डॉ उमेश प्रताप वत्स-
प्रत्येक वर्ष की भांति इस बार भी देशभर में 'हिंदी पत्रकारिता दिवस' सैंकड़ो स्थानों पर मनाया गया। इसके बदलते स्वरूप पर चर्चा की गई। बदलते परिवेश में हिंदी पत्रकारिता के महत्व पर प्रकाश डाला गया। राजनैतिक प्रभाव की भी बात हुई तथा कई विद्वानों ने पत्रकारिता की निष्पक्षता, डिजिटल दुनिया में इसकी चुनौती, महत्ता व उद्देश्य पर बौद्धिक भी प्रस्तुत किया। हिंदी व हिंदी पत्रकारिता पर बडे स्तर पर चिंतन हुआ। इन सारी कसरत का उद्देश्य यही था कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को आज भी हिंदी पत्रकारिता दृढ़ता से संभाले हुए है।
आज विश्व में हिंदी के बढ़ते वर्चस्व व सम्मान में हिंदी पत्रकारिता का विशेष योगदान है। महर्षि नारद को हमारी परंपरा में आदि पत्रकार कहा गया हैं। वे लोकमंगल के लिए सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रेषित कर सामाजिक संतुलन बनाने का निरंतर प्रयास करते रहते थे। इस आधार पर कहा जा सकता है कि पत्रकारिता अपने उद्भव के आदिकाल से ही लोकमंगल का संकल्प लेकर चली है।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम व देश आजाद होने तक आजादी के संघर्ष में हिंदी पत्रकारिता के सतत् प्रयास को अनदेखा नहीं किया जा सकता। वास्तव में हिंदी पत्रकारिता जन सरोकार की पत्रकारिता है, जिसमें माटी की खुशबू महसूस की जा सकती है। समाज का प्रत्येक वर्ग फिर चाहे वो किसान हो, मजदूर हो, शिक्षित वर्ग हो या फिर समाज के प्रति चिंतन-मनन करने वाला आम आदमी सभी हिंदी पत्रकारिता के साथ अपने को जुड़ा हुआ मानते हैं। हिंदी पत्रकारिता की एक ऐतिहासिक व स्वर्णिम यात्रा रही है जिसमें अनेक संघर्ष व सफलताएं भी शामिल हैं। हिंदी पत्रकारिता सही मायनों में सरकार व जनता के बीच एक सेतु का कार्य करती है।
भारत में प्रारंभ में हिंदी पत्रकारिता का उद्देश्य था देश को स्वतंत्र कराने के लिए राष्ट्रीय जागरण। स्वाधीनता के महान उद्देश्य को लेकर हिंदी पत्रकारिता जन-जन को जगाती रही, प्रोत्साहित करती रही। भारत की पत्रकारिता राष्ट्र और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों से कभी विमुख नहीं हुई। तभी पत्रकारिता के प्रति भारत के लोगों का विश्वास दृढ़ होता गया।
1816 में प्रकाशित ‘बंगाल गजट ’ भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र है। इस समाचार पत्र के संपादक गंगाधर भट्टाचार्य थे। इसके अलावा राजा राममोहन राय ने मिरातुल, संवाद कौमुदी, बंगाल हैराल्ड पत्र भी निकाले और लोगों में चेतना जगाई।
कालांतर में 1857 में गैंगिंक एक्ट, 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1908 में न्यूज पेपर्स एक्ट, 1910 में इंडियन प्रेस एक्ट, 1930 में इंडियन प्रेस ऑडिनेंस, 1931 में दि इंडियन प्रेस एक्ट जैसे दमनकारी कानून अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करने के उद्देश्य से लागू किए गए। अंग्रेजी सरकार इन काले कानूनों का सहारा लेकर किसी भी पत्र-पत्रिका पर जब चाहे प्रतिबंध लगा देती थी। आपत्तिजनक लेख वाले पत्र-पत्रिकाओं को जब्त कर लिया जाता। लेखक, संपादकों को कारावास भुगतना पड़ता। बावजूद इसके समाचार पत्र संपादकों के तेवर उग्र से उग्रतर होते चले गए।
स्वतंत्रता के आन्दोलन में जो भूमिका उन्होंने खुद तय की थी, उस पर उनका भरोसा और भी ज्यादा मजबूत होता चला गया। कारावास, जुर्माना जैसे अत्याचारों से उनके हौसले पस्त नहीं हुए। बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक में सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रचार प्रसार और उन आन्दोलनों की कामयाबी में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही। कई पत्रों ने स्वाधीनता आन्दोलन में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
कानपुर से 1920 में प्रकाशित ‘वर्तमान’ ने असहयोग आन्दोलन को अपना व्यापक समर्थन दिया था। पंडित मदनमोहन मालवीय द्वारा शुरू किया गया साप्ताहिक पत्र ‘अभ्युदय’ उग्र विचारधारा का था। अभ्युदय के भगत सिंह विशेषांक में महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मदनमोहन मालवीय आदि के लेख प्रकाशित हुए। जिसके परिणामस्वरूप इन पत्रों को प्रतिबंध-जुर्माना का सामना करना पड़ा। गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’, शिवदान सिंह चौहान के संपादन में इलाहाबाद से निकलने वाला ‘नया हिन्दुस्तान’ राजाराम शास्त्री का ‘क्रांति’ यशपाल का ‘विप्लव’ अपने नाम के मुताबिक ही क्रांतिकारी तेवर वाले पत्र थे। फासीवाद के उदय और बढ़ते साम्राज्यवाद, पूंजीवाद पर चिंता इन पत्रों में साफ देखी जा सकती है।
समाचार सुधा वर्षण, अभ्युदय, शंखनाद, हलधर, सत्याग्रह समाचार, युद्धवीर, क्रांतिवीर, स्वदेश, नया हिन्दुस्तान, कल्याण, हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण, बुन्देलखण्ड केसरी, मतवाला जैसे दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक पत्र तो सरस्वती, विप्लव, अलंकार, चांद, हंस, प्रताप, सैनिक, क्रांति, बलिदान, वालिंट्यर आदि जनवादी पत्रिकाओं ने आहिस्ता-आहिस्ता लोगों में सोये हुए देशभक्ति की भावना को जगाया और क्रांति का आह्वान किया। परिणामस्वरूप उन्हें सत्ता का कोपभाजन बनना पड़ा।
दमन, नियंत्रण के दुष्चक्र से गुजरते हुए उन्हें कई प्रेस अधिनियमों का सामना करना पड़ा। स्वतंत्रता संघर्ष में पत्रकारिता एवं साहित्य का भी गजब का संबंध रहा है, जहां साहित्यकारों ने अच्छी पत्रिकाएं निकाली हैं वहीं अच्छे पत्रकार, पत्रकारों ने यशस्वी साहित्यकार भी पैदा किये तथा दिग्दर्शन कराने वाला साहित्य भी पैदा किया। इस तरह दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में हमें दिखाई देते हैं। अपने प्रारंभिक समय से और अब तक क्योंकि पत्रकारिता में साहित्य संभव नहीं था और बिना साहित्य के उत्कृष्ट पत्रकरिता संभव नहीं है। पत्रकारिता को साहित्य से शक्ति मिलती है इसके विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
कालांतर में राजा राममोहन राय की प्रेरणा से बंग दूत चार भाषाओं अंग्रेजी, हिंदी, फ़ारसी और बंगला में निकलता है। साल 1854 में हिंदी का पहला दैनिक समाचार पत्र सुधावर्शण नाम से श्याम सुंदर सेन ने प्रकाशित किया। पत्रकारिता की उद्भव भूमि कलकत्ता बना। समय के साथ-साथ धीरे-धीरे इन समाचार पत्रों का प्रभाव कोलकाता से लेकर संयुक्त अवध प्रांत तक होता गया और फिर काशी और प्रयाग में अखबार निकलने प्रारंभ हो गए। 1845 में शुभ सात सितारे, शुभ शास्त्र, हिंद की प्रेरणा से बनारस से अखबार निकलता है। इस लंबे काल तक समाचार पत्र और हिंदी पत्रकारिता अपना विकास यात्रा तय करती है तो अपने साथ-साथ एक उत्कृष्ट साहित्य और यशस्वी साहित्यकारों को लेकर चलती है।
वर्तमान में जब हम यह कहते हैं कि समाचार जगत लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है तो निरंतर कर्तव्यबोध से यह साबित भी हुआ है। पत्रकारिता अंतिम पंक्ति में खड़े समाज के सबसे लाचार व्यक्ति के हितों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करती आई है। उसकी पवित्रता, जीवंतता, व्यापकता, ही पूर्ण सत्य है। हम आज व्यवसाय और व्यावसायिक होड़ की बात कहकर पत्रकारिता को चाहे अलग-अलग तरीके से परिभाषित करें, लेकिन पत्रकारिता का मूल्य धर्म जो है, लोक कल्याण राष्ट्रीय जागरण और ऐसे हर सामान्य व्यक्ति के साथ खड़े होना उसके अधिकारों, हितों के लिए लड़ना, जिसका कोई सहारा नहीं है। तभी मीडिया को आम आदमी की आवाज कहा जाता था।
मीडिया का समर्पण देश एवं समाज के हितों के लिए साथ ही कमजोर व्यक्तियों के कल्याण की कामना के प्रति समर्पित था। यह जो जीवन दृष्टि है पत्रकारिता की यही वास्तव में पत्रकारिता की विशेषता है। इन मूल्यों को लेकर भारत की पत्रकारिता का उदय हुआ। साहित्यिक व पत्रकारिता का कार्य समाज को सांस और गति देकर निरंतर जागृत करना। नयी रचनाशीलता और नयी प्रतिभाओं को सामने लाना। साहित्यिक व पत्रकारिता की यही जरूरी शर्त है। इसलिए यह एक अटल सत्य है कि साहित्य व पत्रकारिता दोनों परस्पर एक-दूसरे पर आश्रित है। जिस प्रकार समाज में मुखिया पूरे परिवार का मार्गदर्शन करता है, वैसे ही पत्रकारिता भी समाज का मार्गदर्शन करती है, संरक्षण करती है तथा उसकी आवाज बनकर अन्याय के विरूद्ध संघर्ष करना भी सिखाती है।
आज के दौर में डिजिटल व सोशल मीडिया पर हिंदी के बढ़ते वर्चस्व को नकारा नहीं जा सकता। आजकल जब लगभग हर मीडिया हॉउस, संस्था, व्यक्ति, सरकार, कंपनी, साहित्यकर्मी से समाजकर्मी तक और नेता से अभिनेता को सोशल मीडिया में उसकी सक्रियता, उसको फॉलो करने वाले लोगों की संख्या के आधार पर उसकी लोकप्रियता को तय किया जाता है। ऐसे में इन सबके द्वारा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी पहुँच बनाने के लिए हिंदी या स्थानीय भाषा का प्रयोग दिखाई देता है। भारत में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के पोर्टल्स का भविष्य भी बहुत उज्ज्वल है। हिंदी पढ़ने वालों की दर प्रतिवर्ष 94 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है जबकि अंग्रेजी में यह दर 19 प्रतिशत के लगभग है। यही कारण है कि तेजी से नए पोर्टल्स सामने आ रहे हैं। अब पोर्टल के काम में कई बड़े खिलाड़ी आ गए हैं। इनके आने का भी कारण यही है कि आने वाला समय हिंदी पोर्टल का समय है। एंड्रॉयड एप्लीकेशन ने हम सभी को इंफॉर्मेशन के हाईवे पर लाकर खड़ा कर दिया है। रेडियो को 50 लाख लोगों तक पहुंचने में 8 वर्ष का समय लगा था। जबकि डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू को 50 लाख लोगों तक पहुंचने में केवल 2 साल का समय लगा। आज हमारे देश में 80% रीडर मोबाइल पर उपलब्ध हैं आज देश ही नहीं पूरी दुनिया जब डिजिटल की राह पर आगे बढ़ रही है तो कहना गलत न होगा कि ऐसे परिवेश में हिंदी जैसी भाषाओं की व्यापकता और आसान हो गई है।
डिजिटल वर्ल्ड में तकनीक के सहारे हिंदी जैसी भाषाओं को खास प्राथमिकता दी जा रही है। विश्व में लगभग 200 से अधिक सोशल मीडिया साइटें हैं जिनमें फेसबुक, ऑरकुट, माई स्पेस, लिंक्डइन, फ्लिकर, इंटाग्राम सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। दुनियाभर में फेसबुक को लगभग 1 अरब 28 करोड़, इंस्टाग्राम को 15 करोड़, लिंक्डइन को 20 करोड़, माई स्पेस को 3 करोड़ और ट्विटर को 9 करोड़ लोग प्रयोग में ला रहे हैं। इन सभी लोकप्रिय सोशल मीडिया साइटों पर हिंदी भाषा ही सबसे ज्यादा प्रयोग की जाने वाली भाषा बनी हुई है। स्मार्टफोनों पर चलने वाली वाहट्सएप्प मैसेंजर तत्क्षण मैसेंजिंग सेवा में तो हिंदी ने धूम मचा रखी है। जिस तरह से आज समाज के हर वर्ग ने डिजिटल व सोशल मीडिया को अपनी स्वीकृति दी है उससे पूरी संभावना है कि डिजिटल युग में भी हिंदी पत्रकारिता के भविष्य की अपार संभावनाएं हैं।
हिंदी पत्रकारिता का स्थान दुनियाभर में निरंतर बढ़ रहा है। आज हिंदी व स्थानीय भाषाओं में कंटेंट लिखने वालों की मांग बढ़ रही है। हिंदी पत्रकारिता वास्तव में संचार की शक्ति रखती है। इसलिए आज हिंदी पत्रकारिता से जुड़े व्यक्तियों का उत्तरदायित्व पहले से अधिक हो गया है। हिंदी में अंग्रेजी के बढ़ते स्वरूप के प्रति भी हमें सतर्क होना होगा। हिंदी भाषा को भ्रष्ट होने से बचाना होगा। हिंदी के सही स्वरूप को बनाए रखने के लिए हमें एक योद्धा के रुप में काम करना होगा। हिंदी पत्रकारिता के केंद्र में सदैव समाज हित व राष्ट्र हित को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। आज भी आजादी के संघर्ष की भांति पत्रकारिता को हथियार बनाकर न्याय के लिए सतत् संघर्ष करना होगा तथा राष्ट्र को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए दृढ़संकल्प लेना होगा। यही संकल्प व प्रतिबद्धता वास्तव में भविष्य की हिंदी पत्रकारिता के मार्ग को प्रशस्त करेगा। जो भारत को विश्व गुरु बनाने हेतु इतिहास में अपनी ऊर्जावान भूमिका से अविस्मरणीय योगदान अंकित करा पायेगा।