वनवासी कल्याण आश्रम के स्थापना दिवस पर वनयोगी बालासाहब देशपांडे के जीवन और दृष्टि का स्मरण

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    06-Jan-2026
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भोपाल। वनवासी कल्याण आश्रम के स्थापना दिवस के अवसर पर एकलव्य संकुल, भोपाल में आयोजित गोष्ठी में संगठन के संस्थापक वनयोगी बालासाहब देशपांडे के प्रेरक जीवन, राष्ट्रीय दूरदृष्टि और जनजाति समाज के सर्वांगीण उत्थान में उनके योगदान को भावपूर्ण ढंग से याद किया गया।
गोष्ठी को संबोधित करते हुए कल्याण आश्रम के प्रांत महामंत्री श्री योगीराज परते ने कहा कि आज जब देश के अनेक जनजाति बहुल क्षेत्रों में माओवाद अपने अंत की ओर बढ़ रहा है और स्वयं जनजाति समाज मतांतरण के विरुद्ध जागरूक होकर खड़ा हो रहा है, तब वनवासी कल्याण आश्रम के महत्व को समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति वनयोगी बालासाहब देशपांडे की उस राष्ट्रीय दृष्टि, लक्ष्य के प्रति दृढ़ता और समाज को खड़ा करने की उनकी क्षमता का परिणाम है, जिसे उन्होंने दशकों पहले देखा और जिस दिशा में निरंतर कार्य किया।
कार्यक्रम में स्मारिका ‘अरण्यांजलि–2025’ का विमोचन किया गया। कार्यक्रम की भूमिका कल्याण आश्रम के कोषाध्यक्ष श्री राकेश शर्मा ने रखी, जबकि अध्यक्षीय उद्बोधन श्री संजय सक्सेना ने दिया।
मुख्य वक्ता श्री योगीराज परते ने बालासाहब देशपांडे के कार्यों का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी देश के कई वनवासी क्षेत्र राष्ट्रीय चेतना से कटे हुए थे। मिशनरी गतिविधियां प्रभावी थीं और राष्ट्रीय विचारधारा का कोई संगठित नेतृत्व वहां नहीं था। जशपुर जैसे सघन वन क्षेत्र में 1948 में गुरुजी से प्रेरणा लेकर एक अधिवक्ता के रूप में बालासाहब देशपांडे पहुंचे। उन्होंने शीघ्र ही समझ लिया कि परिवर्तन का मार्ग समाज के भीतर से ही निकलेगा।
उन्होंने बताया कि 26 दिसंबर 1952 को जशपुर महाराज विजय भूषण सिंह जूदेव से प्राप्त भवन में एक विद्यालय और छात्रावास की शुरुआत की गई और इसी दिन वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना हुई। अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में गांव-गांव संपर्क कर छात्रों को छात्रावास से जोड़ते हुए बालासाहब ने संगठन की नींव मजबूत की। मात्र एक वर्ष के भीतर 108 विद्यालयों सहित अनेक सेवा प्रकल्प अस्तित्व में आ चुके थे। धीरे-धीरे यह विश्वास सुदृढ़ हुआ कि यह संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक कला, संस्कृति और स्वावलंबन के माध्यम से जनजाति समाज के समग्र विकास के लिए प्रतिबद्ध है।
आज देशभर में कल्याण आश्रम द्वारा विद्यालय, छात्रावास, कोचिंग सेंटर, चिकित्सालय, कौशल विकास संस्थान संचालित किए जा रहे हैं। कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए भी अनेक केंद्र स्थापित किए गए, जिसके परिणामस्वरूप सैकड़ों जनजाति युवक-युवतियां पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में समाज के बीच सक्रिय हैं।
श्री परते ने कहा कि अंग्रेजों द्वारा जनजाति वीरों को हीन दृष्टि से प्रस्तुत किए जाने का प्रभाव लंबे समय तक समाज पर रहा, लेकिन आज भगवान बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, टंट्या भील और रानी दुर्गावती जैसे नायकों को पूरे देश में आदर्श के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। इसके मूल में कल्याण आश्रम के निरंतर प्रयास हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शासन स्तर पर जनजाति गौरव दिवस मनाने की शुरुआत स्वागतयोग्य है, लेकिन यह परंपरा कल्याण आश्रम के कार्यक्रमों का हिस्सा बहुत पहले से रही है।
गोष्ठी में बताया गया कि जनजाति समाज द्वारा निर्मित उत्पादों को बाजार से जोड़ने के लिए स्व-सहायता समूहों का गठन किया गया है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में ‘स्वास्थ-रक्षक’ के माध्यम से प्राथमिक उपचार और जागरूकता, वन अधिकारों के लिए ‘हित-रक्षक’ की संरचना, पूजा स्थलों की देखरेख और लोक कला केंद्रों के जरिए सांस्कृतिक संरक्षण जैसे कार्य निरंतर किए जा रहे हैं।
अपने उद्बोधन के समापन में श्री योगीराज परते ने कहा कि जनजाति समाज को केवल प्रकृति-पूजक कहना सीमित दृष्टि है, क्योंकि सम्पूर्ण सनातन संस्कृति ही प्रकृति से एकात्म होकर प्रकृति-उपासक है। कल्याण आश्रम के सतत कार्यों का ही परिणाम है कि आज जनजाति बंधु स्वयं को सनातन परंपरा का अभिन्न अंग मानने और बताने में गर्व अनुभव करते हैं।
कार्यक्रम के अंत में वनवासी कल्याण परिषद के प्रांत युवा प्रमुख श्री उदयभान सिंह ने सभी अतिथियों और उपस्थितजनों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन श्री विनोद राठोर ने किया।