
भोपाल। बीएचईएल दशहरा मैदान शनिवार को भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के रंग में सराबोर नजर आया। मातृभाषा मंच की ओर से आयोजित तीन दिवसीय मातृभाषा समारोह का शुभारंभ हुआ। विविध भाषाओं और संस्कृतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला यह आयोजन भाषाई समरसता और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत उदाहरण बना। समारोह के शुभारंभ अवसर पर सागर ग्रुप के चेयरमैन सुधीर अग्रवाल, भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर तथा मध्यभारत प्रांत कार्यवाह हेमंत सेठिया मंचासीन रहे। कार्यक्रम की रूपरेखा मातृभाषा मंच के संयोजक अमिताभ सक्सेना ने प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 से सक्रिय यह मंच अनेक भाषाओं की विविधता के बावजूद “हम साथ हैं” की भावना के साथ समाज को जोड़ने का सतत प्रयास कर रहा है। समारोह के प्रातः सत्र की शुरुआत देशभक्ति के भावों से ओतप्रोत वातावरण में हुई। मंच पर उपस्थित कलाकारों ने देशभक्ति गीतों की सुमधुर प्रस्तुतियों से श्रोताओं के मन में राष्ट्रप्रेम की अलख जगा दी। स्वर, ताल और भावों के सुंदर संगम ने पूरे परिसर को भावनात्मक ऊर्जा से भर दिया। इसके उपरांत वंदे मातरम् पर केंद्रित नृत्य प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। नृत्य की हर मुद्रा में मातृभूमि के प्रति समर्पण और गौरव झलक रहा था, जिसे दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से सराहा। समारोह में अयोध्या के श्रीराम मंदिर पर केंद्रित भव्य झांकी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। झांकी के दर्शन कर श्रद्धालु भावविभोर नजर आए और कई लोगों ने इसे भारतीय आस्था, संस्कृति और गौरव का जीवंत प्रतीक बताया।
भारतीयता के स्व-बोध का परिणाम है
इस अवसर पर हेमंत सेठिया ने मातृभाषा और भारतीय संस्कृति के महत्व पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि देश में अभिवादन की भाषाएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उसकी पद्धति एक ही है। उन्होंने कहा कि विश्व में वर्तमान में केवल तीन प्राचीन सभ्यताएं जीवित हैं चीन, इजराइल और भारत, जिनमें भारतीय संस्कृति कालजयी है। अनेक आक्रमणों के बावजूद भारतीय संस्कृति का अडिग रहना भारतीयता के स्व-बोध का परिणाम है। उन्होंने लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर में हमारी भाषाओं को कमजोर बताने का प्रयास किया गया, जबकि हमारी मातृभाषाएं हमारी पहचान और आत्मबल हैं। उन्होंने अखंड भारत की अवधारणा, शक्तिपीठों और सांस्कृतिक एकता पर विचार करने का आह्वान किया तथा कहा कि मातृभाषा का ज्ञान स्वयं तक सीमित न रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे, तभी भाषा समृद्ध होगी। हेमंत सेठिया जी ने स्पष्ट किया कि मातृभाषा को प्राथमिकता देने का अर्थ यह नहीं कि अंग्रेजी का विरोध किया जाए। हमें अंग्रेजी अवश्य सीखनी चाहिए, बल्कि बेहतर ढंग से, किंतु अपनी मातृभाषा के सम्मान और प्रयोग के साथ। उन्होंने कहा कि देश की अनेक भाषाएं हमें विभाजित नहीं करतीं, बल्कि एक-दूसरे से जोड़ती हैं। कार्यक्रम में उपस्थित सुधीर अग्रवाल ने भी मातृभाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे सांस्कृतिक विरासत की आत्मा बताया।
नृत्य प्रस्तुतियों से दिया एकता का संदेश
कार्यक्रम में उड़िया समाज द्वारा प्रस्तुत मनमोहक उड़िया नृत्य ने दर्शकों का मन मोह लिया। इसके साथ ही नेपाली, बांग्ला, छत्तीसगढ़ी, पंजाबी, तमिल, मराठी और भोजपुरी सहित विभिन्न भाषाओं के कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया। समारोह में फूड और हस्तशिल्प से जुड़े स्टॉल विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। विभिन्न समाजों द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक व्यंजनों और हस्तशिल्प उत्पादों ने आयोजन को लोकसंस्कृति का उत्सव बना दिया।
भारतीय ऋषि परंपरा की अतुलनीय परंपरा, 100 वर्ष की संघ यात्रा, चारों धाम के साक्षात और मनमोहक दृश्य, बारह ज्योतिर्लिंग को देख जन समूह भाव विभोर हो गया ।