आदि शंकराचार्य को समर्पित एकात्म की प्रतिमा का अनावरण कल, आईये जानें अपने शंकर को

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    20-Sep-2023
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आदि शंकराचार्य को समर्पित देश की सबसे बड़ी प्रतिमा "एकात्म की प्रतिमा" का लोकार्पण 21 सितम्बर 2023 को होने जा रहा है. बड़ी ही भव्यता से आयोजित होने वाला प्रतिमा अनावरण का यह कार्यक्रम मध्यप्रदेश के ओम्करेश्वेर में मान्धाता पर्वत पर संपन्न होगा. इस दौरान अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे.
 
21 सितंबर ही लोकार्पण की तारीख क्यों
 
शंकर न्यास के प्रभारी अधिकारी शैलेंद्र मिश्रा ने बताया कि 21 सितंबर का मुहूर्त उज्जैन स्थित भारत सरकार की संस्था महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान के सचिव जेड्डीपाल ने निकाला है। उन्होंने वैदिक, शास्त्रीय और ज्योतिष रीति से तीन मुहूर्त निकाले थे। मूर्ति स्थापना से पूर्व 11 सितंबर से मंधाता पर्वत पर, उत्तरकाशी के स्वामी ब्रह्मेन्द्रानंद और 32 संन्यासियों द्वारा प्रस्थानत्रय भाष्य शुरू कर दिया गया है, जो 20 तक चलेगा। 15 से ही दक्षिणाम्नाय श्रंगेरी शारदापीठ के मार्गदर्शन में महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद प्रतिष्ठान द्वारा देश के लगभग 300 विख्यात वैदिक आर्चकों द्वारा वैदिक रीति से पूजन और 21 कुण्डीय हवन शुरू किया गया है। इसका समापन भी 20 को होगा। 21 सितंबर को, दक्षिणाम्नाय श्रंगेरी शारदापीठ के मार्गदर्शन में महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद प्रतिष्ठान उज्जैन के आचार्य, शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के द्वारा एकात्मता की मूर्ति का अनावरण और अद्वैत लोक का भूमि एवं शिला पूजन सिद्धवरकूट पर होगा। इस आयोजन में देश और विदेश से लगभग 5000 संत और अन्य गणमान्य लोग आ रहे हैं।
 
आईये जानें अपने शंकर को
 
शंकराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी गांव में 508-9 ईसा पूर्व और महासमाधि 477 ईसा पूर्व में हुई थी। मां का नाम आर्याम्बा और पिता का नाम शिवगुरु है। 32 वर्ष की छोटी से आयु में ही इन्होंने देश के चार कोनों में चार मठों ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ की स्थापना की थी।
 
चारों पीठ आज भी बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं। चार पीठों में आसानी संन्यासी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं। चारों पीठों की स्थापना का उद्देश्य सांस्कृतिक रूप से पूरे भारत को उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम जोड़ना था। आपको अचंभा होगा कि पूरब की पीठ में पश्चिम की, पश्चिम वाली पीठ में पूरब के, इसी तरह दक्षिण की पीठ में उत्तर के और उत्तर की पीठ में दक्षिण के पुजारी पूजा करते हैं। ऐसा इसलिए ताकि हमारी सांस्कृतिक एकता और अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रचार प्रसार की हमारी परंपरा बनी रहे।
  
ये है आदि शंकराचार्य का एमपी कनेक्शन
 
आदि शंकराचार्य की अल्पायु में ही उनके पिता का देहावसान हो गया था। 8 वर्ष की उम्र में आचार्य शंकर मां की आज्ञा से गुरु की खोज में घर से निकल गए। वे केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र होते हुए मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर पहुंचे।
 
शंकर न्यास के प्रभारी अधिकारी शैलेंद्र मिश्रा के मुताबिक यहां उनकी मुलाकात गुरु गोविंद भगवत पाद से हुई। तीन वर्ष तक उनके सान्निध्य में उन्होंने वेद-उपनिषदों की शिक्षा ली और फिर 11 वर्ष की उम्र में अद्वैत दर्शन और सनातन धर्म की पुन: स्थापना का उद्देश्य लेकर अखंड भारत के भ्रमण पर निकल गए थे। आदि शंकराचार्य ने मध्यप्रदेश के चार स्थानों ओंकारेंश्वर, अमरकंटक, उज्जैन और रीवा के पचमठा को स्पर्श किया था।
 
ओंकारेश्वर-गुरु मिले और तीन वर्ष तक शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की। यहीं पर उन्होंने नर्मदा अष्टकम की रचना की थी। अमरकंटक-मां नर्मदा का उद्गम स्थल है। यहां से उन्होंने मां नर्मदा की परिक्रमा यात्रा आरंभ की थी। उज्जैन-देश के 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के दौरान पहुंचे थे।
 
रीवा का पचमठा-देश में चार पीठों की स्थापना के बाद देश भ्रमण पर निकले आदि शंकराचार्य रीवा के बीहर नदी के किनारे आश्रम में एक सप्ताह रुके थे। वे इसे पांचवें मठ के रूप में स्थापित करना चाह रहे थे, लेकिन दूसरे मठों की तरह उत्तराधिकारी नियुक्त करने से पूर्व वे गोलोकवासी हो गए। तभी से संत समाज इसे पंचमठा कहने लगा।
 
986 में कांचीकामकोटि के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती अपने उत्तराधिकारी विजयेन्द्र के साथ आए थे। उन्होंने भी कहा था कि आदि शंकराचार्य के भ्रमण में रीवा का प्रवास और पांचवें मठ की स्थापना का प्रमाण मिलता है। पुरी के शंकराचार्य निरंजन तीर्थ भी अपने प्रवास के दौरान इसका उल्लेख कर चुके हैं। दरअसल वे मध्य भारत के इस क्षेत्र को प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बनाना चाहते थे। एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र, जहां से एकात्म दर्शन को आगे बढ़ाते हुए सामाजिक एकता की अलख जगाई जा सके।
 
भगवान शंकर के अवतार माने जाते हैं शंकराचार्य
 
आदि शंकराचार्य ने तीन बार पूरे देश की अखंड यात्रा की। उनका उद्देश्य सनातन धर्म को पुन: स्थापित करना था। कई विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था। उन्हें शंकर का अवतार माना जाता है। उन्होंने ब्रह्म सूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है। उनके दर्शन के अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। उन्होंने पूरे भारत में मंदिरों और शक्तिपीठों की पुनः स्थापना की। नील पर्वत स्थित चंडी देवी मंदिर की स्थापना की। माता हिंग लाज मंदिर (अब पाकिस्तान में) और शिवालिक पर्वत शृंखला की पहाड़ियों के मध्य स्थित माता शाकंभरी देवी शक्तिपीठ की पूजा अर्चना की। शाकंभरी देवी के साथ तीन देवियां भीमा, भ्रामरी और शताक्षी देवी की प्रतिमाओं को उन्होंने स्थापित किया। कामाक्षी देवी मंदिर भी इन्हीं द्वारा स्थापित है।
 
सभी 12 ज्योतिर्लिंगों सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारेश्वर, भीमाशंकर, विश्वेश्वर (विश्वनाथ), त्र्यंबकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वर, घुष्मेश्वर (घृष्णेश्वर) के दर्शन किए। इन प्रयासों से उस युग में धर्म का बढ़-चढ़कर प्रसार हुआ था।
 
आदि शंकराचार्य की 108 फीट की प्रतिमा ओंकारेश्वर में ही क्यों
 
शंकर न्यास के प्रभारी अधिकारी शैलेंद्र मिश्रा इसकी दो वजह बताते हैं। पहला आदि शंकराचार्य 8 वर्ष की उम्र में गुरु की खोज में निकले तो ओंकारेश्वर में ये पूरा हुआ। तीन वर्ष तक वे गुरु के सान्निध्य में शिक्षा-दीक्षा लेते रहे। दूसरा देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में उज्जैन के बाद ओंकारेश्वर भी है। ओंकारेश्वर में ही ऊँ का आकार भौतिक रूप से देखा जा सकता है।
 
महाकाल लोक के बाद ओंकारेश्वर के धार्मिक और पर्यटन रूप से विकसित होने पर यहां की पूरी अर्थव्यवस्था बदल जाएगी। ओंकारेश्वर में आदि शंकराचार्य की 108 फीट की प्रतिमा स्थापित हो, इसकी घोषणा सीएम शिवराज सिंह ने 2016-17 में की गई नर्मदा परिक्रमा के दौरान ओंकारेश्वर में ही की थी। छह वर्ष बाद अब वो 21 सितंबर को साकार होने जा रही है। उसी दिन शंकर संग्रहालय (अद्वैत लोक) का शिला पूजन भी होगा। आचार्य शंकर अंतर्राष्ट्रीय वेदांत संस्थान की स्थापना का कार्य शुरू होगा, जो 2025-26 तक पूर्ण होगा। इन तीनों ही संरचनाओं को एकात्म धाम नाम दिया गया है।
 
मूर्ति में एमपी के 23 हजार गांवों की धातु, मिट्‌टी और जल समाहित
 
आदि शंकराचार्य ने मध्यप्रदेश के चार स्थानों ओंकारेश्वर, अमरकंटक, उज्जैन और रीवा के पचमठा को स्पर्श किया था। इसी कारण इन चारों स्थानों से धातु, जल मिट्‌टी का संग्रह करने के लिए एकात्म यात्रा निकाली गई थी। ये एकात्म यात्रा 23 हजार ग्राम पंचायत से गुजरी और वहां से धातु, मिट्‌टी, जल को कलश के रूप में लेकर ओंकारेश्वर पहुंची थी। इस मिश्रण को स्टेच्यू में समाहित किया गया है।
 
12 कार्यशालाएं, 11 मूर्तिकारों के प्रयास से साकार हुआ शंकराचार्य का बाल रूप
 
आदि शंकराचार्य की प्रतिमा उनके बाल्य काल की बनाई गई है। प्रतिमा कैसी दिखे इसके लिए अद्वैत परंपरा के संन्यासी, शंकर ट्रस्ट के ट्रस्टी स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज, चिदानंद पुरी महाराज, स्वामी हरि ब्रह्मानंद महाराज, चिन्मय मिशन के स्वामी मित्रानंद महाराज, और इसके अलावा देश के मूर्धन्य सन्यासियों से चर्चा कर मूर्ति का स्वरूप तय किया गया।
 
ये भी तय किया गया कि उनका कमंडल कितना बड़ा हो, दंड की ऊंचाई कितनी हो, रुद्राक्ष की माला कैसी हो, उनका वस्त्र कैसा हो, इस पर कई शोध और 12 कार्यशाला व सेमिनार हुए। इसके बाद मुंबई के प्रख्यात चित्रकार वासुदेव कामत की इन संन्यासियों से चर्चा कराई गई। उन्हें सभी बारीकियां बताई गईं। ये कहा गया कि आदि शंकराचार्य की 11 से 12 वर्ष की उम्र का जो बाल्य काल है, उस तरह का चित्र तैयार करें। उन्होंने इस कल्पना को कागज पर उकेरा। चित्र तैयार होने के बाद मूर्ति की स्थापना के लिए सर्च कम सलेक्शन कमेटी बनी।
 
देश के 11 मूर्तिकारों का चयन किया गया। सभी से चित्र के अनुसार पांच से छह फीट की मूर्ति तैयार कराई गई। आखिर में तीन मूर्तियों का चयन कर उनकी कमियां बताई गईं। तीनों ने उन कमियों को दूर करते हुए फिर से तीन मूर्ति तैयार की। तीनों में सबसे बेहतर मूर्ति भगवान रामपुरे सोलापुर ने बनाई। उसी मूर्ति के अनुसार अष्टधातु की 108 फीट की प्रतिमा तैयार की गई है। ओंकारेश्वर के मांधाता पर्वत पर 21 सितंबर को इसी का अनावरण होने जा रहा है।
 
100 टन की इस प्रतिमा में कॉपर, जिंक और टिन का मिश्रण
 
आदि शंकराचार्य की 108 फीट की ये प्रतिमा 12 साल के आचार्य शंकर की है। यह मूर्ति पत्थर निर्मित 16 फीट के कमल पर स्थापित है। यह प्रतिमा 100 टन की है। प्रतिमा 88 प्रतिशत कॉपर, 4 प्रतिशत जिंक तथा 8 प्रतिशत टिन के मिश्रण से बनाई गई है। एकात्मता की इस मूर्ति के कुल 290 पैनल अलग-अलग निर्माण कंपनी एलएंडटी कंपनी ने जेटीक्यू चाइना से तैयार कराया है। सभी 290 हिस्सों को ओंकारेश्वर में लाकर जोड़ा गया है। इस मूर्ति की स्थापना अद्वैत लोक (शंकर संग्रहालय) के मध्य में की गई है।
 
11.5 हेक्टेयर भूमि पर तैयार हो रहा अद्वैत लोक और एकात्मता की मूर्ति
 
मांधाता पर्वत पर लगभग 11.5 हेक्टेयर भूमि पर अद्वैत लोक और एकात्मता की मूर्ति स्थापित की जा रही है। इसे चिर स्थाई बनाने के लिए मूर्ति के अतिरिक्त अद्वैत लोक (शंकर संग्रहालय) और आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की स्थापना की जा रही है।
 
आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान में ये होगा
 
यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का संस्थान होगा। यहां अद्वैत वेदांत दर्शन में शिक्षा, शोध कर सकेंगे। इसके माध्यम से अद्वैत वेदांत दर्शन का संपूर्ण समाज एवं विश्व में लोकव्यापीकरण करके एकात्म भाव का जागरण किया जाएगा। संस्थान तीन माह, छह माह की छोटी अवधि के सर्टिफिकेट कोर्स संचालित करेगा। इसमें वेदांत पढ़ने वाले छात्रों सहित समाज के सभी वर्गों के लोग जैसे इंजीनियर, खिलाड़ी वर्ग, अधिकारी वर्ग, डॉक्टर, पुलिस आदि भी अद्वैत वेदांत का अध्ययन कर सकेंगे। यह संस्थान अध्ययन, अध्यापन एवं प्रशिक्षण का अद्वितीय केंद्र होगा।
 
संस्थान के 10 मुख्य केंद्र होंगे
 
आचार्य पद्मपाद अद्वैत दर्शन केंद्र : इस केंद्र में अद्वैत वेदांत की परम्परा, वेदों से लेकर अब तक की उपलब्धियां और इस परम्परा के सभी आचार्यों की कृतियों पर अध्ययन-अध्यापन और शोध होगा।
 
आचार्य हस्तामलक अद्वैत विज्ञान केंद्र : इस केंद्र में आधुनिक विज्ञान के माध्यम से अद्वैत वेदांत की अवधारणा, वैज्ञानिक अवलोकन और उपनिषदिक ज्ञान के मध्य समानताओं पर अध्ययन-अध्यापन और रिसर्च होगा।
 
आचार्य सुरेश्वर अद्वैत सामाजिक विज्ञान केंद्र : इस केंद्र में वर्तमान और भावी समाज के लिए अद्वैत वेदांत की प्रासंगिकता, महत्त्व, और उपयोगिता पर अध्ययन-अध्यापन और शोध होगा।
 
आचार्य तोटक अद्वैत साहित्य, संगीत एवं कला केंद्र : इस केंद्र में साहित्य, संगीत और कला की विभिन्न अभिव्यक्तियों में अद्वैत की स्थिति, और वेदांतिक जागरण पर अध्ययन-अध्यापन और शोध होगा।
 
महर्षि वेदव्यास अद्वैत ग्रंथालय : अद्वैत वेदांत पर यह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का संदर्भ ग्रंथालय होगा। अद्वैत वेदांत संबंधी सभी सामग्री प्रिंट और डिजिटल रूप में उपलब्ध होगी। पाण्डुलिपि को संरक्षित करते हुए उन्हें डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।
 
आचार्य गौडपाद अद्वैत विस्तार केंद्र : इस केंद्र का कार्य संस्थान के सभी केंद्रों के कार्यों और अद्वैत वेदांत को विभिन्न संचार माध्यमों से जनसाधारण के बीच उपलब्ध कराना होगा। साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर अद्वैत वेदांत का लोकव्यापीकरण किया जाएगा।
 
आचार्य गोविंद भगवत्पाद गुरुकुल : अद्वैत वेदांत के अध्ययन के लिए यह आवासीय गुरुकुल होगा। गुरुकुल में कुछ कक्षाओं की स्थाई व्यवस्था के साथ प्राचीन एवं पारंपरिक शैली के गुरुकुल शिक्षा पद्धति को भी इसमें शामिल किया जाएगा। गुरुकुल की संरचना प्राचीन गुरुकुलों के अनुसार भारतीय परंपरागत वास्तु शैली पर आधारित होगी।
 
ओपन एयर थिएटर : 2000 क्षमता का ओपन एयर थिएटर होगा। जिस पर आचार्य शंकर विरचित स्तोत्रों एवं अद्वैत वेदांत पर आधारित विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा।
 
मेडिटेशन सेंटर/साधना कुटीर : संस्थान में लगभग 200 क्षमता का एक मेडिटेशन सेंटर / साधना कुटीर होगा। 25 मेडिटेशन कॉटेज बनाए जाएंगे।
 
शारदापीठ/सर्वज्ञपीठ : कश्मीर (POK) के शारदा पीठ की तर्ज पर चारों दिशाओं में प्रवेश द्वार समेत अध्ययन कक्ष युक्त परकोटा के बीच शारदा मां का मंदिर स्थापित होगा। स्थापत्य शैली कश्मीरी मंदिर पर आधारित होगी।
 
ये होगा अद्वैत लोक शंकर संग्रहालय
 
शंकर स्तंभ : मूर्ति के नीचे भवन में 45 फीट ऊंचा एक विशाल स्तंभ होगा। इसका डाया लगभग 100 फीट है। शंकर स्तंभ पर आदि शंकराचार्य के जीवन की 32 घटनाओं को लो रिलीफ के द्वारा प्रदर्शित किया जाएगा।
 
निदिध्यासन केंद्र : इस केंद्र की क्षमता लगभग 300 की होगी। यहां विविध भाषाओं में गाइडेड मेडिटेशन कराया जाएगा।
लेजर लाइट वाटर एण्ड साउंड शो : श्रीयन्त्र प्रांगण में प्रतिदिन 'लेजर, लाइट, वाटर एण्ड साउण्ड शो' होगा। इस शो में उपनिषदों की कथाओं को रोचक ढंग से प्रतिदिन शाम के समय प्रस्तुत किया जाएगा।
 
हाइस्क्रीन थिएटर : इसकी कुल क्षमता 500 होगी। आचार्य शंकर के जीवन और दर्शन को हाइस्क्रीन के माध्यम से दिखाया जाएगा।
 
सृष्टि गैलरी : सृष्टि- वेदांत व्याख्या का एक केंद्र होगा। इसमें थ्रीडी होलोग्राम सहित अन्य आधुनिक तकनीक के माध्यम से ब्रह्म, सृष्टि, माया, जीव एवं जगत आदि सिद्धान्तों को कथानक के रूप में बुनकर रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जाएगा।
 
डायोरामा: कुल सात डायोरामा के माध्यम से आचार्य शंकर के सम्पूर्ण जीवन का सजीव प्रस्तुतीकरण किया जाएगा।
 
अद्वैत नर्मदा विहार : अद्वैत लोक (संग्रहालय) के भूतल में अद्वैत नर्मदा विहार स्थित होगा। इसमें दर्शक स्वचलित नौकाओं के माध्यम से विहार कर सकेंगे। नौका विहार का प्रारम्भ (बोर्डिंग एरिया) नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से होकर अंत भरुच की खाड़ी में होगा।
 
कला वीथिका : आचार्य के जीवन, दर्शन और उनकी रचनाओं को चित्रों के माध्यम से दिखाया जाएगा। देश के विख्यात चित्रकारों से केरल म्यूरल, ओडिशा पट्टचित्र, कांगड़ा, मधुबनी और समकालीन विभिन्न शैलियों में चित्र बनाए जा रहे हैं।
 
अन्नपूर्णा : अन्नपूर्णा में लगभग 1500 लोगों के भोजन की व्यवस्था पारंपरिक एवं आधुनिक शैली दोनों में होगी। अन्नपूर्णा में पधारे सभी लोगों के लिए विशेष व्यंजन 'अद्वैत भोग' की भी व्यवस्था होगी। अन्नपूर्णा में परिक्रमा वासियों सहित दूसरे भक्तजनों के लिए न्यूनतम मूल्य पर प्रसादी (खिचड़ी) पाने और ले जाने के लिए प्रसाद उपलब्ध कराया जाएगा।
 
अद्वैत कलाग्राम : मध्यप्रदेश सहित देश के सभी लोक एवं क्षेत्रीय शिल्पों के प्रदर्शन और विक्रय के लिए ये केंद्र विकसित किया जाएगा। यहां दुकानों की वास्तु शैली, पारंपरिक मंदिर वास्तुशिल्प आधारित होगी।
 
पंचायतन मंदिर : आचार्य शंकर द्वारा पुनस्थापित पंचायतन पूजा पद्धति पर आधारित पंचायतन मंदिर का निर्माण होगा। इस मंदिर का स्थापत्य पारंपरिक नागर शैली में होगा। यह मंदिर पत्थर से बनेगा। यहां नित्य पूजा अभिषेक होंगे। भक्त भी पूजा अभिषेक कर पाएंगे।
 
सोर्स: समाचार भास्कर की विशेष रिपोर्ट