सत्यकीर्ति राने (सामाजिक कार्यकर्ता)-
भोपाल. करवा चौथ व्रत की कथा के अनुसार विवाहित महिलाएं पति के लंबे जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं। इस व्रत की शुरुआत करने से पहले सास अपनी बहू को सूर्योदय से पहले 'सरगी' देती है। सरगी में सेंवई, फल, मिठाई, ड्राई फ्रूट्स, मठरी, आलू से बना को पकवान और पूड़ियां होती है। विवाहिता ससुराल में सास की तरफ से मिली इस सरगी को खाकर ही करवा चौथ का व्रत शुरू करती है। सरगी का मतलब होता है 'सदा सुहागिन रहो'। सास इसे आशीर्वाद के रूप में बहू को देती हैं।
इस व्रत की विधि में “प्री” करवाचौथ का कोई वर्णन नही मिलता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू व्रत, पर्व, त्योहार, ज्योतिष या पंचाग में तय तिथि व समय अनुसार निर्धारित होते हैं। हर व्रत, उपवास, त्योहार, उत्सव का सनातन धर्म में कोई न कोई महत्व है। करवा चौथ वास्तविकता में चंद्रमा व गणेश जी की आराधना है। यह पति- पत्नी के बीच विश्वास, पवित्रता व परिणय सूत्र को निभाने की पुनर्संकल्पना का त्योहार है।
आजकल हिंदू व्रत, त्योहारों को मनाने के नए-नए प्रायोजित हथकंडे अपनाये जाने की होड़ लगी है। यह तरीका है हिंदू महिलाओं को अपनी जड़ों से काटने का। कोई यदि ऐसे आयोजनों को रोके या विश्लेषण करे तो उसे तथाकथित प्रोग्रेसिव द्वारा कहा जाएगा कि इसमें गलत क्या है, हमें अधिकार है अपने हिसाब से मनाने का। इस विषय पर पुरुष तो कुछ कह ही नही सकते। यदि उन्होंने आपत्ति जताई तो कथित 'प्रोग्रेसिव' महिलाएं विद्रोह कर सकती हैं, उन्हें पुरुषवादी घोषित कर सकती हैं।
मुद्दे की बात यह है कि हाल ही में भोपाल की एक सामाजिक कार्यकर्ता महिला द्वारा प्री-करवाचौथ सेलेब्रेशन का आयोजन किया गया, जिसमें महिलाएं पारंपरिक भारतीय भारतीय “पोशाक” पहनकर आईं। इस महिला आधारित कार्यक्रम में अतिथि के रूप में एक पुरुष को बुलाया गया जिसका मजहब इस व्रत को स्वीकार करने की अनुमति नही देता। उससे अपने पति की लंबी आयु के लिए आशीर्वाद माँगने की बात आयोजक महिला द्वारा कही जा रही है। ऐसा बताया जा रहा है कि वह व्यक्ति भाई के रूप में करवा चौथ के पूर्व सरगी देने आया था। यह पूर्णतः सफेद झूठ की तरह है बिल्कुल वैसे ही जिस तरह सर्प को प्रकाश के अभाव में रस्सी समझ लिया जाता है। क्योंकि सरगी तो बहू को सास के द्वारा दी जाती है। प्री करवा चौथ आयोजन एक सोची समझी साजिश है। यह निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु इस व्रत के महत्व को खत्म तो करता ही है साथ ही हिंदू महिलाओं को असुरक्षा, अविश्वास, अपमान, अधार्मिकता की ओर धकेलता है।
एक दूसरा उदाहरण देखिए। कुछ दिन पहले 18 सितंबर को इसी प्रकार एक “विवाह विच्छेद” नामक समारोह “डिवोर्स सेरेमनी” का आयोजन भाई वेल्फेयर सोसायटी के तत्वाधान में किया जा रहा था। इस संगठन का संस्थापक एक मुस्लिम जकी अहमद है। इस समारोह में हिंदू विवाह पद्धति सात फेरों, सात वचनों का मजाक बनाकर बिना दुल्हन के बारात लगाना, जय माला का विसर्जन आदि किया जाना था। हिंदू समाज के लोगों को इस षड्यंत्र की पूर्व जानकारी लगने और विरोध करने के कारण इसे निरस्त कर दिया गया। इस प्रकरण में विचारणीय बात यह है कि हिंदू परिवारों को तोड़ने की योजनाबद्ध साजिश के निर्माता भाई वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष जकी अहमद को उन मुस्लिम महिलाओं के उत्थान के लिए भी इस तरह का आयोजन करना चाहिए था, जिन्हें अमानवीय तीन तलाक व्यवस्था से मुक्ति मिली है। वह अपने अपनी महिला विरोधी कबीलायी परंपराओं पर भी प्रहार करते तब न्यायोचित लगता किंतु उन्होंने ऐसा न कर केवल हिन्दू परंपराओं को टारगेट किया।
इसी प्रकार करवा चौथ के नाम पर हुआ यह प्री आयोजन न धार्मिकता की झलक दिखा रहा था न ही अपने पतिओं की लंबी उम्र के लिए कोई आस्था का भाव ही इसमें दिखता है। आयोजनकार्ताओं के अनुसार यह आयोजन 'धार्मिक सौहार्द' बढ़ाने के उद्धेश्य से ही रखा गया था। यदि ऐसा है तो यह सौहार्द तभी सार्थक होता जबकि मुस्लिम महिलाएं भी इस व्रत को करतीं। वह भी हिंदू पुरुष से अपने शौहर के लिए लंबी उम्र का आशीर्वाद लेतीं। कितना अच्छा दृश्य और स्थिति होती जब हिंदू व मुस्लिम महिलाएं साथ में करवा चौथ का व्रत रखतीं, श्री गणेश की पूजा कर चंद्रमा को अर्घ्य देतीं और सुहागन का जोड़ा धारण करतीं। दुर्भाग्य है कि 'धार्मिक सौहार्द' बड़ाने ऐसा प्रयत्न कभी नही किया गया।
विडंबना यह है कि जिस मजहब में करवा चौथ तो दूर अपने चाचा, मामा, बुआ, मौसी, ताऊ की बेटी भी बहन नही मानी जाती ऐसे व्यक्ति सैकड़ों हिंदू महिलाओं का भाई बनकर 'सरगी देने' महिलाओं के बीच एक मात्र पुरुष आता है। जिस पर हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में धकेलने के आरोप हैं। क्या भोपाल में कोई महिला अतिथि नही बुलाई जा सकती थी..? चौकाने वाली बात यह है कि इस आयोजन में महिलाओं के पति भी शामिल नही हैं। सीधे तौर पर यह आयोजन हिंदू व्रत- परंपराओं का उपहास उड़ाता हुआ हिंदू महिलाओं की अस्मिता पर कालिख पोत रहा है।
इसी भोपाल के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो रानी कमलापति के द्वारा ली गयी जल समाधि से सबक लिया जा सकता है। दोस्त मोहम्मद ने रानी को बहन बनाया। मजबूरी का फायदा उठाकर अपना स्वार्थ सिद्ध होते ही अपनी दगाबाज दोस्त ने मुँह बोली बहन रानी को ही अपने हरम में रखना चाहा, लेकिन स्वाभिमानी, साहसी, पवित्र रानी ने अपने सतीत्व को बचाए रखने के लिए जल समाधि लेकर जौहर करना स्वीकारा। उन्होंने विधर्मी के प्रति आत्म समर्पण नही किया।
निवेदन है उन समस्त भारत की स्त्री शक्ति से कि अपने भारत की संस्कृति, परंपराओं को उनके मूल रूप में मनाएं। व्रत उपवास का मतलब सिर्फ मनोरंजन, मस्ती, मजाक, नृत्य, फैशन शो, सबसे सुंदर दिखने की प्रतिस्पर्धा, फोटो शूट जैसे दिखावा नही वरन यह तो आधार बिंदु हैं, अध्यात्म की अपनी शक्ति को जागृत कर नई चेतना के संचार के इस देश वैभवशाली बनाने व संस्कारों के बीजारोपण का।
करवा चौथ हो, नवरात्र का गरबा हो, होली हो, दिवाली हो उसके वास्तविक स्वरूप में मनानी चाहिए।धार्मिक सौहार्द्रता के लिए केवल हिंदू महिलाएं मोहरा व हिंदू परंपराएं कैनवास नही बननी चाहिए। सार्थकता इसमें है कि काले बुर्के की अंधियारी से बाहर आकर एक कदम मुस्लिम महिलाएं भी तो बढ़ाएं। बाहर की रंगीन दुनिया उनका बेसब्री से इंतजार कर रही है।