साहस के प्रतीक थे शंकर शाह और रघुनाथ शाह

12 Nov 2021 15:54:15

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शंकर शाह व रघुनाथ शाह गढ़ा-मंडला के गोंड साम्राज्य से थे। दोनों पिता-पुत्र गोंड जनजाति परिवार से थे। दोनों ने अंग्रेजों की नीतियों का ऐतिहासिक प्रतिकार किया। शंकर शाह द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध एक कविता लिखने के बाद अंग्रेज भड़क उठे और पिता-पुत्र दोनों को गिरफ्तार कर लिया। दोनों को अंग्रेजों ने 18 सितम्बर, 1857 को तोप से बाँधकर उड़ा दिया। शंकर शाह और रघुनाथ शाह के संघर्ष से वनवासी क्षेत्रों में स्वतंत्रता की अलख जगी। शंकर शाह के पूर्वजों ने 1500 वर्षों तक गोंडवाना पर राज्य किया था और विदेशी प्रभाव से बचाने के लिए उनके सभी पूर्वज भी सदैव युद्धरत रहे। सन् 1776 में गढ़ा राज्य के अन्तिम शासक निजाम शाह की मृत्यु के बाद उनके दोनों पुत्रों सुमेर शाह और नरहरि शाह में राज्य को लेकर पनपे मतभेदों के कारण उनकी रियासत पर 1784 में सागर के मराठों का अधिकार हो गया। इसके बाद सुमेर शाह को जटाशंकर के किला व नरहरि शाह को खुरई के किला में कैद करके रखा गया था।
गढ़ा राज्य का अस्तित्‍व समाप्‍त होने के बाद सुमेर शाह के पुत्र शंकर शाह को जबलपुर के पास मराठों द्वारा एक जागीर दे दी गयी। वहीं, इनके पुत्र रघुनाथ शाह को भी जागीर दी गई। शंकर शाह का महल पुरवा (जबलपुर के निकट गढ़ा-पुरवा) में था। उनके पास जागीर की कुल 947 बीघा जमीन थी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु 70 वर्ष और उनके पुत्र रघुनाथ शाह की आयु 40 वर्ष हो चुकी थी। वह अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ अंग्रेजों की जबलपुर छावनी पर हमले की योजना बना रहे थे, जिसकी भनक अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल क्लार्क को लग गई। इसके बाद उसने शंकर शाह व रघुनाथ शाह को गिरफ्तार करने के आदेश जारी कर दिया। 
अन्य संदर्भकारों का मानना है कि शंकर शाह के नौकर गिरधारी ने अंग्रेजों को उनके विरुद्ध भड़काया और अंग्रेजों ने उनके घर की तलाशी ली, जहाँ से अंग्रेजों के विरुद्ध लिखी कविता हाथ लग गई। हालांकि एक तीसरा मत यह भी है कि निम्नलिखित कविता शंकर शाह की कृति नहीं है। गिरधारी दास ने स्वयं एक कविता लिखकर या किसी अन्य से लिखवाकर उनके घर में रखवा दिया और तलाशी करवा दी।
मूंद मुख ​डंडिन को, चुगलों को चबाय खाई।
खूंद डार दुष्टन को, शत्रु-संहारिका।
मार अंगरेजन, रेज कर देय, मात चंडी।
बचौ नहीं बैरी, बाल-बच्चे संहारिका।
शंकर की रक्षा कर, दास प्रतिपाल कर।
दीन की पुकार सुन, जाय मात हालिका।
खाय लै मलेच्छन को, देर नहीं करौ माता।
भच्छन का, तत्छन वेग, शत्रुनको कालिका।
शंकर शाह व रघुनाथ शाह को 14 सितम्बर, 1857 को बंदी बनाकर लोहे की जंजीरों में बांधकर जबलपुर स्थित रीजेंसी हाउस के काल-कोठरी में कैद किया गया था। 18 सितम्बर को प​ति के बलिदान के बाद उनकी पत्नी रानी फूलकुंवरि ने अंग्रेजों से युद्ध किया। युद्ध के दौरान उन्होंने स्वयं को कटार भोंक लिया, लेकिन अंग्रेजों के हाथ नहीं आईं। 1857 संग्राम के दौरान शंकर शाह के नेतृत्‍व में जबलपुर क्रांतिकारियों का गतिविधि केन्द्र हो गया। इस बात के प्रमाण उपलब्ध हैं कि सितम्बर, 1857 के प्रारम्भ में, अंग्रेजी सेना में तैनात कुछ सैनिकों और ठाकुरों ने अंग्रेजों के विरुद्ध योजना बनाई थी और उन्हें शंकर शाह का नेतृत्व प्राप्त था। जबलपुर की 52वीं रेजीमेन्ट के कई सिपाही शंकर शाह के यहां आते रहते थे। शंकर शाह से बरखेड़ी के जगत सिंह का भी सम्पर्क हो गया था।
 
जबलपुर की 52वीं पल्टन के कुछ सिपाही अंग्रेजों के विरुद्ध थे। पल्टन के 8-10 सैनिकों ने यूरोपियनों को मार डालने की योजना बनाई, लेकिन इसकी भनक अंग्रेज अधिकारियों को लग गई, जिसके बाद 04 सितम्बर को उन क्रांतिकारियों को बंदी बनाकर तोप से उड़ा दिया गया। अंग्रेजों को सूचना मिली कि मुहर्रम के अंतिम दिन क्रांतिकारी हमला करने वाले हैं, जिसके बाद वे सतर्क हो गये और डिप्टी कमिश्नर ने क्रांतिकारियों की योजना के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करने के लिए 13 सितम्बर को फकीर के वेश में एक चपरासी भेजा और उनकी यह योजना सफल हुई, क्योंकि शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ ​शाह फकीर के वेश में अंग्रेजों के आदमी को पहचान नहीं पाये। उन्होंने बेझिझक अंग्रेजों के विरुद्ध बन रही अपनी योजना के बारे में जानकारी दे दी।
 
14 सितम्बर को डिप्टी कमिश्‍नर और ले. बाल्डविन 20 सवारों व 40 पुलिस के दल के साथ पुरया पहुंचे और राजा को घेर लिया। शंकर शाह, उनके पुत्र समेत 14 लोगों को बंदी बनाकर उनके घर की तलाशी हुई। वहां स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दस्तावेज मिले। तलाशी में अंग्रेजों को उपर्युक्त कविता हाथ लगी, ​जिसमें अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम छेड़ उन्हें मार भगाने की दहाड़ थी। यह कविता राजा के पलंग के पास रेशमी थैली में से अंग्रेज अधिकारी क्‍लार्क को हाथ लगी थी। शंकर शाह और उनके पुत्र को बचाने की कोशिश में 52वीं रेजीमेंट के सिपाही जुट गये, जिसकी भनक अंग्रेज अधिकारी को लग गई। जिसके बाद मद्रास रेजीमेन्ट पूरी रात सशस्त्र तैनात रही। दोनों को कमिश्नर के बंगले में रखा गया। उस रात 52वीं रेजीमेन्ट लाइन में गोलियां चलीं और लाइन के पास के एक बंगले में आग लगा दी गयी। 52वीं रेजीमेन्ट के 08 सैनिक अपने शस्त्रों सहित भाग गये।
 
अंग्रेजों ने शंकर शाह व रघुनाथ शाह को यूरोपियनों को खत्म करने की साजिश में आरोपी बनाया और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध साजिश का मुकदमा चलाया। इसके बाद अंग्रेजों ने 18 सितम्बर को पिता-पुत्र दोनों को एक साथ तोप में बांधकर नृशंसतापूर्वक उड़ा दिया। शंकर शाह और रघुनाथ शाह जैसे देशभक्‍तों को तोप से उड़ा देने की सजा पर टिप्पणी करते हुए चार्ल्‍स बाल लिखता है कि- 52वीं रेजीमेन्ट लाइन में अंग्रेजों के विरुद्ध उत्पन्न उत्तेजना को खत्म करने/डराने के लिए दोनों को फांसी देने के स्थान पर तोप से उड़ाया गया। विशेषकर उसने शंकर शाह पर टिप्पणी करते हुए लिखा- बूढ़ा आदमी दृढ़ता और अभिमानपूर्वक तोपों तक चलकर गया। दोनों क्रांतिकारियों को सार्वजिनक स्‍थान पर तोपों से उड़ाया गया। तोप से उड़ा देने के बाद रानी फूलकुंवरि ने अधजले अवशेषों को एकत्र किया। अंग्रेज अपने होठों पर तृप्त प्रतिशोध की मुस्कुराहट के साथ यह सब देख रहे थे। तोप से उड़ाते समय वहां उपस्थित एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है कि- ‘मैं अभी-अभी क्रांतिकारी राजा और उनके पुत्र को तोप से उड़ाये जाने का दृश्य देखकर वापस लौटा हूं। जब उन्हें तोप के मुंह पर बांधा जा रहा था तो उन्होंने प्रार्थना की कि भगवान उनके बच्चों की रक्षा करें ताकि वे अंग्रेजों को खत्म कर सकें।’
 
लोक में प्रचलित शंकर शाह-रघुनाथ शाह पर गीत
शंकर शाह पुत्र रघुनाथ शाह
तोपे मुहाड़ा सामुने राजा खड़े हैं बेटा संग में
हाय रे राजा खड़े हैं बेटा संग में।
डिपटी कमिसनर तोपासी से बोलाथै,
तोप चलाई दे, तोपासी का देखाथै
राजा द्रोही, राजा अपराधी हवय रे।
राजा खड़े हैं बेटा संग में
हाय रे राजा खड़े हैं बेटा संग में
तोपे मुहाड़ा सामुने राजा खड़े हैं बेटा संग में।
हाय रे......
सुन के वचन तोप चलावै थे 
तोप नाहीं चलै कैसे तोपासी घबड़ावै
राजा शंकर शाह सत्यवादी रे।
राजा खड़े हैं बेटा संग में हाय रे
राजा खड़े हैं बेटा संग में।
तोपे मुहाड़ा सामुने राजा खड़े हैं बेटा संग में।
हाय रे...
कैसे चलाऊँ तोप छाती थर्रावैथैं
दौड़े तो लेथहैं परजा भीड़ हटावैथै
क्रोधीत परजा भीड़ नाहीं हाटे रे।
राजा खड़े हैं बेटा संग में
हाय रे राजा खड़े हैं बेटा संग में ।
तोपे मुहाड़ा सामुने राजा खड़े हैं बेटा संग में।
हाय रे ...।
शंकर शाह राजा गरज के बोलाथैं
तोप चलाई दे तोपासी तैं का सोचथै
माला देवी हमरे सहाई हवय रे
राजा खड़े हैं बेटा संग में
हाय रे राजा खड़े हैं बेटा संग में
तोपे मुहाड़ा सामुने राजा खड़े हैं बेटा संग में हाय रे।
तोप चली जब काली आंधी आईगे
खिलखिल हांसे बेटा राजा मुस्काइगे
तड़प तड़प गोंडवाना रोय गई रे-
राजा खड़े हैं बेटा संग में
हाय रे राजा खड़े हैं बेटा संग में।
तोपे मुहाड़ा सामने राजा खड़े हैं बेटा संग में
हाय रे ...।
गोंडवाना दाई तोरे आजा शंकर शाह
पुरवागढ़ सूनी हवय आजा रघुनाथ शाह
प्रेम शाह शीश झुकाई दये रे
राजा खड़े हैं बेटा संग में
हाय रे राजा खड़े हैं बेटा संग में।
तोपे मुहाड़ा सामने राजा खड़े हैं बेटा संग में।
राजा खड़े हैं बेटा संग में
हाय रे…
 
शंकर शाह व उनके पुत्र रघुनाथ शाह का बलिदान 18 सितम्‍बर, 1857 को प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय, जबलपुर में हुआ था। सुमेर शाह के पिता निजाम शाह ने 1740 से 1746 तक मण्‍डला के किले से राज्‍य किया था। सुमेर शाह और नर‍हरि शाह दोनों ने 1776 से 1782 तक मण्‍डला के किले से राज्‍य किया। सन् 1780 में नरहरि शाह को कैद कर खुरई की जेल में डाल दिया गया, जहां उन्‍होंने अपनी अंतिम सांस 1789 को ली। सन् 1804 को राजा सुमेर शाह मृत्‍यु की गोद में समा गए। शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह का जन्‍म मण्‍डला के किले में हुआ था। 
संदर्भ पुस्‍तकें :-1857- मध्यप्रदेश के रणबांकुरे (डॉ. सुरेश मिश्र व भगवानदास श्रीवास्तव), शंकर शाह रघुनाथ शाह (संपादन- प्रो. दिलीप सिंह, स्‍वाधीनता के वीर योद्धा (संपादन- नन्‍द कुमार साय)
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