पुस्तक समीक्षा - कार्यकर्ता 'व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक'

31 Jul 2025 14:20:14

book review


समीक्षक- पंकज सोनी, मीडिया शोधार्थी
वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके कार्यकर्ताओं को लेकर समाज में विभिन्न प्रकार की धारणाएं और पूर्वाग्रह गहराई तक व्याप्त हैं। कुछ असामाजिक तत्व तथा संघ के विरोधी समूह संघ और उसके कार्यकर्ताओं की छवि को विकृत रूप में प्रस्तुत करते हुए आलोचना करते हैं। यद्यपि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है और संघ भी अपने आलोचकों को सम्मान की दृष्टि से देखता है, किंतु जब आलोचना किसी विकृत या गलत चित्रण पर आधारित होती है तो वह उचित नहीं कही जा सकती। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि लोग स्वयं संघ के वास्तविक स्वरूप को जानें और समझें कि संघ क्या है, उसके कार्यकर्ता कौन हैं तथा उनका आचार-विचार और व्यवहार कैसा है। इस समझ के लिए संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी द्वारा लिखित पुस्तक “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: कार्यकर्ता – अधिष्ठान, व्यक्तित्व और व्यवहार” का अध्ययन उपयोगी हो सकता है। यदि इसके पश्चात भी कोई व्यक्ति संघ की आलोचना करना चाहता है, तो संघ उस आलोचना का भी सम्मान करता है।

इस पुस्तक में लेखक ने संघ कार्यकर्ता के आचरण, व्यवहार, कर्म और विचार कैसे हों, इस पर विस्तारपूर्वक चर्चा की है। ठेंगड़ी जी स्वयं संघ के वरिष्ठ प्रचारक होने के साथ-साथ भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठनों के संस्थापक भी रहे हैं। यह पुस्तक संघ कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रकार की ‘मार्गदर्शिका’ कही जा सकती है, जिसमें न केवल उनकी जीवनशैली और कार्यपद्धति का वर्णन है, बल्कि चरित्र निर्माण की वैचारिक कसौटी भी प्रस्तुत की गई है।

“संघे नित्यं ध्यायन् धर्मं, त्यागे तपसि संयतः।
निःस्वार्थः सेवको नित्यं, राष्ट्राय समर्पितः॥
व्यक्तिमत्त्वं शीलयुक्तं, प्रज्ञया संयमेन च।
आदर्शः समाजे भवति, कार्यकर्ता सत्पथगामी॥”

भावार्थ
संघ कार्यकर्ता धर्म और त्याग में स्थिर रहकर निःस्वार्थ सेवा करता है। वह प्रज्ञा, शील और संयम से युक्त होकर समाज में आदर्श भूमिका निभाता है और राष्ट्र के पथ पर चलता है।

पुस्तक का उद्देश्य और स्वरूप
पुस्तक का उद्देश्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं को यह समझाना है कि संघ की रीढ़ कार्यकर्ता ही होता है। वह व्यक्ति केवल प्रचारक नहीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणास्रोत और आदर्श भी हैं। पुस्तक में तीन प्रमुख आयामों – अधिष्ठान, व्यक्तिमत्व और व्यवहार के आधार पर कार्यकर्ता की संपूर्ण छवि को रेखांकित किया गया है। अधिष्ठान के अंतर्गत लेखक ने वैचारिक आधार, संघ का दृष्टिकोण और कार्य के मूल उद्देश्य की चर्चा की है। व्यक्तिमत्व खंड में कार्यकर्ता के गुण, तपस्या, त्याग, अनुशासन और आत्मसंयम की विशेषताओं को रेखांकित किया है। व्यवहार खंड में कार्यकर्ता के सामाजिक आचरण, संगठन के भीतर एवं समाज के प्रति उसकी भूमिका क्या हो और चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत किया है।

वैचारिक आधार और संघ दृष्टिकोण
पुस्तक का केंद्रीय विचार यह है कि कार्यकर्ता का जीवन केवल संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह समाज के नैतिक पुनरुत्थान का माध्यम बने। ठेंगड़ी जी लिखते हैं कि कार्यकर्ता का लक्ष्य “स्वयं को साधना, समाज को जोड़ना और राष्ट्र को खड़ा करना” होना चाहिए। यह दृष्टिकोण संघ के मूल मंत्र “संघे शक्ति कलियुगे” को मूर्त रूप प्रदान करता है। पुस्तक में इस बात पर खास बल दिया गया है कि कार्यकर्ता का जीवन त्याग और तपस्या से निर्मित होना चाहिए, क्योंकि संगठन का स्थायित्व व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि सामूहिक बलिदान पर निर्भर है।

संघ कार्यकर्ता का व्यक्तित्व निर्माण और आचरण
पुस्तक में व्यक्तित्व निर्माण को संघ की कार्यप्रणाली का आधार बताया गया है। कार्यकर्ता के लिए आत्मसंयम, समय का पालन करना, शुचिता, निःस्वार्थ सेवा और विनम्रता को अनिवार्य गुण माना गया है। श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी का कहना है कि संघ की शाखा मात्र एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की प्रयोगशाला है, जहां प्रतिदिन मनुष्य के कल्याण के लिए प्रार्थना, शरीर के लिए व्यायाम और समाज के लिए सामूहिक अनुशासन के माध्यम से कार्यकर्ता के भीतर राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा विकसित की जाती है।

पुस्तक की वर्तमान संदर्भ में उपयोगिता
यह पुस्तक बताती है कि कार्यकर्ता को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर राष्ट्र हित में कार्य करना चाहिए। वह समाज की पीड़ा को समझें, समाधान प्रस्तुत करें और उदाहरण बनकर कार्य करें। लेखक के अनुसार, सच्चा संघ का स्वयं सेवक वही है जो सफलता और विफलता दोनों परिस्थितियों में समान भाव रखे और अपने लक्ष्य से विचलित न हो। यह पुस्तक संघ कार्यकर्ता के जीवन के हर आयाम जैसे वैचारिक, व्यवहारिक और आध्यात्मिक को समग्रता से प्रस्तुत करती है। पुस्तक संघ की कार्यशैली को समझने के लिए एक प्राथमिक और प्रामाणिक दस्तावेज है। दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने इस पुस्तक के माध्यम से स्पष्ट किया है कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग व्यक्ति निर्माण से होकर जाता है। यह पुस्तक न केवल संघ कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी है, बल्कि किसी भी सामाजिक संगठन के लिए कार्यकर्ता निर्माण का आदर्श मॉडल प्रस्तुत करती है। इसमें वर्णित अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभावना आज के युवा वर्ग के लिए भी प्रासंगिक हैं, विशेषकर तब जब समाज में नैतिक मूल्यों का क्षरण हो रहा हो।

जो व्यक्ति यह जानने के इच्छुक हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वास्तविक स्वरूप क्या है, उसके कार्यकर्ताओं का आचार विचार, व्यवहार तथा जीवन दृष्टि कैसी है और राष्ट्र तथा समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता एवं कर्तव्य भावना किस प्रकार प्रकट होती है, उनके लिए यह पुस्तक विशेष रूप से अध्ययन योग्य है। यह ग्रंथ न केवल संघ कार्यकर्ताओं के वैचारिक आधार और आचरण के मापदंड को स्पष्ट करता है, बल्कि उनके व्यक्तित्व एवं समाज-राष्ट्र के प्रति समर्पण की गहन समझ भी प्रदान करता है।
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