राष्ट्रभक्ति बनाम नेशनलिज़्म : भारत और यूरोप का मौलिक भेद

10 Jan 2026 15:03:31

rashtrabhakti
 
दीपक कुमार द्विवेदी
 
नेशनलिज़्म की विचारधारा भारत की नहीं है! यह केवल एक वैचारिक दावा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य है। नेशनलिज़्म यूरोप की विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित हुआ, जहाँ मध्ययुगीन चर्च, राजसत्ता, औद्योगिक पूँजी और औपनिवेशिक विस्तार ने मिलकर जिस राजनीतिक ढाँचे को जन्म दिया, उसे नेशन-स्टेट कहा गया। इस ढाँचे में राज्य सर्वोच्च सत्ता बनता है, सीमाएँ निर्णायक होती हैं और समाज, धर्म तथा संस्कृति राज्य के अधीन कर दिए जाते हैं। यूरोप में जिसे “राष्ट्र” कहा गया, वह वास्तव में एक राजनीतिक-प्रशासनिक संरचना थी। कोई शाश्वत, सांस्कृतिक या आध्यात्मिक चेतना नहीं है।
 
भारत को इसी यूरोपीय संदर्भ में समझने का प्रयास मूलतः भारत के स्वरूप को न समझ पाने का परिणाम है। भारत नेशन-स्टेट नहीं है। भारत राष्ट्र है, एक ऐसा राष्ट्र जो किसी संवैधानिक दस्तावेज़, राजनीतिक संधि या सत्ता-परिवर्तन से उत्पन्न नहीं हुआ। भारत की राष्ट्रचेतना सभ्यता, संस्कृति, स्मृति और धर्म की निरंतरता से निर्मित हुई है। यहाँ राष्ट्र कोई अमूर्त प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि मातृस्वरूप है जिसकी पूजा की गई, जिसकी रक्षा को धर्म माना गया। इसी कारण भारतीय परंपरा में ‘नेशनलिज़्म’ नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भाव विकसित हुआ। राष्ट्रभक्ति अधिकारों की सूची नहीं बनाती, वह कर्तव्य, उत्तरदायित्व और सेवा का भाव पैदा करती है।
 
भारतीय दृष्टि केवल किसी सीमित भू-भाग तक सीमित नहीं रही। “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसे सूत्र भारतीय जीवन-दृष्टि के आधार हैं। किंतु इन सूत्रों को अक्सर भावुक सार्वभौमिकता के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है, जबकि शास्त्रीय परंपरा में इनका अर्थ अधिक अनुशासित और सशर्त है। वसुधैव कुटुम्बकम् का सिद्धांत उन लोगों के लिए है जो धर्म को जीवन-व्यवस्था के रूप में स्वीकार करते हैं जो धर्म के दस लक्षणों (धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध) को आचरण में उतारते हैं और सृष्टि को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि प्रकृति-माता के रूप में देखते हैं।
 
इसी संदर्भ में शास्त्रों में प्रयुक्त असुर, दानव और दैत्य जैसे शब्दों को समझना आवश्यक है। ये किसी जाति, नस्ल या समुदाय के नाम नहीं हैं। ये अधर्मप्रधान मानसिकताओं के प्रतीक हैं—ऐसी प्रवृत्तियाँ जो प्रकृति का शोषण करती हैं, समाज को खंडित करती हैं और शक्ति को केवल भोग व प्रभुत्व का साधन मानती हैं। भारतीय परंपरा में ऐसी प्रवृत्तियों का प्रतिकार हिंसा नहीं, बल्कि धर्म-रक्षा माना गया है। राम-रावण, कृष्ण-कंस और देवी-महिषासुर के आख्यान इसी संतुलन को दर्शाते हैं जहाँ करुणा और कठोरता, दोनों धर्म के अधीन हैं।
 
इस मौलिक भेद को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी पुस्तक “राष्ट्रवाद : एक परिकल्पना” में स्पष्ट रूप से रखा। उन्होंने बताया कि यूरोप में नेशन-स्टेट राज्य-केंद्रित है, जबकि भारत में दृष्टि राष्ट्र-केंद्रित रही है। भारत में राष्ट्र पहले है, राज्य बाद में। राज्य का उद्देश्य राष्ट्र पर शासन करना नहीं, बल्कि उसकी सेवा करना है। इसी कारण यूरोपीय सेक्युलर स्टेट की अवधारणा जो चर्च और राजसत्ता के ऐतिहासिक टकराव से निकली भारत में लागू होते ही वैचारिक असंतुलन पैदा करती है। यूरोप में धर्म को सार्वजनिक जीवन से बाहर करना ऐतिहासिक आवश्यकता थी लेकिन भारत में धर्म जीवन का नैतिक-सांस्कृतिक आधार रहा है।
 
यूरोपीय औपनिवेशिक इतिहास को देखें तो स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक काल में चर्च के पास जब प्रत्यक्ष शक्ति थी, तब उसने प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन स्थापित किया सैन्य आक्रमण, राजनीतिक नियंत्रण और धर्मांतरण के माध्यम से। अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के बड़े भू-भाग इसी प्रक्रिया में प्रभावित हुए। किंतु स्वतंत्रता आंदोलनों के बाद प्रत्यक्ष शासन टिकाऊ नहीं रहा। तब वही औपनिवेशिक चेतना रूप बदलकर सामने आई। अब नियंत्रण का माध्यम विचारधाराएँ बनीं।
 
नेशनलिज़्म, समाजवाद, पूँजीवाद, कम्युनिज़्म, सेक्युलरिज़्म और आधुनिक डेमोक्रेसी—ये सभी यूरोपीय नेशन-स्टेट की ऐतिहासिक उपज हैं। देखने में ये परस्पर विरोधी लगती हैं, पर इनकी संरचनात्मक समानता यह है कि इनमें राज्य और बाज़ार केंद्र में रहते हैं, और समाज को नियंत्रित इकाई में बदला जाता है। बीसवीं सदी में इसी प्रक्रिया से वैश्विक वित्तीय तंत्र, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ उभरीं—जिसे आज ग्लोबल मार्केट फोर्सेज कहा जाता है।
 
इसी आर्थिक-राजनीतिक जाल से आगे चलकर वह संरचना बनी, जिसे सामान्य भाषा में अमेरिकन डीप स्टेट कहा जाता है अर्थात् नीति-निर्माण, सुरक्षा-तंत्र, कॉरपोरेट हितों, मीडिया और वित्तीय संस्थाओं का ऐसा स्थायी नेटवर्क, जो सरकारें बदलने के बावजूद अपनी दिशा बनाए रखता है। यहाँ लोकतंत्र साधन है, लक्ष्य नहीं। कहीं लोकतंत्र के नाम पर हस्तक्षेप, कहीं मानवाधिकार के नाम पर दबाव, और कहीं आर्थिक सुधारों के नाम पर स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का विघटन—ये सभी उसी अप्रत्यक्ष औपनिवेशिक नियंत्रण के रूप हैं।
 
आज दुनिया प्रत्यक्ष रूप से गुलाम नहीं दिखती, पर वैचारिक और आर्थिक स्तर पर नियंत्रण स्पष्ट है। भू-भाग नहीं, बल्कि चेतना को नियंत्रित किया जा रहा है। समाजों को उनकी सभ्यतागत स्मृति से काटकर आयातित वैचारिक ढाँचों में ढाला जा रहा है। यही आधुनिक उपनिवेशवाद है।
 
इस भ्रम से बाहर निकलने का मार्ग किसी नई पश्चिमी विचारधारा को अपनाने में नहीं है। समाधान अपने ही मूल चिंतन-आधारित सनातन हिंदुत्व दृष्टिकोण की ओर लौटने में है—जहाँ राष्ट्र सत्ता नहीं, चेतना है; धर्म पूजा-पद्धति नहीं, जीवन-व्यवस्था है; और राज्य साधन है, साध्य नहीं। भारत को समझने की कसौटी यूरोप की राजनीतिक शब्दावली नहीं हो सकती।
 
भारत को समझने का मार्ग भारत की अपनी सभ्यतागत दृष्टि से होकर ही जाता है।
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