संगठित हिन्दू, समर्थ भारत: सकल हिन्दू सम्मेलनों का सामाजिक संदेश

17 Jan 2026 13:04:24

hindu sammelan 
 
 
-रमेश शर्मा
 
भारत राष्ट्र के रूपान्तरण के लिए चल रहे षड्यंत्र से सनातन समाज को जागरूक करने के अपने संकल्प के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से देशभर में सकल हिन्दू सम्मेलन का अभियान आरंभ हुआ, जो जनवरी माह के अंत तक चलेगा। इन सम्मेलनों के बाद समाज में संगठनात्मक समरसता और दायित्वबोध की झलक भी देखने को मिलने लगी है।
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक यात्रा के सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं। संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। वह 27 सितंबर विजयदशमी का दिन था। संघ की पहली शाखा में केवल छह स्वयंसेवक थे। आज यह विश्व का सबसे विशाल सामाजिक संगठन है, जिसकी केवल भारत में ही 83,129 दैनिक शाखाएँ संचालित हो रही हैं। तकनीकी रूप से भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को संगठन कहा जाए, लेकिन यह करोड़ों कार्यकर्ताओं का मानो एक परिवार है। संघ की स्थापना से लेकर आज तक इस शताब्दी यात्रा में उस पर सतत हमले हुए। सरकारों ने प्रतिबंध लगाए, संघ कार्यकर्ताओं और प्रचारकों पर हमले हुए, हत्याएँ हुईं। शाब्दिक हमले तो कभी बंद ही नहीं हुए। यदि अंग्रेजी काल की बात छोड़ दी जाए, तो स्वतंत्रता के बाद भी तीन बार प्रतिबंध लगाए गए। गांधी जी की हत्या में झूठा फँसाया गया। लेकिन संघ की ध्येयनिष्ठ यात्रा में कोई अंतर नहीं आया। वह हर संकट के बाद मानो और अधिक संकल्पनिष्ठ होकर सामने आया। इतने हमलों के बाद भी संघ ने कभी किसी की आलोचना नहीं की, किसी के प्रति कटुता नहीं दिखाई। भारत राष्ट्र के परम वैभव के प्रति संघ की ध्येयनिष्ठा अखंड रही। राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति यही संकल्पशीलता संघ के शताब्दी वर्ष आयोजनों में दिखाई दी।
 
संघ ने अपने शताब्दी समागम को किसी उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि अपने ध्येय को गति देने का निमित्त बनाया। शताब्दी यात्रा पूर्ण करने के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तीन अभियान चलाए। पहला, गणवेशधारी स्वयंसेवकों का पथ संचलन। दूसरा, हर घर संपर्क अभियान। और तीसरा, “जात-पात की करो विदाई, हम सब हिन्दू भाई-भाई” उद्घोष के साथ सकल हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन। स्वयंसेवकों द्वारा गणवेश में बस्ती स्तर पर 2 अक्टूबर से 12 अक्टूबर 2025 के बीच विशाल पथ संचलनों का आयोजन किया गया। देशभर की प्रत्येक बस्ती में आयोजित इन पथ संचलनों में सरसंघचालक से लेकर संघ का प्रत्येक सामान्य कार्यकर्ता भी गणवेश में सम्मिलित हुआ।
 
दूसरे कार्यक्रम के रूप में संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी बस्तियों और मोहल्लों में 15 नवंबर से 30 नवंबर 2025 के बीच प्रत्येक घर पर दस्तक दी। इस गृह संपर्क अभियान में “संगठित हिन्दू, समर्थ भारत” का संदेश दिया गया। इसी श्रृंखला की तीसरी कड़ी के रूप में पूरे देश में हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन आरंभ हुआ। भारत के एक छोटे ग्राम से लेकर महानगरों तक की प्रत्येक बस्ती में ऐसे एक लाख से अधिक हिन्दू सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनी। इनकी शुरुआत 20 दिसंबर 2025 से हुई और इन्हें 20 जनवरी 2026 तक पूरा किया जाना है। हालांकि कहीं-कहीं यह तिथि आगे भी बढ़ाई गई है और संभावना है कि 25 जनवरी तक लक्ष्य पूरा हो जाएगा।
 
हिन्दू सम्मेलन आयोजित करने की भावना भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है, लेकिन इनके आयोजक स्वयं संघ नहीं हैं। इनका आयोजन स्थानीय स्तर पर सकल हिन्दू समाज द्वारा किया जा रहा है। अब तक देशभर से आ रहे समाचारों के अनुसार प्रत्येक आयोजन में हिन्दू समाज की उत्साहपूर्वक सहभागिता देखने को मिली है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और सेवा बस्तियों में अपेक्षाकृत अधिक उत्साह देखा गया। जितना उत्साह सम्मेलनों में सम्मिलित होने का था, उससे अधिक उत्साह सम्मेलन के बाद सामाजिक समरसता के वातावरण में दिखाई दिया।
 
सम्मेलनों में आए वक्ताओं का संदेश अत्यंत स्पष्ट और सामयिक था। प्रत्येक हिन्दू सम्मेलन में स्थानीय वक्ताओं के अतिरिक्त तीन प्रकार के मुख्य वक्ता रहे। इनमें एक संत समाज से, दूसरे सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों से संबंधित मातृशक्ति और तीसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े वक्ता रहे। संत समाज की ओर से शास्त्रों और पुराण कथाओं के आधार पर संपूर्ण समाज को अपनी परंपराओं से जुड़ने और एकजुट रहने का आह्वान किया गया। यह स्पष्ट किया गया कि सभी सनातनी एक ही ऋषि परंपरा की संतान हैं और जाति-भेद सल्तनत काल तथा अंग्रेजी काल में फैलाया गया। अब हमें इस कुचक्र से सावधान रहना होगा। संतों ने यह भी आह्वान किया कि सप्ताह में कम से कम एक दिन परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठें, घर का बना भोजन साथ खाएँ और अपने इष्ट की पूजा-प्रार्थना करें। इससे न केवल पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते मजबूत होंगे, बल्कि यह परिवार की प्रगति और अपनी परंपराओं को समझने का आधार भी बनेगा।
 
सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों से संबंधित मातृशक्ति वक्ताओं ने कुटुम्ब समन्वय, स्वत्वबोध और स्वदेशी के महत्व, जीवन के लिए पर्यावरण की महत्ता, नागरिक कर्तव्यों के पालन और संगठित समाज की आवश्यकता को रेखांकित किया। स्वाभाविक है कि जब समाज में अधिकार के साथ कर्तव्य पालन का भाव आएगा, पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और स्व-संस्कृति के अनुरूप जीवन शैली विकसित होगी, तो समाज और राष्ट्र की अनेक समस्याओं का समाधान स्वमेव हो जाएगा।
 
वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित वक्ताओं ने संघ की ध्येयनिष्ठ शताब्दी यात्रा की जानकारी दी और देश एवं समाज के सामने बढ़ती चुनौतियों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया। इन वक्ताओं ने इतिहास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटित घटनाओं के उदाहरण देकर समझाया कि वही समाज इतिहास में अमिट रहता है, जो सजग और संगठित रहता है। लगभग सभी वक्ताओं ने समस्त हिन्दू समाज में आपसी समझ बढ़ाने, एक-दूसरे के सहयोगी बनने तथा देश के इतिहास और पूर्वजों की परंपराओं को जानने पर बल दिया।
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहल पर ये हिन्दू सम्मेलन ऐसे समय आयोजित किए जा रहे हैं, जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ शक्तियाँ सनातन हिन्दू समाज को विभाजित करने का कुचक्र रच रही हैं। ये शक्तियाँ भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक स्वरूप का रूपान्तरण करने के उद्देश्य से एकजुट होकर कार्य कर रही हैं। उनका प्रयास सनातन हिन्दू समाज को भ्रमित करना, उसे उसकी जड़ों से काटना और जातीय विभेद उत्पन्न करना है, ताकि भारत राष्ट्र की प्रगति को अवरुद्ध किया जा सके और सनातन हिन्दू समाज का धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूपान्तरण कराया जा सके। इसके लिए प्रतिदिन नए-नए षड्यंत्र किए जा रहे हैं। जन्म और जाति आधारित विभेद उत्पन्न कर आंतरिक अशांति फैलाने का प्रयास किया जा रहा है।
 
जबकि वास्तविकता यह है कि भारत की सामाजिक व्यवस्था जन्म या जाति आधारित नहीं थी। भारत की सामाजिक व्यवस्था गुण और कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था रही है। इसे समझने के लिए हर कालखंड में पर्याप्त उदाहरण मिलते हैं। यदि पुराण काल में देखें तो कुबेर और रावण एक ही पिता की संतान हैं, लेकिन समाज में दोनों का स्थान अलग-अलग है। कुबेर की गणना देवताओं में होती है और दीपावली पर उनका पूजन किया जाता है, जबकि रावण की गणना राक्षसों में होती है और दशहरे के दिन उसका पुतला दहन किया जाता है। वहीं मातंग ऋषि ने अपने आश्रम की उत्तराधिकारी माता शबरी को बनाया, जिनका संबंध शबर वनवासी समाज से था। महर्षि व्यास की माता मछली पालक समाज से थीं और महर्षि वाल्मीकि का जन्म व्याध समाज में हुआ था।
 
पुराण काल से आगे बढ़कर इतिहास देखें तो मगध के दोनों नंद वंश और मौर्य वंश सेवा वर्ग से संबंधित थे, जिन्हें आज की शब्दावली में अनुसूचित जाति कहा जाता है। यदि भारत में समाज व्यवस्था जन्म या जाति आधारित होती, तो ये शासक कैसे बनते। मध्यकाल में देखें तो रानी दुर्गावती कालिंजर के चंदेल राजपूत राजा की पुत्री थीं और उनका विवाह गोंडवाना में हुआ था। संत रविदास जी का जन्म चर्मशिल्पकार समाज में हुआ था। वे रामानंदाचार्य के शिष्य थे और मीराबाई तथा झाला रानी ने संत रविदास जी को अपना गुरु माना था। यदि भारतीय समाज जीवन में जाति का निर्धारण जन्म आधारित होता, तो न मीराबाई संत रविदास जी को अपना गुरु बनातीं और न ही रानी दुर्गावती का विवाह गोंडवाना में होता।
 
भारतीय इतिहास में केवल यही उदाहरण नहीं हैं, ऐसे असंख्य प्रसंग उपलब्ध हैं। इसके बावजूद योजनाबद्ध ढंग से सनातन हिन्दू समाज को बाँटने का प्रयास किया जा रहा है। इस विभाजन की रेखा को गहरा करने के लिए रोज नए-नए बहाने खोजे जा रहे हैं। कभी जनगणना के नाम पर, तो कभी किसी अन्य मुद्दे के बहाने। यहाँ तक कि व्यक्तिगत अपराध की घटनाओं में भी पीड़ित और आरोपी दोनों को जाति से जोड़कर प्रचारित किया जाता है, जबकि अन्य किसी समाज या वर्ग में जाति आधारित विभाजन की चर्चा नहीं होती। केवल हिन्दू समाज में ही जातीय विभाजन की बात को जोर-शोर से उछाला जाता है।
 
सनातन हिन्दू समाज को जागरूक होकर इस षड्यंत्र को समझना होगा। सकल हिन्दू समाज द्वारा आयोजित इन सम्मेलनों में यही जागरूकता का संदेश दिया गया। यह स्पष्ट रूप से समझाया गया कि समाज और देश दोनों की प्रगति के लिए सभी का एकजुट होना आवश्यक है।
 
समाज को एकजुटता के इस संदेश के साथ इन सम्मेलनों से भारतीय समाज जीवन में यह बात स्पष्ट रूप से गई कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके जन्म, जाति, भाषा, स्थान, संपत्ति या सामाजिक स्थिति के आधार पर नहीं किया जाता। उसका महत्व उसकी कर्मशीलता पर निर्भर करता है। राष्ट्र के उत्थान के लिए सामाजिक समरसता की भावना ही सबसे बड़ी शक्ति है। सम्मेलनों के बाद विभिन्न बस्तियों में स्थानीय स्तर पर आपसी विवादों को परस्पर बातचीत से समाप्त करने के समाचार भी आने लगे हैं, जिससे भारत के भविष्य निर्माण के लिए एक सकारात्मक वातावरण बनता दिखाई दे रहा है।
Powered By Sangraha 9.0