छात्र जीवन से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने वाले सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरिवल्लभ शिलाकारी का जीवन राष्ट्र के प्रति रहा समर्पित

7 जून 1901 सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरिवल्लभ शिलाकारी का जन्म

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    08-Jun-2023
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फाइल फोटो
फाइल फोटो  
 
बुन्देलखण्ड के सुप्रसिद्ध स्वाधीनता संग्राम सेनानी हरिवल्लभ जी शिलाकारी का जन्म 7 जून 1901 को सागर नगर में हुआ थ । आपके पिता राजवैद्य पंडित मन्नूलाल सिलाकारी ख्यातिप्राप्त चिकित्सक थे। हरिवल्लभ जी की प्रारंभिक शिक्षा दून स्कूल मंसूरी में हुई थी। उच्च शिक्षा के लिये वे झाँसी के बुंदेलखंड विश्वविद्यालय पढ़ने गये । इस विश्वविद्यालय से उन्होंने मेडीसिन एण्ड सर्जरी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। उन्होंने यह परीक्षा विश्वविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ अंकों उत्तीर्ण की। इसके लिये उन्हे स्वर्ण पदक मिला।
 
फिर वह केंसर चिकित्सा में विशेषज्ञता प्राप्त की और शोध ग्रंथ लिखा। आपके द्बारा लिखित पुस्तक "टाईफाइड और उसकी चिकित्सा" को झांसी आयुर्वेद वि,वि, ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया। एक अन्य पुस्तक,, सर्व सुलभ देहाती वनौषधियां,, जो देश के अमर सैनानियों शहीदों को समर्पित है उस पर मध्यप्रदेश सरकार ने पारितोष प्रशंसा पत्र प्रदान किया।आपके पिताजी राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे अतः हरिवल्लभ जी को राष्ट्र प्रेम की भावना विरासत में मिली। सन् १८९८ में सागर में आपके काका पं, गोविन्द प्रसाद सिलाकारी और विश्वास राव ने संस्कृत महाविद्यालय एवं ब्रम्हचर्य आश्रम धर्मश्री की स्थापना की।
 
यह संस्था स्वतंत्रता आन्दोलन में राष्ट्रीय भावना जगाने का प्रमुख केन्द्र रही। इस क्षेत्र में इस संस्था की साख ठीक वैसी ही थी जैस वाराणसी हिंदू विश्व विद्यालय की रही है।
 
सागर की इस संस्था में समय-समय पर लाला लाजपत राय, स्वामी अरविंद घोष, सरदार वल्लभ भाई पटेल, पट्टाभि सीतारमैया, और महान क्रान्तिकारी चंद्र शेखर आजाद भी आये थे । हरिवल्लभ जी ने इस राष्ट्र और सांस्कृतिक जागरण के बीच स्वतंत्रता आंदोलन का बीड़ा उठाया और आंदोलन में कूद पड़े। वे एक साथ दोनों धाराओं में सक्रिय हुये । एक ओर वे युवाओं को जहाँ क्राँतिकारी आंदोलन से जोड़ रहे थे वहीं प्रभात फेरियों के आयोजन भी करते थे । हरिवल्लभ जी ने चन्द्रशेखर आज़ाद से बम बनाना सीखा और विद्यार्थियों को बम बनाने की तकनीक सिखाई।
 
उन्होंने प्राचीन सागर गढ़ पहरा सिद्ध हनुमान मंदिर में खून से तिलक लगाकर युवकों को स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़ने के लिए शपथ दिलाई । पंडित हरिवल्लभ सिलाकारी का पूरा घर आंदोलन का केंद्र रहा । 1919 में अंग्रेजी सरकार के बनाये रोलर एक्ट का हरिवल्लभ सिलाकारी, विस्वास राव भावे ने विरोध किया। जुलूस निकाला। १८ मार्च १९२३ को जबलपुर में म्युनिसिपल भवन पर तिरंगा फहराया गया अनेक सैनानी गिरफ्तार हुए।
 
यह झंडा सत्याग्रह आंदोलन कहलाया जो सागर तक फैला इसका नेतृत्व हरिवल्लभ जी ने किया। इसके बाद जंगल सत्याग्रह हुआ।
 
१९३० आंदोलन विदेशी कपड़ों की होली जलाने वाली समिति का प्रभार हरिवल्लभ जी को सौंपा गया। चकराघाट फर्श पर होली जलाई गई समीप ही सिटी कोतवाली पुलिस ने लाठीचार्ज कर भीड़ को तितर-बितर किया। स्वदेशी आंदोलन को गति देनेके लिये चरखे से सूत कातने, स्वदेशी खादी वस्त्र निर्माण कर उसे बैंचकर प्राप्त राशि का उपयोग जेल में बंद सैनानियों के परिवार को दो रुपए और घर में लालटेन, दिया जलाने केलिये घासलेट का तेल लेकर हरिवल्लभ जी ही जाया करते थे।
 
अनेकों बार जेल में बंद सैनानियों के परिवार वालों के आक्रोश व अपशब्दों का सामना करने के साथ ही उन्हें धैर्य भी बंधाना रहता था । जनवरी 1930 में मछरयाई वार्ड में हरिजन सम्मेलन सिलाकारी जी के मुख्य आतिथ्य में बड़ा सम्मेलन आयोजित हुआ इस में शराब बंदी और अश्पृश्यता के विरूद्ध अभियान चलाने का निर्णय हुआ। 14 जनवरी 1931 को छतरपुर जिले के सिंहपुर ग्राम में उर्मिल नदी के किनारे मेला आयोजित था, यहां एक सभा हुई जिसका नेतृत्व पं, राम सहाय तिवारी व ठाकुर हीरा सिंह ने किया, इनके आग्रह पर हरिवल्लभ जी वहां गये और सभा में भाषण दिया।
 
यहां सभा में शामिल लोगों पर मशीन गन से फायरिंग हुई। अंग्रेजी सरकार की फायरिंग में २१ लोग बलिदान हुए और ३३ घायल हुए । हरिवल्लभ जी के दाहिने पैर में घुटने के नीचे गोली लगी, गिरफ्तारी हुई । यह चरण पादुका आंदोलन के नाम से जाना जाता है जिसे बुंदेलखंड का जलियांवाला बाग़ भी कहते हैं।
 
हरिवल्लभ जी बुलेटिन लिखते,साईक्लोस्टाईल से छापते और बांटते थे। इस काम में वालेंटियर्स की मदद भी ली जाती थी। एक बार इनके बड़े पुत्र बालकृष्ण सिलाकारी को समोसे रखने के कागज के बहाने बुलेटिन बांटते सिटी कोतवाली पुलिस ने पकड़ लिया जिसे मास्टर बल्देव प्रसाद ने अपनी जमानत पर यह कहकर छुड़ाया कि अबोध बालक है किसी ने समोसा खाने दिया होगा। गलती से हुआ होगा। फिर भी पुलिस ने तीन वेंत लगाकर छोड़ा। अपने आंदोलन को गति देने केलिये पहला हिन्दी समाचार पत्र "प्रकाश" का प्रकाशन आरंभ किया।
  
इसके बुलेटिन में सिलाकारी जी आंदोलन, धरना प्रदर्शन, जुलूस, प्रभातफेरी की जानकारी होती थी जो आंदोलन कारियों को दी जाती थी। आखिर में वंदेमातरम् जयहिन्द, जय जनतंत्र लिखा होता था। स्वतंत्रता के बाद 1978 में यह साप्ताहिक जय जनतंत्र पत्र के रूप में विधिवत प्रकाशन सागर से हुआ जिसे आज भी नियमित उनके पुत्र डॉ आर एन सिलाकारी निकाल रहे हैं। बुलेटिन के कारण मुखबिरी हुई सिटी कोतवाली में हरिवल्लभ जी को बुलाकर हेण्डराईटिंग का मिलान किया गया, घर की तलाशीयां हुईं। कोतवाली में कुछ दिन डिटेन्शन में रखा । रिहाई के बाद वे वेष बदल कर अपने मित्र के पास कटनी चले गये। उनको अज्ञातवास में जाते ही पुलिस ने वारंट जारी कर फरार घोषित कर दिया । उन्होंने स्वयं को प्रस्तुत किया कुछ दिन जेल में रहे और जमानत पर रिहा हुये।
 
1938 में महात्मा गांधी के आगमन पर स्वागत समिति के अध्यक्ष बनाए गए और पूरी व्यवस्था संभाली। बापू के निर्देश पर तीन माह सेवाग्राम आश्रम में रहे वहां आंदोलन कारियों तथा गरीबों का इलाज करते थे। १९४२ में वापिस सागर आते तब अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन, और करों या मरो, शुरू हुआ तो सागर में इस आदोलन का नेतृत्व हरिवल्लभ जी ने किया। १९४५ एवं १९४६ में जब अधिकांश नेताओं को गिरफ्तार किया तब हरि वल्लभ की धर्म पत्नी गिरिजा देवी एवं यमुना ताई खैर के नेतृत्व में ३४ महिलाओं ने गवर्मेंट हायर सेकेण्ड्री स्कूल के पास गिरफ्तारी दी जिन्हें पुलिस ने पकड़ कर ट्रक से गढ़ पहरा चौदह किलोमीटर दूर जंगल में छोड़ दिया। जिनमें हरिवल्लभ जी की पत्नी गिरिजा देवी के अलावा कुछ अन्य महिलाएं गर्भवती थीं जिन्हें बाद में क्षति पहुंची।
 
1946-47 में भारत विभाजन की उथल-पुथल का प्रभाव सागर में भी पड़ा। तब हरिवल्लभ जी के नेतृत्व में सद्भाव और शाँति अभियान चलाया गया । स्वाधीनता के बाद वे समाज सेवा और चिकित्सीय सेवा में समर्पित रहे । स्वतंत्रता सेनानियो की सूची में आपका नाम क्रमांक ४१७ पर दर्ज है । समाज सेवा के बीच 13 दिसम्बर 1996 को उन्होने संसार से विदा ली । उनकी स्मृति में प्रति वर्ष जय जनतंत्र पत्र परिवार सांस्कृतिक सम्मान कार्यक्रम आयोजित करता है इसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया जाता है।