डॉ भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
राष्ट्र के लिए जिया वह जीवन
निज सुख की चाह नहीं थी, न वैभव का अभिमान था,
राष्ट्रदेव के चरणों में अर्पित उनका प्राण था।
विचारों की ज्योति जलाकर, संगठन का मार्ग बनाया,
श्रमिक, किसान और वंचित में राष्ट्रभाव जगाया।
पद की चाह नहीं, प्रसिद्धि का कोई मोह नहीं,
राष्ट्रकार्य से बड़ा उनके लिए कोई और ध्येय नहीं।
संघ की शाखा से निकला वह कर्मयोग का संदेश,
समर्पण, सेवा, स्वाभिमान से बनेगा समर्थ देश।
समय भले ही बदल जाए, विचार अमर रह जाते हैं,
तप और त्याग से लिखे हुए इतिहास दिशा दिखाते हैं।
दत्तोपंत जी का जीवन हम सबको यही सिखाता है,
राष्ट्र प्रथम का संकल्प ही जीवन सफल बनाता है।
राष्ट्रकार्य को जीवन का ध्येय बनाने वाले दत्तोपंत ठेंगड़ी
भारत के राष्ट्रजीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके पद, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा निर्मित विचारधारा, संगठनों और सामाजिक परिवर्तन की दिशा से होती है। दत्तोपंत ठेंगड़ी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रकार्य, संगठन निर्माण, श्रमिकों के अधिकारों और भारतीय चिंतन पर आधारित सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की स्थापना के लिए समर्पित किया।
14 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि हमें केवल एक महान संगठनकर्ता का स्मरण करने का अवसर नहीं देती, बल्कि यह आत्ममंथन करने की प्रेरणा भी देती है कि राष्ट्र के प्रति हमारा दायित्व क्या है और हम अपने जीवन को समाजोपयोगी कैसे बना सकते हैं।
दत्तोपंत ठेंगड़ी का जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों से निर्मित उस कर्मयोग की अभिव्यक्ति था, जिसमें व्यक्ति का मूल्य उसके पद से नहीं, बल्कि उसके कार्य, विचार, आचरण और समाज के प्रति समर्पण से निर्धारित होता है।
उनका विश्वास था कि भारत की समस्याओं का समाधान भारतीय समाज की प्रकृति, संस्कृति, आवश्यकताओं और ऐतिहासिक अनुभवों को समझकर ही खोजा जा सकता है। इसी दृष्टि ने उन्हें श्रमिक आंदोलन, किसान संगठन और स्वदेशी चिंतन के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान दिलाई।
संघ के संस्कारों से राष्ट्रजीवन के व्यापक क्षेत्र तक
दत्तोपंत ठेंगड़ी का जन्म 10 नवंबर 1920 को महाराष्ट्र में हुआ था। युवावस्था से ही वे राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आने के बाद उन्होंने अपना जीवन संगठनात्मक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया।
संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की अपेक्षाओं से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र को प्राथमिकता दी। प्रचारक जीवन का मूल भाव है-व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से मुक्त होकर समाज के बीच रहना, लोगों को जोड़ना, विचारों का प्रसार करना और संगठन को सशक्त बनाना।
दत्तोपंत ठेंगड़ी ने इस भाव को केवल अपने जीवन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे विभिन्न सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में व्यावहारिक रूप देने का प्रयास किया।
उनके सामने प्रश्न था कि भारत का श्रमिक केवल आर्थिक उत्पादन का साधन बनकर क्यों रह जाए? उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय दायित्वों को भी समान महत्व क्यों न मिले? इसी प्रकार किसान को केवल कृषि उत्पादन करने वाला व्यक्ति मानने के बजाय भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज की आधारशिला के रूप में क्यों न देखा जाए?
इन प्रश्नों ने उनके चिंतन को दिशा दी। उन्होंने श्रमिकों और किसानों के बीच संगठनात्मक कार्य करते हुए भारतीय समाज के व्यापक वर्गों तक राष्ट्रवादी विचारों को पहुंचाने का प्रयास किया।
भारतीय मजदूर संघ : श्रमिक आंदोलन को मिली नई दिशा
दत्तोपंत ठेंगड़ी के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारतीय मजदूर संघ की स्थापना है। इसकी स्थापना 23 जुलाई 1955 को हुई। यह दिन महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती भी है।
भारतीय मजदूर संघ के माध्यम से उन्होंने श्रमिकों को संगठित करने, उनके अधिकारों की रक्षा करने और श्रम के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने का प्रयास किया।
उनकी दृष्टि में श्रमिक केवल उत्पादन की प्रक्रिया का एक हिस्सा नहीं था। वह राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला नागरिक था। इसलिए श्रमिक आंदोलन का उद्देश्य केवल वेतन वृद्धि या आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि श्रमिक की गरिमा, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल पर सम्मान और राष्ट्र के आर्थिक विकास में उसकी भागीदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
भारतीय मजदूर संघ की विचारधारा में श्रमिक हितों के साथ राष्ट्रीय हित को महत्व दिया गया। ठेंगड़ी जी ने वर्ग-संघर्ष की अवधारणा के स्थान पर श्रमिकों, उद्योगों और समाज के बीच संवाद, सहयोग तथा संतुलन पर बल दिया।
उनका चिंतन इस बात पर केंद्रित था कि उद्योग और श्रमिक एक-दूसरे के विरोधी पक्ष बनकर नहीं, बल्कि परस्पर दायित्वों को समझते हुए देश की आर्थिक प्रगति में योगदान कर सकते हैं।
इस दृष्टिकोण का अर्थ श्रमिकों की समस्याओं की उपेक्षा करना नहीं था। इसके विपरीत, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए आर्थिक व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और समाजोपयोगी बनाने की आवश्यकता पर जोर देना था।
आज जब रोजगार की प्रकृति बदल रही है, असंगठित क्षेत्र का विस्तार हो रहा है और तकनीकी परिवर्तन श्रम बाजार को प्रभावित कर रहे हैं, तब श्रमिक की गरिमा, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक न्याय से संबंधित उनके विचारों पर नए सिरे से विचार करना प्रासंगिक है।
किसान, श्रमिक और स्वदेशी : एकात्म सामाजिक चिंतन
दत्तोपंत ठेंगड़ी का कार्य भारतीय मजदूर संघ तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने किसानों के संगठन और स्वदेशी विचार के प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय किसान संघ की स्थापना 1979 में हुई। इसके गठन और विकास के पीछे कृषि, किसान हितों तथा भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को महत्व देने की सोच थी।
ठेंगड़ी जी समझते थे कि भारत जैसे देश की आर्थिक व्यवस्था का मूल्यांकन केवल उत्पादन, लाभ और उपभोग के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। इसमें कृषि, ग्राम व्यवस्था, पारिवारिक संरचना, सामाजिक उत्तरदायित्व और प्रकृति के साथ संतुलन जैसे तत्वों को भी महत्व देना होगा।
उनके आर्थिक चिंतन में स्वदेशी का विशेष स्थान था। स्वदेशी का अर्थ केवल देश में निर्मित वस्तुओं का उपयोग करना नहीं, बल्कि आर्थिक नीतियों और विकास के मॉडल को भारतीय समाज की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना भी था।
वे ऐसी व्यवस्था के पक्षधर थे, जिसमें आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय, रोजगार, स्थानीय उत्पादन और मानवीय गरिमा की रक्षा हो।
उनका चिंतन इस प्रश्न को सामने रखता है कि क्या आर्थिक प्रगति का मूल्यांकन केवल सकल घरेलू उत्पाद और बाजार के विस्तार से किया जाना चाहिए, अथवा इस बात से भी कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा है?
आज आत्मनिर्भरता, स्थानीय उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार की चर्चा के बीच दत्तोपंत ठेंगड़ी के स्वदेशी चिंतन का अध्ययन उपयोगी हो सकता है।
विचारों की शक्ति और संगठन निर्माण की साधना
दत्तोपंत ठेंगड़ी की एक बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल विचार प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि विचारों को संगठित सामाजिक शक्ति में बदलने की क्षमता रखते थे।
संगठन निर्माण के लिए धैर्य, निरंतरता, संवाद और कार्यकर्ताओं के साथ आत्मीय संबंध आवश्यक होते हैं। कोई भी संगठन केवल नारों से मजबूत नहीं बनता। उसकी शक्ति उन कार्यकर्ताओं में होती है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं।
ठेंगड़ी जी ने विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि प्रत्येक सामाजिक क्षेत्र की अपनी आवश्यकताएं होती हैं। श्रमिकों के बीच कार्य करने की पद्धति किसान समाज से अलग हो सकती है और आर्थिक चिंतन के प्रश्न राजनीतिक गतिविधियों से भिन्न हो सकते हैं। इसलिए मूल विचार के प्रति निष्ठा रखते हुए कार्यपद्धति में परिस्थिति के अनुरूप लचीलापन आवश्यक है।
उनका जीवन संगठनकर्ताओं को सिखाता है कि लोगों को अपने साथ जोड़ने के लिए केवल भाषण देना पर्याप्त नहीं है। उनकी समस्याओं को समझना, उनके बीच समय बिताना, उनके विश्वास को अर्जित करना और अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना भी उतना ही आवश्यक है।
यही कारण है कि दत्तोपंत ठेंगड़ी को केवल श्रमिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक विचारक, लेखक और संगठन निर्माता के रूप में भी याद किया जाता है।
भारतीय आर्थिक चिंतन और पश्चिमी विचारधाराओं से संवाद
दत्तोपंत ठेंगड़ी का चिंतन भारतीय परंपरा पर आधारित था, लेकिन वे समकालीन आर्थिक और राजनीतिक विचारधाराओं के प्रश्नों से भी संवाद करते थे।
उन्होंने पूंजीवाद और साम्यवाद की सीमाओं पर प्रश्न उठाते हुए भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल आर्थिक दृष्टि विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार किसी भी विचारधारा को बिना विवेक के अपनाने के बजाय उसकी उपयोगिता, सामाजिक परिणामों और भारतीय जीवन-मूल्यों के साथ उसके संबंध का परीक्षण किया जाना चाहिए।
इस संदर्भ में उनका प्रसिद्ध ग्रंथ थर्ड वे विशेष उल्लेखनीय है। इसके माध्यम से उन्होंने पूंजीवाद और साम्यवाद के अतिरिक्त भारतीय चिंतन पर आधारित एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का प्रयास किया।
उनके विचारों से सहमत होने या असहमत होने की स्वतंत्रता प्रत्येक पाठक को है, लेकिन उनके चिंतन का अध्ययन भारतीय आर्थिक विमर्श को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
उनकी दृष्टि में अर्थव्यवस्था मनुष्य के लिए होनी चाहिए, मनुष्य केवल अर्थव्यवस्था का साधन बनकर न रह जाए। विकास की प्रक्रिया में सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक मूल्यों और मानवीय गरिमा की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।
यह दृष्टिकोण आज भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है-क्या आधुनिकता का अर्थ अपनी परंपराओं से दूरी बनाना है, अथवा अपनी सांस्कृतिक चेतना को बनाए रखते हुए विज्ञान, तकनीक और आर्थिक प्रगति के साथ आगे बढ़ना?
नई पीढ़ी के स्वयंसेवकों के लिए दत्तोपंत जी का संदेश
दत्तोपंत ठेंगड़ी का जीवन आज की युवा पीढ़ी और स्वयंसेवकों के लिए अनेक प्रेरणाएं प्रस्तुत करता है। उनके जीवन से निकाले जा सकने वाले कुछ महत्वपूर्ण संदेश विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
पहला संदेश : राष्ट्रकार्य को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर रखें।
व्यक्ति का जीवन केवल अपनी सफलता, सुविधा और प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा, रोजगार, परिवार और व्यक्तिगत विकास के साथ समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी आवश्यक है। राष्ट्रकार्य का अर्थ अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए समाज के लिए उपयोगी बनना है।
दूसरा संदेश : विचार को अध्ययन और तर्क से मजबूत बनाएं।
केवल किसी विचारधारा से जुड़ जाना पर्याप्त नहीं है। उसके इतिहास, सिद्धांतों, उपलब्धियों और सीमाओं को समझना भी आवश्यक है। दत्तोपंत जी के जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि कार्यकर्ता को अध्ययनशील होना चाहिए। उसे भारतीय इतिहास, संविधान, अर्थव्यवस्था, श्रमिक समस्याओं और समकालीन समाज की समझ विकसित करनी चाहिए।
तीसरा संदेश : संगठन में पद से अधिक कार्य का महत्व समझें।
किसी संगठन में पद प्राप्त करना अपने आप में उपलब्धि नहीं है। वास्तविक उपलब्धि उस पद के माध्यम से समाज के लिए कितना सार्थक कार्य किया गया, इससे निर्धारित होती है। संगठन की मजबूती के लिए व्यक्तिगत अहंकार के स्थान पर सामूहिकता और उत्तरदायित्व को महत्व देना आवश्यक है।
चौथा संदेश : समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचें।
राष्ट्रसेवा का मूल्यांकन केवल बड़े आयोजनों या सार्वजनिक भाषणों से नहीं किया जा सकता। श्रमिक, किसान, गरीब, वंचित और जरूरतमंद लोगों की समस्याओं को समझना तथा उनके समाधान के लिए काम करना भी राष्ट्रसेवा है।
पांचवां संदेश : स्वदेशी का अर्थ आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता है।
नई पीढ़ी को विज्ञान, तकनीक, शोध और नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए। आधुनिक ज्ञान अर्जित करते हुए अपनी सामाजिक आवश्यकताओं और सांस्कृतिक विरासत को समझना भी जरूरी है। स्वदेशी का सकारात्मक अर्थ अपनी क्षमताओं का विकास करना और भारत को ज्ञान, उत्पादन तथा नवाचार के क्षेत्र में सक्षम बनाना है।
छठा संदेश : मतभेद के बीच संवाद की संस्कृति विकसित करें।
सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर अलग-अलग विचार होना स्वाभाविक है। किसी विचार के प्रति प्रतिबद्धता का अर्थ दूसरे विचारों को समझने से इनकार करना नहीं होना चाहिए। तर्क, संवाद, अध्ययन और संवैधानिक मर्यादाओं के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन का प्रयास करना चाहिए।
समर्पण की कसौटी : कितना पाया नहीं, कितना दिया?
आज का समय उपलब्धियों के प्रदर्शन, व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और त्वरित सफलता का समय माना जाता है। सामाजिक जीवन में भी कई बार पद, सम्मान और लोकप्रियता को ही सफलता का पैमाना बना लिया जाता है।
दत्तोपंत ठेंगड़ी का जीवन इस सोच पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा देता है।
जीवन की वास्तविक सार्थकता केवल इस बात में नहीं है कि व्यक्ति ने अपने लिए क्या अर्जित किया, बल्कि इस बात में भी है कि उसने समाज को क्या दिया। उसने कितने लोगों को प्रेरित किया, कितनी समस्याओं के समाधान में योगदान दिया और अपने बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी संस्थाएं तथा विचार छोड़े।
एक प्रचारक का जीवन व्यक्तिगत सुविधा के स्थान पर सामाजिक उत्तरदायित्व को चुनने का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति को एक ही प्रकार का जीवन जीना चाहिए, बल्कि यह कि अपने-अपने क्षेत्र में रहते हुए भी समाज और राष्ट्र के प्रति दायित्व निभाया जा सकता है।
शिक्षक अपने विद्यार्थियों को योग्य नागरिक बनाकर, पत्रकार सत्यनिष्ठ पत्रकारिता के माध्यम से, वैज्ञानिक नवाचार के द्वारा, श्रमिक ईमानदार श्रम से और युवा अपनी प्रतिभा का समाजोपयोगी उपयोग करके राष्ट्रनिर्माण में योगदान दे सकते हैं।
यही राष्ट्रकार्य का व्यापक अर्थ है।
पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धांजलि
दत्तोपंत ठेंगड़ी 14 अक्टूबर 2004 को इस संसार से विदा हुए, लेकिन उनके द्वारा निर्मित संगठन, प्रकाशित विचार और स्थापित कार्यपद्धतियां आज भी उनके जीवन की स्मृति को जीवित रखती हैं।
उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि केवल पुष्पांजलि अर्पित करने या उनके व्यक्तित्व का गुणगान करने से पूरी नहीं होगी। उनके विचारों का अध्ययन, उनके कार्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन और समाज के सामने उपस्थित नई चुनौतियों के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता को समझना भी आवश्यक है।
नई पीढ़ी के स्वयंसेवकों के लिए उनका जीवन एक महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ता है-क्या हम अपने विचारों को केवल भाषणों तक सीमित रखेंगे, या उन्हें अपने आचरण और सामाजिक कार्यों में भी उतारेंगे?
यदि हम श्रम का सम्मान करें, किसान की समस्याओं को समझें, स्वदेशी उत्पादन और नवाचार को प्रोत्साहित करें, संगठन में अनुशासन बनाए रखें तथा राष्ट्रहित के साथ सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा को महत्व दें, तो यह उनके जीवन से प्राप्त प्रेरणा का सार्थक उपयोग होगा।
दत्तोपंत ठेंगड़ी का जीवन हमें बताता है कि व्यक्ति का जीवन सीमित हो सकता है, लेकिन उसके विचार और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं।
उनकी पुण्यतिथि पर यही संकल्प हो कि राष्ट्र के प्रति समर्पण हमारे शब्दों में ही नहीं, हमारे कर्मों में भी दिखाई दे। विचार में स्पष्टता, आचरण में शुचिता, संगठन में निष्ठा और समाज के प्रति संवेदनशीलता—यही दत्तोपंत ठेंगड़ी के जीवन से मिलने वाली स्थायी प्रेरणा है।
दत्तोपंत ठेंगड़ी जी को विनम्र श्रद्धांजलि!