जीवन गढ़ने वाले गुरु अब कहाँ गये?

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    05-Sep-2026
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जीवन गढ़ने वाले गुरु अब कहाँ गये? 
 
 
आचार्य ललित मुनि
वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता
 
 
शिक्षक दिवस आते ही हर वर्ष विद्यालयों में कार्यक्रम होते हैं। शिक्षक सम्मानित होते हैं, विद्यार्थी उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और सोशल मीडिया पर गुरु के महत्व से जुड़े संदेशों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन इन औपचारिकताओं के बीच एक सवाल अक्सर अनुत्तरित रह जाता है कि जीवन गढ़ने वाले वे गुरु अब कहाँ गये, जिनकी छाया में विद्यार्थी केवल पढ़ता नहीं था, बल्कि जीवन जीना भी सीखता था?
 
 
यह सवाल आज के शिक्षकों पर कोई आरोप नहीं है। बल्कि यह सवाल हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था से है। आज भी देश के हजारों शिक्षक ऐसे हैं, जो सीमित संसाधनों के बीच विद्यार्थियों के जीवन में उम्मीद जगाते हैं, उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं और अपने विद्यार्थियों की सफलता को अपनी सफलता मानते हैं। फिर भी शिक्षा का बदलता स्वरूप हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि शिक्षक की भूमिका कहीं पाठ्यक्रम पूरा करने, परीक्षा परिणाम सुधारने और प्रशासनिक दायित्व निभाने तक तो सीमित नहीं होती जा रही है।
 
 
भारतीय परंपरा में गुरु का अर्थ केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं था। गुरु वह था जो अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाए, जो विद्यार्थी को केवल यह न बताए कि क्या पढ़ना है, बल्कि यह भी समझाए कि जीवन में क्या सही है और क्या गलत। इसलिए हमारे यहां गुरु का स्थान माता पिता के समान ही महत्वपूर्ण माना गया। ‘आचार्य देवो भव’ केवल एक धार्मिक वाक्य नहीं था, बल्कि समाज की उस सोच का प्रतीक था जिसमें शिक्षक को चरित्र निर्माण की केंद्रीय भूमिका दी गई थी।
 
 
हमारी स्मृतियों में ऐसे अनेक शिक्षक हैं, जिन्होंने पुस्तकों से अधिक अपने आचरण से विद्यार्थियों को शिक्षा दी। चाणक्य ने केवल चंद्रगुप्त को राजनीति नहीं सिखाई, बल्कि उसे एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि दी। रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्रनाथ के भीतर छिपे विवेकानंद को पहचानने का काम किया। महर्षि दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ ठाकुर और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे व्यक्तित्वों ने शिक्षा को केवल परीक्षा और रोजगार का माध्यम नहीं माना।
 
 
असल शिक्षा वही थी, जिसमें शिक्षक विद्यार्थी की प्रतिभा को पहचानता था। वह यह समझने का प्रयास करता था कि सामने बैठा बच्चा किस दिशा में आगे बढ़ सकता है। किसी विद्यार्थी की कमजोरी को देखकर उसे हतोत्साहित करने के बजाय उसके भीतर की संभावना को पहचानना शिक्षक की बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती थी।
 
 
आज परिस्थितियां बदल गई हैं। कक्षा में ब्लैकबोर्ड की जगह स्मार्ट बोर्ड आ गया है। किताबों के साथ मोबाइल और इंटरनेट ने ज्ञान के अनगिनत रास्ते खोल दिए हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में विद्यार्थी कुछ ही क्षणों में किसी विषय की जानकारी प्राप्त कर सकता है। ऐसे समय में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि यदि सूचना मशीन दे सकती है, तो फिर शिक्षक की वास्तविक भूमिका क्या है? यहीं शिक्षक और गुरु का अंतर सामने आता है।
 
 
सूचना दी जा सकती है, लेकिन विवेक नहीं दिया जा सकता। उत्तर खोजा जा सकता है, लेकिन सही प्रश्न पूछना नहीं सिखाया जा सकता। ज्ञान इंटरनेट से मिल सकता है, लेकिन ज्ञान का उपयोग कब, कैसे और किस उद्देश्य से करना है, यह जीवन अनुभव और मार्गदर्शन से ही सीखा जाता है। इसलिए तकनीक शिक्षक की भूमिका को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे और महत्वपूर्ण बनाती है।
 
 
दुर्भाग्य यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक स्वयं अनेक प्रकार के दबावों से घिरा हुआ है। उसे पढ़ाना है, परीक्षा परिणाम देना है, अनेक प्रकार के रिकॉर्ड तैयार करने हैं, ऑनलाइन पोर्टल भरने हैं, विभिन्न प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभानी हैं और बदलती शैक्षिक नीतियों के साथ स्वयं को लगातार अद्यतन रखना है। ऐसे में उसके पास विद्यार्थी के साथ बैठकर उसकी समस्या सुनने, उसके मन को समझने और उसके व्यक्तित्व को पहचानने का समय कितना बचता है? हमने शिक्षक से अपेक्षाएं तो बहुत बढ़ा दीं, लेकिन क्या उसे शिक्षक की तरह काम करने का पर्याप्त अवसर भी दिया?
 
 
आज एक शिक्षक को विद्यार्थी की कॉपी जांचने से लेकर उसके डिजिटल रिकॉर्ड तक की चिंता करनी पड़ती है। दूसरी ओर विद्यार्थी भी बदल गया है। उसके सामने सूचना के अनेक स्रोत हैं। उसके आदर्श अब केवल विद्यालय और परिवार से तय नहीं होते। सोशल मीडिया, इंटरनेट, मनोरंजन उद्योग और डिजिटल दुनिया उसके विचारों को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में शिक्षक की भूमिका और कठिन हो गई है।
 
 
उसे केवल पाठ पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि संवाद करने वाला बनना होगा। उसे विद्यार्थी को यह सिखाना होगा कि सूचना की भीड़ में सत्य को कैसे पहचाना जाए, सफलता और जीवन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए और प्रतिस्पर्धा के बीच संवेदनशील मनुष्य कैसे बने रहा जाए। लेकिन इसके लिए शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास का संबंध जरूरी है।
 
 
पहले विद्यार्थी अपने शिक्षक से केवल विषय संबंधी प्रश्न नहीं पूछता था। वह अपने जीवन की उलझनें भी साझा करता था। शिक्षक कई बार परिवार और समाज के बीच एक सेतु की भूमिका निभाता था। आज यह रिश्ता कमजोर हुआ है। इसके लिए केवल शिक्षक को दोष देना उचित नहीं होगा। अभिभावकों की अपेक्षाएं, शिक्षा का बढ़ता व्यावसायीकरण, परीक्षा केंद्रित सोच और समाज में सफलता की बदलती परिभाषा, इन सबने मिलकर शिक्षा के स्वरूप को प्रभावित किया है।
 
 
हमने बच्चे से पूछा कि वह कितने अंक लाया, लेकिन यह पूछना भूल गये कि उसने क्या सीखा। हमने शिक्षक से पूछा कि परिणाम कितना आया, लेकिन यह पूछना भूल गये कि उसके विद्यार्थियों में कितने अच्छे मनुष्य बने। यही हमारी शिक्षा की सबसे बड़ी विडंबना है।
 
 
शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं हो सकता। रोजगार आवश्यक है, लेकिन मनुष्य का निर्माण उससे बड़ा उद्देश्य है। यदि अत्यधिक पढ़ा लिखा व्यक्ति संवेदनहीन है, अपने समाज और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार नहीं है, अपने माता पिता और बुजुर्गों का सम्मान नहीं करता, अपने अधिकारों को तो जानता है लेकिन अपने कर्तव्यों को भूल जाता है, तो हमें अपनी शिक्षा के उद्देश्य पर पुनर्विचार करना होगा। और यहीं गुरु की जरूरत सामने आती है।
 
 
आज हमें पुराने समय को हूबहू वापस लाने की आवश्यकता नहीं है। समय बदल चुका है और शिक्षा भी बदलेगी। डिजिटल शिक्षा होगी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आएगी, नई तकनीकें आएंगी और सीखने के तरीके बदलेंगे। लेकिन इन बदलावों के बीच एक चीज नहीं बदलनी चाहिए, वह है मानवीय मार्गदर्शन।
 
 
एक मशीन विद्यार्थी को उत्तर दे सकती है, लेकिन उसके भीतर सही और गलत के बीच चुनाव करने की नैतिक शक्ति नहीं पैदा कर सकती। एक डिजिटल मंच जानकारी दे सकता है, लेकिन असफल होने पर विद्यार्थी के कंधे पर हाथ रखकर यह नहीं कह सकता कि फिर से प्रयास करो। एक किताब ज्ञान दे सकती है, लेकिन विद्यार्थी की आंखों में छिपी निराशा को देखकर उसकी पीड़ा समझने वाला कोई संवेदनशील मनुष्य ही होगा।
 
 
वह मनुष्य शिक्षक हो सकता है और जब शिक्षक अपने विषय से आगे बढ़कर विद्यार्थी के जीवन को दिशा देता है, तभी वह गुरु बनता है। इसलिए शिक्षक दिवस पर हमें केवल शिक्षकों को पुष्प और उपहार देने की औपचारिकता नहीं निभानी चाहिए। हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था शिक्षक को गुरु बनने की स्वतंत्रता दे रही है?
 
 
शायद ‘जीवन गढ़ने वाले गुरु’ कहीं गये नहीं हैं। जरूरत उन्हें खोजने की नहीं, बल्कि उनके काम को पहचानने और शिक्षा व्यवस्था में उनके लिए जगह बनाने की है। शिक्षक दिवस हमें इसी आत्ममंथन का अवसर देता है। गुरु का युग समाप्त नहीं हुआ है। प्रश्न यह है कि क्या हमने अपने समय में गुरु की भूमिका को समझना बंद कर दिया है?
 
 
यदि शिक्षा का लक्ष्य केवल अच्छे अंक, अच्छी नौकरी और बेहतर वेतन तक सीमित रहेगा, तो शिक्षक एक प्रशिक्षक बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि शिक्षा का लक्ष्य जिम्मेदार, संवेदनशील, विवेकशील और संस्कारित मनुष्य का निर्माण है, तो शिक्षक फिर से गुरु की भूमिका में दिखाई देगा।