने से जुड़ा यह मामला बताता है कि भरोसे का दुरुपयोग कितना गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
दस अलग-अलग आजीवन कारावास की सजाएं और 77.64 लाख रुपये का जुर्माना इस मामले में अदालत द्वारा सुनाया गया कठोर दंड है। लेकिन किसी भी न्यायिक फैसले की वास्तविक सामाजिक सार्थकता तभी बढ़ती है, जब उससे बच्चों की सुरक्षा के प्रति संस्थागत जवाबदेही मजबूत हो, पीड़िताओं को सम्मान और सहायता मिले तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के प्रयास प्रभावी बनें।
एक सभ्य समाज की पहचान केवल उसके कानूनों की कठोरता से नहीं, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों - बच्चों - को कितना सुरक्षित रखता है। प्रत्येक बच्ची को भयमुक्त जीवन, शिक्षा, सम्मान और अपने भविष्य का चुनाव करने का अधिकार है। इन अधिकारों की रक्षा परिवार, समाज, प्रशासन और न्यायपालिका—सभी की साझा जिम्मेदारी है।