डॉ. भूपेन्द्र कुमार सुल्लेरे
हर वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाने वाला विश्व हिंदी दिवस केवल एक औपचारिक या प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि यह हिंदी भाषा की वैश्विक यात्रा, उसकी बढ़ती प्रतिष्ठा, उसके समक्ष उपस्थित चुनौतियों और हमारे अपने राष्ट्रीय आचरण की विडंबनाओं पर गहन चिंतन का अवसर है। यह दिन उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति कराता है, जब पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी बोली गई थी और भारत की सांस्कृतिक आत्मा ने विश्व मंच पर अपनी मौलिक पहचान दर्ज कराई थी।
आज स्थिति यह है कि हिंदी विश्व में सम्मान, स्वीकार्यता और लोकप्रियता की नई ऊँचाइयों को छू रही है, किंतु अपने ही देश में वह उपेक्षा, संकोच और हीन भावना के बीच झूलती दिखाई देती है। यही विरोधाभास विश्व हिंदी दिवस को और अधिक प्रासंगिक बना देता है।
विश्व हिंदी दिवस का उद्देश्य और वैश्विक परिप्रेक्ष्य
विश्व हिंदी दिवस मनाने का उद्देश्य दुनियाभर में फैले हिंदी प्रेमियों, हिंदी जानकारों और हिंदी भाषियों को एकजुट करना, हिंदी को विश्व स्तर पर स्थापित एवं प्रोत्साहित करना तथा इसके महत्व और आवश्यकता से वैश्विक समाज को अवगत कराना है। अंग्रेज़ी भले ही अनेक देशों में बोली और लिखी जाती हो, परंतु हिंदी हृदय की भाषा है। यह संवेदना, संस्कृति और संवाद की भाषा है।
विश्व हिंदी दिवस, विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता उत्पन्न करने तथा हिंदी को एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का एक प्रभावी उपक्रम है।
हिंदी : संवाद नहीं, सभ्यता की वाहक
हिंदी मात्र संवाद की भाषा नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति, संवेदना और सामूहिक चेतना की वाहक है। यह लोक से उपजी, लोक में पली और लोक के लिए ही जीने वाली भाषा है। हिंदी का सबसे बड़ा गुण उसकी सहजता, सरलता और वैज्ञानिक संरचना है। यह एक ध्वन्यात्मक भाषा है, जिसमें जैसा लिखा जाता है वैसा ही बोला जाता है, जिससे इसे सीखना और अपनाना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।
यही कारण है कि जिन देशों में भारतीय प्रवासी बसे, वहाँ हिंदी ने सहज ही अपनी जड़ें जमा लीं।
प्रवासी समाज और हिंदी की वैश्विक स्वीकृति
आज एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका तक हिंदी केवल भारतीयों की भाषा नहीं रह गई है, बल्कि वह सांस्कृतिक संवाद की भाषा बनती जा रही है। योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, बॉलीवुड, भक्ति साहित्य और डिजिटल माध्यमों ने हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हिंदी आज विश्व की तीसरी या चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा मानी जाती है। भारत के साथ-साथ नेपाल, मॉरीशस और फिजी जैसे देशों में भी इसका व्यापक उपयोग है। विश्व में लगभग साठ से सत्तर करोड़ लोग हिंदी बोलते, समझते या किसी न किसी रूप में उससे जुड़े हुए हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच और विश्व हिंदी सम्मेलन
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है। विश्व हिंदी सम्मेलन, जिसकी शुरुआत 1975 में नागपुर से हुई थी, आज एक वैश्विक वैचारिक आंदोलन का स्वरूप ले चुका है। इन सम्मेलनों ने यह सिद्ध किया है कि हिंदी केवल साहित्य या भावनाओं की भाषा नहीं है, बल्कि विचार, विज्ञान, कूटनीति और वैश्विक संवाद की भी एक सक्षम भाषा है।
अटल बिहारी वाजपेयी : हिंदी का स्वाभिमान
हिंदी को वैश्विक मंच पर आत्मसम्मान और स्वाभिमान के साथ प्रस्तुत करने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है। 1977 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में दिया गया उनका भाषण केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि वह भारत की सांस्कृतिक चेतना की उद्घोषणा था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि हिंदी में भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति, शांति, निरस्त्रीकरण और मानवता जैसे गंभीर विषयों पर प्रभावी संवाद संभव है।
वैश्वीकरण का दौर और हिंदी की उपेक्षा
वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में हिंदी की यात्रा कुछ हद तक धीमी अवश्य हुई, विशेष रूप से शासन, उच्च प्रशासन, शिक्षा और न्यायपालिका के स्तर पर। अंग्रेज़ी को आधुनिकता और सफलता का प्रतीक मान लिया गया, जबकि हिंदी को प्रायः भावनात्मक या घरेलू दायरे तक सीमित कर दिया गया।
हालाँकि हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा ने इस दौर में भी अपनी सृजनात्मक ऊर्जा बनाए रखी, किंतु नीतिगत स्तर पर हिंदी को वह प्राथमिकता नहीं मिल पाई, जिसकी वह अधिकारी थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदी का आत्मविश्वास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में हिंदी ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ उपस्थिति दर्ज कराई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा, जी-20 सम्मेलन, शंघाई सहयोग संगठन या प्रवासी भारतीयों के कार्यक्रम - हर मंच पर उनकी हिंदी यह संदेश देती है कि अपनी भाषा में बोलना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का परिचायक है।
डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे अभियानों में हिंदी को केंद्र में रखकर शासन और नागरिक के बीच संवाद को अधिक सुलभ और प्रभावी बनाया गया है। सरकारी योजनाओं, मोबाइल ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर हिंदी की बढ़ती उपस्थिति ने यह सिद्ध किया है कि तकनीक और हिंदी परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं।
राष्ट्रीय विडंबना : घर में ही उपेक्षा
इसके बावजूद यह एक कटु सत्य है कि हिंदी आज विश्व में जितनी प्रतिष्ठित हो रही है, उतनी ही अपने ही देश में उपेक्षित होती जा रही है। अंग्रेज़ी को सामाजिक प्रतिष्ठा और बौद्धिक श्रेष्ठता का पैमाना बना दिया गया है। माता-पिता अंग्रेज़ी माध्यम में बच्चों को पढ़ाकर गर्व अनुभव करते हैं, जबकि हिंदी माध्यम को हीन दृष्टि से देखा जाता है। यह समस्या भाषा की नहीं, बल्कि मानसिकता की है।
हिंदी और आत्मबोध
विश्व हिंदी दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि आत्मबोध और आत्मगौरव का माध्यम भी होती है। जिस राष्ट्र की भाषा आत्मसम्मान से वंचित हो जाती है, उसका सांस्कृतिक स्वाभिमान भी धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है।
हिंदी को बचाने के लिए उसे थोपने की नहीं, बल्कि स्वयं अपनाने और आत्मविश्वास के साथ जीने की आवश्यकता है। जब हिंदी हमारे विचार, शिक्षा, शासन और व्यवहार में सम्मान पाएगी, तभी विश्व में उसकी प्रतिष्ठा भी स्थायी और सार्थक होगी।