दुसरे की जान बच सके, इसलिए स्वयंसेवक ने दे दी अपनी बेड और जिंदगी

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    27-Apr-2021
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मुश्किल समय मानवता की परीक्षा लेता है. एक तरफ जहाँ दवाओं और ऑक्सीजन के कालाबाजारी, जमाखोरी की खबरें आ रही हैं, वहीँ दूसरी तरफ तमाम ऐसे लोग भी हैं जो मुश्किल समय में सहायता के लिए आगे आये हैं. कोई अपने फेसबुक के माध्यम से दवाइयां और बेड ढूंढने में लोगों की मदद कर रहा है तो किसी ने जरूरतमंद को ऑक्सीजन सिलिंडर देने के लिए अपने रोजी का एकमात्र साधन बेच दिया.
 
मानवता की ऐसी ही एक कहानी महाराष्ट्र के नागपुर से सामने आ रही है, जहाँ 85 वर्षीय संघ स्वयंसेवक नारायण भाऊराव दभाड़कर ने कोरोना संक्रमित एक व्यक्ति को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी. उन्होंने महर्षि दधिची के समान स्वयं का जीवन बलिदान कर एक व्यक्ति को अस्पताल में बेड दिलवाया. इस पूरी घटना को सेविका समिति की एक कार्यकर्ता शिवानी वाखारे ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से बताया है.
 

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फेसबुक पर यह घटना मूल रूप से मराठी में लिखी गई है जिसका हमने आपके लिए हिंदी में अनुवाद किया है. नारायण दभाड़कर आरएसएस के एक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज की सेवा करने में बिताया. महामारी की दूसरी लहर के बीच नारायण जी कोरोना से संक्रमित थे. जब उनका SPO2 स्तर गिरना शुरू हुआ तो उनकी बेटी ने शहर भर में बेड ढूँढना शुरू किया.
 
बहुत प्रयासों के बाद इंदिरा गांधी अस्पताल में उनके लिए एक बिस्तर मिला. उनके पोते जब उन्हें अस्पताल लेकर जा रहे थे तभी दभाड़कर काका को सांस लेने में परेशानी होने लगी थी. अस्पताल की औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए दोनों इंतजार कर रहे थे, तभी दभाड़कर काका ने 40 की उम्र की एक महिला को अपने बच्चों के साथ रोते हुए देखा. उस महिला का पति गंभीर हालत में था और वह बेड के लिए गिडगिडा रही थी.
 
यह देखकर बिना कुछ सोचे दभाड़कर काका ने उनका जांच कर रही मेडिकल टीम से कहा की आप मेरा बेड इस महिला के पति को दे दीजिये. उन्होंने कहा कि “मैं 85 साल का हूँ, मैंने अपनी जिंदगी जी ली है. आपको मेरी जगह इस आदमी को बेड देना चाहिए, इसके बच्चों को इसकी जरुरत है.”
उसके बाद उन्होंने अपनी बहु से कहा कि वो उनकी बेटी को फ़ोन कर इस निर्णय के बारे में बताने के लिए कहा. उनका निर्णय सुन कर पहले तो उनकी बेटी हैरान रह गई, लेकिन बहुत समझाने पर वह भी मान गयीं. इसके बाद दभाड़कर काका ने बिना किसी देर के कंसेंट फॉर्म पर हस्ताक्षर किये और अपना बेड उस आदमी को देकर, अपनी बहु से कहा कि उन्हें घर ले चले.
अगले तीन दिन बहादुरी से कोरोना का सामना करने के बाद दभाड़कर काका का स्वर्गवास हो गया.
दूसरों की सहायता के लिए बहुत लोग आते हैं लेकिन ऐसे विरले ही होते हैं जो किसी के लिए बेधड़क अपने प्राणों का बलिदान कर दें. संघ और भारतीय समाज का यही संस्कार है जो हमें विश्वास दिलाता है कि परेशानी चाहे कितनी बड़ी क्यूँ न हों, जब तक ऐसे दधिची इस समाज में हैं तब तक – हम लड़ेंगे और जीतेंगे