भाषाई द्वंद्व और लोक भाषा का लोक-कल्याणकारी मार्ग

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    30-Sep-2026
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भाषाई द्वंद्व और लोक भाषा का लोक-कल्याणकारी मार्ग
 
 
-लोकेंद्र शर्मा
 
 
आज फेसबुक और सोशल मीडिया पर लिखने वाले हर लेखक के सामने एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती भाषा के चयन की है। हमारा पाठक वर्ग वैचारिक और भाषाई स्तर पर स्पष्ट रूप से बँटा हुआ है। एक तरफ हमारे प्रबुद्ध विद्वान और वैचारिक मित्र हैं, विशेषकर संघ के कार्यकर्ता, जिन्हें शुद्ध, संस्कृतनिष्ठ हिंदी पढ़ना पसंद है। दूसरी तरफ हमारी आम जनता और आज की नई पीढ़ी है, जो इंस्टाग्राम की शॉर्टकट भाषा की आदी है और कठिन हिंदी देखकर तुरंत पोस्ट को आगे बढ़ा देती है। ऐसी स्थिति में यदि लेखक संवाद बनाए रखने के लिए लोक-प्रचलित उर्दू, फ़ारसी या अंग्रेज़ी का कोई एक शब्द भी लिख दे, तो कुछ प्रबुद्ध पाठक तुरंत भाषा की शुद्धता का आग्रह करने लगते हैं। इसके विपरीत, यदि लेखक अत्यधिक कठिन और अपरिचित हिंदी का उपयोग करे, तो युवा वर्ग लेख से दूर भाग जाता है। इस संकट का समाधान खोजने के लिए हमें भाषा के व्यावहारिक और लचीले रूप को समझना होगा।
 
 
इस भाषाई द्वंद्व का सबसे सुंदर समाधान हमें इतिहास की एक प्रसिद्ध घटना में मिलता है। त्रेतायुग की पावन रामकथा महर्षि #वाल्मीकि ने अत्यंत गरिमापूर्ण और शास्त्रीय देववाणी संस्कृत में लिखी थी। मध्यकाल तक आते-आते संस्कृत महलों और कुछ गिने-चुने विद्वानों के शास्त्रार्थ तक ही सीमित होकर रह गई। उस समय भारत की आम जनता को अपने आराध्य की कथा अपनी ही सहज भाषा में चाहिए थी। गोस्वामी #तुलसीदास जी ने युग की इस नब्ज को पहचाना और उन्होंने काशी के प्रकांड पंडितों के घोर विरोध की परवाह न करते हुए रामकथा को लोक-भाषा अवधी में लिखने का साहसिक निर्णय लिया। उस समय पंडितों ने तमाम तर्क दिए कि देववाणी की पवित्र कथा को लोक-बोली में लिखकर तुलसीदास जी भाषा को दूषित कर रहे हैं, किंतु तुलसी का उद्देश्य पांडित्य प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि लोक-कल्याण था।
 
 
उन्होंने रामचरितमानस की रचना की और परिणाम यह हुआ कि रामकथा महलों से निकलकर भारत के घर-घर और जन-जन के कंठ का हार बन गई। यदि तुलसीदास जी ने उस समय विद्वानों के वैचारिक हठ के सामने घुटने टेक दिए होते, तो आज हमारी सांस्कृतिक चेतना आम लोगों तक इतनी गहराई से न पहुँच पाती। इससे भी बड़ी बात यह है कि तुलसीदास जी ने भाषा में कोई कृत्रिम शुद्धता का दुराग्रह नहीं रखा। वे जानते थे कि जो शब्द जनता के दिल में उतर चुके हैं, वे अब लोक के हो चुके हैं। इसीलिए उन्होंने रामचरितमानस जैसे पवित्र ग्रंथ में ग़रीब नवाज़, साहब, दरबार, कागद और बाज़ार जैसे अरबी-फ़ारसी मूल के शब्दों का अत्यंत सहजता से प्रयोग किया। जब लोक को जोड़ने के लिए साक्षात बाबा तुलसी शब्दों का यह लचीलापन दिखा सकते हैं, तो आज के रचनाकारों को इसमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए।
 
 
इस समस्या को हम एक सीधे और व्यावहारिक उदाहरण से समझ सकते हैं।
एक शब्द है #कफ़न, जो मुंशी प्रेमचंद की कहानी और सदियों के लोक-व्यवहार के कारण हर भारतीय के अवचेतन में बैठा हुआ है। यह शब्द सुनते ही मन में जीवन की नश्वरता का चित्र सहज ही उभर आता है।
 
 
 
अब मान लीजिए, कोई लेखक फेसबुक पर जीवन की क्षणभंगुरता पर एक गंभीर लेख लिख रहा है और वह शुद्धतावादियों को खुश करने के लिए कफ़न शब्द हटाकर उसकी जगह शुद्ध तत्सम शब्द #शव_वस्त्र या #मरण_वस्त्र लिख देता है। इसका परिणाम यह होगा कि मरण-वस्त्र जैसे शब्द आम बोलचाल में पूरी तरह अप्राकृतिक होने के कारण पाठक के भाषाई प्रवाह को तुरंत तोड़ देंगे। कुछ लोग इसके विकल्प के रूप में अंतिम वस्त्र या अशुभ वस्त्र का सुझाव दे सकते हैं, लेकिन हमारी संस्कृति में मृत्यु अमंगल नहीं है, इसलिए इसे अशुभ वस्त्र कहना वैचारिक रूप से पूरी तरह गलत होगा। वहीं अंतिम वस्त्र से पाठक भ्रमित हो सकता है कि बात उस धोती-कुर्ते की हो रही है जो अंतिम संस्कार में पहनाई जाती है, न कि उस चादर की जो शव पर ओढ़ाई जाती है। इस तरह केवल एक शब्द की कृत्रिम शुद्धता के चक्कर में लेख का पूरा प्रभाव और उसकी आत्मा ही नष्ट हो जाती है।
 
 
यही कारण है कि एक चतुर लेखक को अपनी भाषा को इतना लचीला बनाना चाहिए कि संदेश भी पाठक तक पहुँच जाए और भाषा पर कोई अनावश्यक विवाद भी न हो। इसके लिए कुछ बहुत ही सुंदर और सरल तरीके अपनाए जा सकते हैं। पहला तरीका यह है कि यदि कफ़न शब्द खटक रहा है और शव-वस्त्र कठिन लग रहा है, तो शब्द के जाल से बाहर निकलकर पूरे वाक्य को ही बदल दिया जाए। लेखक वाक्य को इस तरह घुमाकर लिख सकता है कि मृत्यु के बाद मनुष्य अपने साथ शरीर ढकने का एक टुकड़ा कपड़ा भी नहीं ले जा सकता। इस सरल वाक्यांश पर समाज के किसी भी वर्ग को कोई आपत्ति नहीं होगी। दूसरा तरीका यह है कि हम अपनी लोक बोलियों के उन सांस्कृतिक और आंचलिक रूपकों को चुनें जो मिट्टी की सोंधी खुशबू लिए होते हैं। जैसे कफ़न के स्थान पर अंतिम यात्रा की सफेद चादर या रामनामी चादर का प्रयोग करना बहुत प्रभावी होता है, क्योंकि यह शैली साहित्यिक भी लगती है और सर्वस्वीकार्य भी होती है। तीसरा तरीका कोष्ठक पद्धति का है, जहाँ कठिन हिंदी शब्द लिखना लेखक की तकनीकी मजबूरी हो, वहाँ बगल में ब्रैकेट में प्रचलित शब्द लिख दिए जाएं, जैसे क्रियान्वयन के साथ कोष्ठक में इंप्लीमेंटेशन या अतिथि-सत्कार के साथ मेहमानी लिख देने से दोनों वर्ग संतुष्ट रहते हैं।
 
 
इसके साथ ही, लेखक को समय-समय पर अपने पाठकों को भी बहुत आदरपूर्वक यह समझाना होगा कि भाषा का मूल उद्देश्य क्या है। विद्वान वर्ग को यह समझना होगा कि यदि हम हिंदी को बहुत अधिक कठिन, रूढ़ और संकीर्ण बना देंगे, तो हमारी नई पीढ़ी पूरी तरह अंग्रेज़ी की गुलाम हो जाएगी। विचार की हत्या करके शब्दों की कृत्रिम शुद्धता बचाना किसी भी समाज के लिए बुद्धिमानी नहीं है। वहीं दूसरी ओर, हमें अपनी नई पीढ़ी को भी यह विश्वास दिलाना होगा कि १५ सेकंड की सोशल मीडिया रील्स से केवल तात्कालिक मनोरंजन मिल सकता है, लेकिन बौद्धिक गहराई, करियर की ऊंचाइयाँ और जीवन की वास्तविक समझ केवल गंभीर पठन से ही आ सकती है।
 
 
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भाषा कोई तिजोरी में बंद करके रखने वाला पत्थर नहीं है, बल्कि वह एक बहती हुई जीवनदायिनी नदी है। नदी को यदि नहर की तरह जबरन सीमाओं में बांधा जाएगा, तो उसका प्रवाह रुक जाएगा और वह सूख जाएगी। लेखक का वास्तविक धर्म पांडित्य प्रदर्शन करना या किसी एक वर्ग विशेष को रिझाना नहीं, बल्कि लोक-कल्याण की भावना से अपने विचारों को जन-जन तक सुलभ बनाना है।
 
 
अतः, आज के इस भाषाई संक्रमण काल में लेखन के भीतर वाल्मीकि की गरिमा और तुलसी की सहजता का सुंदर समन्वय कर लेना ही सबसे सटीक, व्यावहारिक और शाश्वत समाधान है।