नारी के सम्मान का पावन पर्व : रक्षाबंधन

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    08-Aug-2025
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Rakshabandhan
 
 
 
डॉ नुपूर निखिल देशकर - 
 
 
भारतीय संस्कृति में नारी को देवी का स्वरूप माना गया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवता वास करते हैं। इसी आदर्श को जीवंत करने वाला पर्व है रक्षाबंधन, जो एक धागा बाँधने का उत्सव नहीं, बहन के सम्मान और सुरक्षा का पवित्र व्रत है।भारतीय संस्कृति में नारी केवल एक भूमिका नहीं निभाती, वह संस्कारों की जन्मभूमि, धैर्य की प्रतिमा और शक्ति की साक्षात मूर्ति है। रक्षाबंधन, जिसे सामान्यतः भाई-बहन के प्रेम का उत्सव माना जाता है, वह नारी सम्मान और रक्षा का धर्मोत्सव है।
 
महाभारत की पावन कथा इस पर्व का सर्वोच्च प्रतीक है , महाभारत काल में जब भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल के सौ अपशब्द क्षमा कर दिए और जब उसने एक सौ एकवाँ अपशब्द कहा तो श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। जब भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध किया, उनकी तर्जनी से रक्त बह निकला। उस क्षण द्रौपदी ने अपने आँचल को फाड़कर उसकी उंगली पर चीर बाँध दिया। वह आंचल से फाड़ा हुआ मात्र एक चीर ,एक वस्त्र नहीं था वह रक्षा का व्रत था, श्रद्धा की डोरी थी, स्नेह की संकल्प-रेखा थी। यह प्रेम और समर्पण का ऐसा अनमोल बंधन था, जिसे श्रीकृष्ण ने जीवन भर निभाया।
 
कौरवों की भरी सभा में दुशासन द्वारा जब द्रौपदी के चीरहरण का अमानवीय प्रयास किया गया , तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी ‘रक्षा-स्मृति’ को निभाते हुए अनंत चीर देकर द्रौपदी के वस्त्रों की मर्यादा की रक्षा की और उसकी लाज बचाई।
चीर बढ़ायो चीरनिधि, लाज बचायो लाल।
(कवि सूरदास)
महाभारत का यह प्रसंग रक्षाबंधन पर्व का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है । यह पर्व भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है और नारी के सम्मान और मर्यादा की रक्षा का व्रत भी है।
 
आज भी रक्षाबंधन पर बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधकर उससे आजीवन अपनी रक्षा और सम्मान की प्रतिज्ञा लेती है। भाई भी यह वचन देता है कि वह हर परिस्थिति में अपनी बहन की सुरक्षा करेगा। यही आदर्श हमारी भारतीय संस्कृति की विशिष्टता है, कि यहाँ नारी को मात्र एक व्यक्ति नहीं, संस्कारों की जननी, परिवार की धुरी और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
 
रक्षाबंधन हमें यह भी सिखाता है कि समाज में नारी का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। जब तक बहन-बेटी सुरक्षित और सम्मानित हैं, तब तक समाज में सच्चा धर्म , पवित्र संस्कृति जीवित रहेगी। रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी नारी के सम्मान को सर्वोच्च मानते हैं
"नारी हित बसहु सदा, राखहु नारी मान।
जे नारी को तिरषकारें, तिन्ह पर पाप निदान॥"
(तुलसीदासकृत रामचरित मानस)
 
 
रक्षाबंधन हमें यह शिक्षा देता है कि नारी रक्षा की अधिकारी नहीं, सम्मान की अधिकारिणी है। उसके सम्मान में ही समाज की मर्यादा और संस्कृति की आत्मा निहित है। उसे रक्षण की नहीं, साथ चलने की आवश्यकता है।
“नारी निंदक नर अहि, जग में होत अपाय।
नारी उर उपजे सदा, सच्चे प्रेम की छाय॥”
 
जो लोग नारियों की निंदा करते हैं, वे सांप की भांति हानिकारक होते हैं, जबकि नारियों के हृदय में सदैव सच्चे प्रेम की छाया होती है। आइए इस पावन पर्व पर हम सब यह संकल्प लें कि हम नारी के आत्मसम्मान, गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा में सदैव कटिबद्ध रहेंगे। तभी यह पवित्र धागा वास्तव में सार्थक होगा और हमारी संस्कृति के इस गौरवपूर्ण पर्व का उद्देश्य पूर्ण होगा।