मतान्तरण के कुचक्र में नहीं फंसें संत रविदास, दिया जवाब

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    05-Feb-2023
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संत रविदास

बलपूर्वक, षड्यंत्र आदि के माध्यम से मतन्तान का खेल लम्बे समय से चला आ रहा है. इससे संत रविदास भी अछूते नहीं रहे, लेकिन इसके प्रति उन्होंने विरोध जाहिर किया. उन्होंने अपनी वाणी से इस बात का विरोध करते हुए कहा की वह अपने धर्म में सही हैं, उन्हें ऐसे सच्चे किसी और मत छोड़कर कहीं और नहीं जाना. इस दौरान उन्होंने सनातन पर गर्व करने लायक बातें भी बतायीं. 
 
संत रविदास को मुसलमान बनाने से उनके लाखों भक्त भी मुसलमान बन जायेंगे ऐसा सोचकर धर्मपरिवर्तन के लिए उन पर अनेक प्रकार के दबाव आये, किन्तु संत रैदास की श्रद्धा और निष्ठा को हम अटूट पाते हैं। सदना पीर इनको मुसलमान बनाने आया था. किन्तु इनकी ईश्वर-भक्ति और आध्यत्मिक-साधना से प्रभावित होकर सदना पीर हिन्दू होकर रामदास नाम से उनका शिष्य बन गया। एक ओर तो वे जातिगत भेद, ढोंग, कर्मकांड आदि के विरोध में संघर्ष करते हैं, किन्तु वैदिक धर्म के दार्शनिक पक्ष में अपनी पूर्ण आस्था बराबर रखते हैं।
  
सिकन्दर लोदी उनको मुसलमान बनाने के लिए प्रलोभन तथा दवाब दोनों की नीति अपनाता है , लोगों को उनके पास भेजता है , किन्तु उनका उत्तर सीधा-सपाट है | वे बार -बार हिन्दू धर्म में अपनी श्रद्धा , निष्ठा तथा आस्था व्यक्त करते है| उनकी दृष्टि तथा सोच स्पष्ट है :
 
वेद वाक्य उत्तम धरम, निर्मल वाका ज्ञान।

यह सच्चा मत छोड़कर, मैं क्यों पहूं कुरान।

स्रुति-सास्त्र-स्मृति गाई, प्राण जाय पर धरम न जाई।

कुरान बहिश्त न चाहिए, मुझको हूर हजार।

वेद धरम त्यागूं नहीं, जो गल चलै कटार।

वेद धरम है पूरण धरमा, करि कल्याण मिटावे भरमा।

सत्य सनातन वेद हैं, ज्ञान धर्म मर्याद।

जो ना जाने वेद को, वृथा करे बकवाद।

(हमारे साधु संत, भाग- 1, पृ. 22-23)

 
धर्मपरिवर्तन से इन्कार करने पर सिकन्दर लोदी ने संत रैदास को कठोर दण्ड देने की धमकी दी तो उन्होंने निर्भीकता के साथ उत्तर दिया :
 
मैं नहिं दब्बू बाल गँवारा, गंग त्याग गहूँ ताल किनारा।

प्राण तंजू पर धर्म न देऊँ, तुमसे शाह सत्य कह देऊँ।

चोटी शिखा कबहुँ नहिं त्यागँ, वस्त्र समेत देह भल त्यागँ।

कंठ कृपाण का करौ प्रहारा, चाहें डुबावो सिन्धु मंझारा॥

(वही, पृ. 23)