- मनोज जोशी
बालासाहब देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक अक्सर कहा करते थे कि "यदि छुआछूत पाप नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है।" बालासाहब केवल कहते थे ऐसा नहीं थे उसका अनुसरण भी करते थे। १९२५ में संघ की स्थापना हुई और १९२७ में वे संघ से जुड़े । आज से लगभग १०० साल पहले के भारत की कल्पना कीजिए , छुआछूत की कुप्रथा एकदम शिखर पर थी। लेकिन संघ की शाखा में सभी वर्गों के नवयुवक आते थे, कबड्डी और खो- खो जैसे खेल खेलते । यही नहीं अक्सर बालासाहब अपने साथ कुछ दलित नवयुवकों को घर ले आते और माँ से कहते कि "यह भी मेरे साथ ही भोजन करेंगे ।" फिर सब नवयुवक एकसाथ भोजन करते। उस दौर में यह बहुत बङी बात थी। आपको यह भी आश्चर्य होगा कि पूजा-पाठ और कर्मकांड से दूर ही रहते थे। यानी "रुढियों को तोङ दो, परम्पराएँ तोङ दो, जिसमें देश का भला न हो, वो हर काम छोङ दो।"
१९७3 से १९९४ तक वे संघ के सरसंघचालक रहे। १९७३ में श्री गुरुजी के देहान्त के बाद वे सरसंघचालक बने। इस पूरे कालखण्ड को देखेंगे तो यह भारी उथल - पुथल वाला समय था। आपातकाल, श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन और मंडल कमीशन । १९७५ में संघ पर प्रतिबंध के दौरान बालासाहब पुणे जेल में रहे। लेकिन आपातकाल और संघ पर प्रतिबंध को लेकर कोई कङवाहट न हो, इसके लिए उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा था - "भूलो और आगे बढो।"
मंडल कमीशन के समय देश में एक बार फिर जातिगत भेदभाव चरम पर था। उस दौरान संघ ने जाति आधारित आरक्षण के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। 'आरक्षण कब समाप्त होगा' इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा - "जब जातिगत भेदभाव के शिकार लोगों को लगने लगे कि आरक्षण की आवश्यकता नहीं रह गई है। उन्हें ही फैसला करना है।"
राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत में ही उन्होंने हिंदु शब्द की स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा था - " हिंदु शब्द किसी विशेष पूजा पद्धति या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। जो भी प्राचीन संस्कृति में आस्था रखता है, वह हिंदु है। हिंदु शब्द बहुत व्यापक है।"
संघ की शाखा के बारे में उन्होंने कहा था,- ''संघ की शाखा खेल खेलने अथवा कवायद (परेड) करने का स्थान मात्र नहीं है, अपितु सज्जनों की रक्षा का बिन बोले अभिवचन है। तरुणों को अनिष्ट व्यसनों से मुक्त रखने वाला संस्कार पीठ है। समाज पर अकस्मात् आने वाली विपत्तियों अथवा संकटों में त्वरित, निरपेक्ष सहायता मिलने का आशा केंद्र है। महिलाओं को निर्भयता तथा सभ्य आचरण का आश्वासन है। दुष्ट तथा देशद्रोही शक्तियों पर अपनी धाक स्थापित करने वाली शक्ति है, और सबसे प्रमुख बात यह है कि समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सुयोग्य कार्यकर्ता उपलब्ध कराने हेतु योग्य प्रशिक्षण देने वाला विद्यापीठ है।'' आज अगर आप संघ और समविचारी संगठनों द्वारा किए जा रहे कार्यों को देखेंगे तो उसमें बालासाहब का यही वक्तव्य आकार लेते नजर आता है।
उन्होंने संघ के भीतर कुछ परंपराओं की शुरुआत की। स्वयं बालासाहब , गुरुजी के निधन के बाद सरसंघचालक बने। लेकिन उन्होंने अपने जीवित रहते हुए सरसंघचालक नियुक्त करने की परम्परा शुरू की। उन्होंने अपने जीवित रहते हुए प्रो राजेन्द्र सिंह "रज्जू भैया" को सरसंघचालक नियुक्त किया। यह उस समय बहुत बङी बात मानी गई। एक और खास बात, रज्जू भैया संघ के पहले गैर मराठीभाषी सरसंघचालक बने। संघ के कार्यक्रमों में भारतमाता के साथ प्रथम और द्वितीय सरसंघचालक के फोटो रखे जाते रहे हैं, बालासाहब ने साफ कर दिया था कि उनके निधन के बाद उनका (बालासाहब का) चित्र न रखा जाए। प्रथम और द्वितीय सरसंघचालकों का दाहसंस्कार स्वयंसेवकों ने नागपुर के रेशिमबाग संघ कार्यालय में किया था। लेकिन बालासाहब ने निर्देश थे कि उनका अंतिम संस्कार सामान्य व्यक्ति की भांति श्मशान में किया जाए और उनकी समाधि भी नहीं बनाई जाए। १७ जून, १९९६ को उनका दुःखद निधन हुआ। बालासाहब का जन्म नागपुर में हुआ था, लेकिन मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले का कारंजा उनका पैतृक गांव है।