दीपक कुमार द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
भारत में लोकतंत्र को केवल पाँच वर्ष में एक बार मत देने की व्यवस्था समझ लेना शायद हमारी सबसे बड़ी भूलों में एक है। मतदान लोकतंत्र का एक आवश्यक अंग है, स्वयं लोकतंत्र नहीं। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ तब प्रकट होता है जब शासन और समाज के बीच संवाद बना रहे, जब राज्य को यह पता हो कि समाज के भीतर क्या चल रहा है, गाँव की चिंता क्या है, नगर की समस्या क्या है, किसान क्या चाहता है, विद्यार्थी किस कठिनाई से गुजर रहा है, व्यापारी किस नीति से परेशान है, शिक्षक किस परिवर्तन की अपेक्षा कर रहा है, किसी सामाजिक वर्ग में कौन-सी बेचैनी जन्म ले रही है और किसी नीति के बारे में समाज में कौन-सी गलतफहमी फैल रही है। सरकार को यह जानकारी चुनाव के समय नहीं, शासन के प्रत्येक दिन मिलनी चाहिए। जिस शासन के पास समाज की नब्ज जानने का विश्वसनीय तंत्र नहीं होता, वह धीरे-धीरे अपने ही बनाए हुए सूचना-कक्ष में बंद हो जाता है।
यहीं से संवादहीनता जन्म लेती है। संवादहीनता से पहले गलतफहमी पैदा होती है, फिर अफवाह चलती है, फिर विरोध बढ़ता है और अंततः वही विषय भीड़ के हाथ में चला जाता है जिसे समय रहते दो घंटे के गंभीर संवाद से समझाया जा सकता था। लोकतंत्र में भीड़ की आवाज और समाज की सम्मतिपूर्ण आवाज एक नहीं होती। भीड़ तत्काल प्रतिक्रिया देती है; समाज अनुभव, परंपरा, हित और भविष्य को साथ रखकर विचार करता है। जब संस्थागत संवाद कमजोर पड़ता है तो भीड़ तंत्र के लिए स्थान बनता है। यही किसी भी लोकतांत्रिक शासन के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है।
आज भारत में इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि सरकार के पास समाज की वास्तविक स्थिति जानने का अपना स्वतंत्र, प्रत्यक्ष और निरंतर तंत्र क्यों नहीं होना चाहिए। सरकार के पास खुफिया सूचनाएँ हैं, प्रशासनिक रिपोर्ट हैं, चुनावी आँकड़े हैं, सर्वेक्षण हैं, मीडिया है, सोशल मीडिया है और अनेक प्रकार के संस्थागत स्रोत हैं; लेकिन इन सबके बावजूद एक ऐसा व्यवस्थित राष्ट्रीय Feedback Mechanism दिखाई नहीं देता जिसमें समाज स्वयं नीति-निर्माण से पहले, नीति बनते समय और नीति लागू होने के बाद सरकार को अपने अनुभव, सुझाव, अध्ययन और आपत्तियाँ सीधे पहुँचा सके और सरकार भी यह बताए कि उसने उस Feedback का क्या किया।
यह कमी केवल वर्तमान सरकार की समस्या नहीं है। यह भारतीय शासन-व्यवस्था की व्यापक संरचनात्मक समस्या है। किंतु जिस सरकार के पास आज इतना मजबूत जनादेश, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक स्थिरता है, उसके सामने इसे बदलने का अवसर भी सबसे बड़ा है। विशेषकर भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान सरकार के लिए यह व्यवस्था इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है कि वह स्वयं भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि, राष्ट्रबोध और समाज-आधारित शासन की बात करती रही है। यदि शासन की दिशा समाज से जुड़ती है तो यह वैचारिक आग्रह संस्थागत रूप भी प्राप्त कर सकता है।
भारत को केवल आधुनिक Western Nation-State की कसौटी पर समझना पर्याप्त नहीं है। भारत की सभ्यता आधुनिक Nation-State से हजारों वर्ष पुरानी है। यहाँ राज्य केवल भूभाग पर शासन करने वाली सत्ता नहीं रहा; राजा का औचित्य प्रजा के संरक्षण, लोकव्यवस्था और धर्माधिष्ठित राजधर्म से जुड़ा रहा। भारतीय चिंतन में ‘राष्ट्र’ केवल प्रशासनिक सीमा का नाम नहीं है। भूमि, जन, संस्कृति, स्मृति, परंपरा, धर्म, कर्तव्य और साझा जीवनबोध मिलकर उस व्यापक राष्ट्रचेतना का निर्माण करते हैं जिसे आधुनिक राजनीतिक शब्दावली में पूरी तरह बाँधना कठिन है।
इसीलिए भारत में लोकतंत्र का अर्थ भी केवल Democracy का यांत्रिक अनुवाद नहीं है। Democracy की आधुनिक पश्चिमी अवधारणा का अपना ऐतिहासिक विकास है; भारतीय लोकतांत्रिक चेतना का आधार अलग सामाजिक और दार्शनिक अनुभवों में दिखाई देता है। यहाँ ‘लोक’ केवल मतदाता नहीं है। लोक वह जीवित समाज है जिसकी परंपरा, अनुभव, मर्यादा, आवश्यकता और सामूहिक बुद्धि शासन के लिए महत्त्व रखती है। ‘तंत्र’ केवल शासन की मशीनरी नहीं है; वह लोक के साथ चलने वाली व्यवस्था हो तो ही लोकतंत्र सार्थक होता है। लोक से कटकर तंत्र शक्तिशाली हो सकता है, किंतु लोकतांत्रिक नहीं।
वेदों में सभा और समिति के उल्लेख इस बात के प्राचीन संकेत हैं कि शासन के प्रश्नों पर विचार-विमर्श के संस्थागत रूप भारतीय राजनीतिक परंपरा में विद्यमान थे। भारत सरकार के प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग के एक प्रकाशन में ऋग्वेद और अथर्ववेद में सभा तथा समिति के संदर्भों का उल्लेख करते हुए सभा को वरिष्ठजनों की संस्था और समिति को व्यापक जनसभा के रूप में व्याख्यायित किया गया है। उसी अध्ययन में ऋग्वैदिक राजा के समिति में उपस्थित होने तथा निर्णय-प्रक्रिया में उसके महत्व का उल्लेख मिलता है।
यहाँ सावधानी आवश्यक है। आधुनिक Parliament और वैदिक सभा को एक ही संस्था कहना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। लेकिन यह कहना भी उतना ही अनुचित होगा कि भारत की प्राचीन राजनीतिक परंपरा में शासन और समाज के बीच संवाद की कोई अवधारणा नहीं थी। भारतीय परंपरा का अपना राजनीतिक व्याकरण था।
यजुर्वेद में ‘नमः सभाभ्यः सभापतिभ्यश्च’ जैसा उल्लेख सभा और उसके अध्यक्ष दोनों के प्रति सम्मान की भावना व्यक्त करता है। भारतीय राजनीतिक परंपरा में निर्णय केवल राजा की निजी इच्छा का परिणाम नहीं माना गया। राजधर्म का मूल ही यह था कि राजा स्वयं को व्यवस्था का स्वामी नहीं, संरक्षक समझे।
मनुस्मृति के राजधर्म अध्याय में राजा को मंत्रियों के साथ निरंतर विचार-विमर्श करने का निर्देश मिलता है। अध्याय 7 के श्लोक 55-56 में स्पष्ट भाव है कि बड़ा कार्य अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता और राजा को मंत्रियों के साथ सामान्य नीति, संधि-विग्रह, राज्य की स्थिति, आय-व्यय, सुरक्षा आदि विषयों पर विचार करना चाहिए। श्लोक 146 में प्रजा का अभिवादन करने और उसके बाद मंत्रियों के साथ विचार करने का क्रम मिलता है।
अर्थशास्त्र की परंपरा भी शासन को सूचना, मंत्रीपरिषद, परीक्षण, परामर्श और प्रशासनिक विवेक से जोड़ती है। प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन पर प्रकाशित शोध में अर्थशास्त्र, मनुस्मृति, महाभारत और शुक्रनीतिसार के आधार पर भारतीय राजव्यवस्था में राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, सेना और मित्र जैसे परस्पर संबद्ध अंगों का वर्णन किया गया है। अर्थात शासन को एक जीवित शरीर की तरह देखा गया, जिसमें केवल राजा ही पूरा शरीर नहीं है।
रामायण में भी राम का आदर्श एक ऐसे राजा का है जो अकेले अपने मन से राज्य नहीं चलाता। रामराज्य की कल्पना का केंद्र केवल समृद्धि नहीं, प्रजा की संतुष्टि, न्याय और राजधर्म है। महाभारत में विदुरनीति से लेकर भीष्म के राजधर्म तक शासन के लिए परामर्श, आत्मसंयम, योग्य मंत्रियों और प्रजा के हित की निरंतर चिंता दिखाई देती है। पुराणों की राजधर्म परंपरा में भी राजा की सफलता को प्रजा के सुख और धर्मरक्षा से जोड़ा गया है। भारतीय शासन-दृष्टि का यह मूल सूत्र था कि राजा के लिए प्रजा केवल करदाता नहीं थी; प्रजा ही उसके राजधर्म की कसौटी थी आज की भाषा में कहें तो प्रजा का Feedback राजा के लिए शासन का दर्पण था।
फिर प्रश्न यह है कि आधुनिक भारत में वह दर्पण कहाँ है?
भारत ने स्वतंत्रता के बाद एक विशाल प्रशासनिक राज्य बनाया। संविधान ने संघ, राज्य और स्थानीय संस्थाओं के बीच शक्तियों का विभाजन किया। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक आधार मिला और भारत की शासन-व्यवस्था को स्थानीय स्वशासन की तीसरी परत प्राप्त हुई। पंचायती राज मंत्रालय स्वयं भारत को संघ, राज्य और स्थानीय स्वशासन इन तीन स्तरों वाली शासन-व्यवस्था के रूप में वर्णित करता है।
लेकिन संवैधानिक व्यवस्था और वास्तविक शक्ति-संरचना में अंतर है। ग्रामसभा को संविधान के अनुच्छेद 243A के अंतर्गत स्थानीय स्तर पर शक्तियाँ और कार्य दिए जा सकते हैं, पर उनका वास्तविक स्वरूप राज्य के कानून पर निर्भर है। पंचायतों की वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता भी अनेक राज्यों में सीमित है।
भारत की एक बड़ी विडंबना यही है कि जिस देश में 2011 की जनगणना के अनुसार 68.8 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती थी, वहाँ नीति-निर्माण का बड़ा हिस्सा ऊपर से नीचे आता है। 2011 में भारत की ग्रामीण आबादी 83.31 करोड़ और शहरी आबादी 37.71 करोड़ थी।
एक ही देश के दो गाँवों की समस्याएँ एक जैसी नहीं हैं। एक गाँव में सिंचाई सबसे बड़ी समस्या हो सकती है, दूसरे में वनाधिकार, तीसरे में पलायन, चौथे में विद्यालय, पाँचवें में पशुपालन और छठे में परंपरागत जलस्रोत। एक नगर में यातायात संकट है तो दूसरे में पेयजल; किसी पहाड़ी क्षेत्र की समस्या मैदान से अलग है और किसी जनजाति अंचल की सामाजिक संरचना महानगर से बिल्कुल अलग। फिर एक केंद्रीय नीति को हर जगह समान रूप से लागू करके यह अपेक्षा करना कि वह हर स्थान पर समान परिणाम देगी, प्रशासनिक सुविधा तो हो सकती है, समाज की वास्तविकता नहीं।
भारत में आवश्यकता Centralisation की नहीं, Coordination के साथ Decentralisation की है।
केंद्र को राष्ट्रीय विषयों पर मजबूत रहना चाहिए, राज्य को अपने क्षेत्र की विशिष्टताओं पर और ग्राम तथा नगर को अपने स्थानीय जीवन से जुड़े निर्णयों पर अधिक अधिकार मिलना चाहिए। पंचायत के पास केवल नाली, सड़क और प्रमाणपत्र की जिम्मेदारी हो और नीति का वास्तविक अधिकार ऊपर रहे, तो उसे स्वशासन कहना अधूरा होगा।
पंचायतों को स्थानीय न्याय, स्थानीय योजना और पर्याप्त स्थानीय राजस्व जुटाने की वैधानिक शक्ति देने पर गंभीर पुनर्विचार होना चाहिए। इसका अर्थ संविधान से ऊपर कोई समानांतर न्याय-व्यवस्था खड़ी करना नहीं है, बल्कि ग्राम स्तर पर छोटे विवादों, सामुदायिक संसाधनों, स्थानीय नियमों और विकास संबंधी निर्णयों के लिए वैधानिक, पारदर्शी और न्यायिक निगरानी के भीतर संस्थागत अधिकार विकसित करना है। संविधान का अनुच्छेद 243H पंचायतों को कर, शुल्क और निधियों से संबंधित अधिकार देने की व्यवस्था की अनुमति देता है; प्रश्न यह है कि इन संवैधानिक संभावनाओं को वास्तविक शक्ति में कितना बदला गया है।
यहाँ भारतीय परंपरा आधुनिक शासन को एक महत्वपूर्ण संकेत देती है निर्णय जितना जीवन के निकट होगा, उतना ही उसमें स्थानीय अनुभव का स्थान बढ़ना चाहिए।
लेकिन केवल पंचायत को अधिकार देने से समस्या हल नहीं होगी। आज भारत को एक ऐसी राष्ट्रीय Feedback व्यवस्था चाहिए जो ऊपर और नीचे दोनों दिशाओं में चले।
मान लीजिए किसी मंत्रालय ने कोई नई शिक्षा नीति, विश्वविद्यालय संबंधी विनियम, परीक्षा व्यवस्था या छात्रवृत्ति नियम तैयार किया। सामान्यतः सूचना आती है, विरोध शुरू होता है, सोशल मीडिया पर बहस होती है, राजनीतिक दल प्रतिक्रिया देते हैं, फिर सरकार स्पष्टीकरण देती है। यदि मामला बढ़ जाए तो आंदोलन होता है और उसके बाद सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना पड़ता है। यह शासन का प्रतिक्रियात्मक मॉडल है।
इसके स्थान पर एक दूसरा मॉडल हो सकता है।
नीति बनने से पहले सरकार पूछे—समाज इस विषय पर क्या सोचता है?
मसौदा तैयार हो तो सरकार पूछे इसमें कौन-सी व्यावहारिक कठिनाई दिखाई देती है?
नीति लागू हो तो सरकार पूछे—जमीन पर क्या परिणाम आया?
और छह महीने बाद सरकार स्वयं बताए आपके Feedback के आधार पर हमने क्या बदला?
यही वास्तविक Participatory Governance है।
विश्व के अनेक देशों में लोकतंत्र ने प्रतिनिधिक व्यवस्था के साथ ऐसी सहभागी संस्थाओं को जोड़ना शुरू किया है। OECD के 2025 के अध्ययन के अनुसार 1979 से 2023 के बीच 28 OECD देशों में 716 representative deliberative processes दर्ज किए गए, जिनमें 80,000 से अधिक नागरिक शामिल हुए। 2021 से 2023 के बीच ही 148 नए ऐसे उदाहरण दर्ज हुए। इनमें 70 प्रतिशत स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर के थे। OECD का निष्कर्ष स्पष्ट है कि नागरिक सहभागिता नीति-निर्माण को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और स्वीकार्य बना सकती है।
यह केवल विचार नहीं, प्रशासनिक प्रयोगों से निकला निष्कर्ष है।
ब्राजील के पोर्टो एलेग्रे में Participatory Budgeting का प्रयोग 1989 में प्रारंभ हुआ। नागरिकों को स्थानीय बजट की प्राथमिकताओं पर विचार करने की प्रक्रिया में जोड़ा गया। World Bank के एक अध्ययन में दर्ज है कि आरंभिक वर्ष में सहभागिता कुछ सौ लोगों तक सीमित थी, लेकिन लगभग एक दशक बाद लगभग एक लाख नागरिक प्रत्यक्ष रूप से इस प्रक्रिया में भाग लेने लगे। इस प्रक्रिया की सफलता का एक कारण यह भी था कि सरकार ने नागरिकों के अनुभव और टिप्पणियों से अपनी प्रक्रिया में लगातार सुधार किया।
ताइवान का अनुभव भारत के लिए और अधिक उपयोगी है क्योंकि वहाँ डिजिटल तकनीक को नागरिक सहभागिता से जोड़ा गया। 2015 में स्थापित Join Public Policy Participation Platform में नागरिकों के लिए नीति पर चर्चा, प्रस्ताव रखने, प्रमुख नीतियों की निगरानी और सरकारी अधिकारियों से संपर्क जैसे अलग-अलग माध्यम बनाए गए। सरकारी मंच के अनुसार नागरिक नीति के निर्माण और क्रियान्वयन दोनों चरणों में सुझाव दे सकते हैं।
ताइवान के vTaiwan मॉडल ने ऑनलाइन चर्चा और प्रत्यक्ष बैठक को जोड़ा। वहाँ Pol.is जैसे उपकरणों के माध्यम से लोगों की सहमति और असहमति के क्षेत्रों को पहचानने का प्रयास किया गया, जिससे बहस केवल शोर न रहकर नीति-संबंधी सामूहिक समझ में बदल सके।
आइसलैंड का अनुभव बताता है कि नागरिक सहभागिता वास्तव में नीति के पाठ को बदल सकती है। 2011 के संवैधानिक मसौदे की प्रक्रिया में सार्वजनिक टिप्पणियों का डिजिटल उपयोग हुआ और शोध के अनुसार जनता से प्राप्त प्रस्तावों में लगभग 10 प्रतिशत ने मसौदे के पाठ में प्रत्यक्ष परिवर्तन उत्पन्न किया। लेकिन उसी अनुभव की दूसरी सीख भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जनसहभागिता प्रभावी होने के बावजूद यदि राजनीतिक संस्थाओं से उसका अंतिम संबंध कमजोर हो तो पूरी प्रक्रिया का परिणाम अधूरा रह सकता है।
अर्थात केवल एप बना देना समाधान नहीं है।
यदि नागरिक दस हजार सुझाव भेजें और सरकार को पता ही न हो कि उनमें से कितने पढ़े गए, किस पर विचार हुआ और किसे क्यों अस्वीकार किया गया, तो वह Feedback System नहीं, डिजिटल शिकायत-पेटी मात्र है।
भारत के लिए इसलिए एक राष्ट्रीय ‘लोक-संवाद एवं नीति सहभागिता तंत्र’ की आवश्यकता है।
इसके लिए किसी नई विशाल नौकरशाही की आवश्यकता भी नहीं है। प्रधानमंत्री कार्यालय, नीति आयोग, संबंधित मंत्रालयों, राज्यों और स्थानीय निकायों को जोड़कर एक राष्ट्रीय डिजिटल मंच बनाया जा सकता है। उसका एक सरल मोबाइल ऐप हो, वेबसाइट हो और जिन लोगों के पास डिजिटल साधन नहीं हैं उनके लिए पंचायत, नगर निकाय, डाकघर और जनसेवा केंद्रों के माध्यम से ऑफलाइन प्रवेश की व्यवस्था हो।
इस मंच पर प्रत्येक मंत्रालय का अलग Policy Feedback क्षेत्र हो। नागरिक केवल शिकायत न लिख सके, बल्कि चार प्रकार की सामग्री दे सके—समस्या, सुझाव, अनुभव और शोध। कोई शिक्षक शिक्षा व्यवस्था पर अपना अध्ययन भेज सके। कोई किसान कृषि नीति के व्यावहारिक प्रभाव का विवरण दे सके। कोई विद्यार्थी छात्रवृत्ति की कठिनाई बता सके। कोई वैज्ञानिक तकनीकी सुझाव दे सके। कोई उद्योगपति नियम के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण दे सके। कोई वैदिक विद्वान भारतीय ज्ञानपरंपरा के आधार पर शिक्षा अथवा सांस्कृतिक नीति पर सुझाव दे सके। कोई सामाजिक संगठन अपने क्षेत्र का जमीनी अध्ययन प्रस्तुत कर सके।
फिर प्रत्येक सुझाव को एक Tracking Number मिले।
स्थिति दिखाई दे प्राप्त, परीक्षणाधीन, विशेषज्ञ समीक्षा, मंत्रालयीय विचार, स्वीकार, आंशिक स्वीकार, अस्वीकार अथवा आगे के अध्ययन के लिए सुरक्षित।
सरकार को हर सुझाव स्वीकार करना आवश्यक नहीं होना चाहिए। लेकिन सरकार को यह बताने की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी अवश्य होनी चाहिए कि उसने उसे देखा और उस पर निर्णय क्यों लिया।
यही उत्तरदायी शासन है।
इसमें एक और महत्वपूर्ण व्यवस्था हो सकती है। प्रत्येक छह महीने में ‘राष्ट्रीय समाज-संवाद’ और प्रत्येक तीन महीने में मंत्रालय-स्तरीय ‘नीति संवाद’ आयोजित हो। इसमें केवल राजनीतिक कार्यकर्ता न बुलाए जाएँ। लेखक, विचारक, शिक्षाविद्, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, किसान प्रतिनिधि, उद्यमी, महिला प्रतिनिधि, युवा, स्वयंसेवी संगठन, भारतीय ज्ञानपरंपरा के आचार्य, तकनीकी विशेषज्ञ और विभिन्न सामाजिक समुदायों के प्रतिनिधि शामिल हों।
लेकिन यहाँ भी सावधानी आवश्यक है। केवल प्रभावशाली लोगों का एक बंद क्लब बन गया तो समस्या फिर वहीं लौट आएगी। प्रतिनिधित्व में पारदर्शिता होनी चाहिए। कुछ सदस्य विशेषज्ञता के आधार पर, कुछ क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व से, कुछ नागरिक चयन या random selection से और कुछ सार्वजनिक आवेदन की प्रक्रिया से लिए जा सकते हैं। OECD के शोध में भी representative deliberative processes के लिए विविध और प्रतिनिधिक सहभागिता, स्पष्ट प्रश्न, विशेषज्ञ जानकारी, पारदर्शिता और सरकार की समयबद्ध प्रतिक्रिया को महत्त्व दिया गया है।
इस व्यवस्था का एक भारतीय रूप बनाया जा सकता है जन-संवाद मंडल’।
हर जिले में विषयवार जन-संवाद मंडल हों। हर छह महीने में जिला स्तर पर सरकार समाज से मिले। राज्य स्तर पर उसका संकलन हो और राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्माण के लिए भेजा जाए। इससे दिल्ली को पता चलेगा कि दिल्ली से बाहर भारत क्या सोच रहा है।
यह व्यवस्था किसी राजनीतिक दल की प्रचार व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। इसका संचालन सरकार करे, लेकिन उसकी प्रक्रिया पारदर्शी और संस्थागत हो। किसी एक विचारधारा, किसी एक संगठन, किसी एक मीडिया समूह, किसी एक कॉरपोरेट संस्था या किसी अपारदर्शी बाहरी वित्तपोषित समूह को नीति-निर्माण पर अनुचित प्रभाव न मिले। विदेशी वित्तपोषण या किसी विचारधारा से संबंध अपने आप में दोष का प्रमाण नहीं है; समस्या तब है जब नीति पर प्रभाव अपारदर्शी हो और जनता को यह पता ही न चले कि किसी विचार या अभियान के पीछे कौन-सा हित काम कर रहा है। इसलिए Funding Disclosure, Conflict of Interest और सार्वजनिक अभिलेख इस व्यवस्था के अनिवार्य अंग होने चाहिए।
भारतीय सरकार को नीति के लिए बाहरी सलाह लेने में संकोच नहीं होना चाहिए, लेकिन अंतिम नीति-दृष्टि भारतीय समाज की आवश्यकताओं, संविधान, राष्ट्रीय हित और भारतीय सभ्यतागत अनुभव से निर्धारित होनी चाहिए। भारत को अपने समाज को किसी imported ideological template में फिट करने की आवश्यकता नहीं है।
आज सामान्य वर्ग से संबंधित प्रश्न इसका एक उदाहरण हैं। यह कहना कठिन नहीं है कि इस समाज-खंड के भीतर आर्थिक, शैक्षिक और अवसर संबंधी अनेक प्रकार की चिंताएँ हैं। इन सभी माँगों को स्वीकार करना संभव नहीं होगा और न ही किसी लोकतांत्रिक सरकार को प्रत्येक माँग स्वीकार करनी चाहिए। लेकिन क्या सरकार को उन लोगों से व्यवस्थित संवाद नहीं करना चाहिए जो इन समस्याओं को वर्षों से उठा रहे हैं?
किसी मांग को स्वीकार करना और किसी मांग को सुनना दो अलग बातें हैं।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को 102वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 के बाद संविधान के अनुच्छेद 338B के अंतर्गत संवैधानिक संस्था का स्वरूप मिला। आयोग को संबंधित वर्गों के संरक्षण, शिकायतों, सामाजिक-आर्थिक विकास और नीति संबंधी सलाह के व्यापक दायित्व दिए गए हैं।
इसी पृष्ठभूमि में यह प्रश्न उठ सकता है कि आर्थिक और सामाजिक नीति के स्तर पर सामान्य वर्ग से संबंधित समस्याओं के अध्ययन, अनुसंधान और नीति-सुझाव के लिए ‘सामान्य वर्ग आयोग’ जैसी संवैधानिक अथवा वैधानिक संस्था पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता? यह किसी दूसरे वर्ग के अधिकार कम करने का प्रस्ताव नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य अवसर, शिक्षा, छात्रवृत्ति, आर्थिक कठिनाइयों, प्रतियोगी परीक्षाओं, कौशल, उद्यमिता और सामाजिक गतिशीलता से संबंधित समस्याओं का अध्ययन तथा नीति-सुझाव होना चाहिए।
EWS के लिए संविधान के 103वें संशोधन, 2019 ने शिक्षा संस्थानों में प्रवेश और सरकारी सेवाओं में नियुक्तियों के लिए अधिकतम 10 प्रतिशत तक आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था सक्षम की। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की समस्या केवल आरक्षण से समाप्त नहीं होती। छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा की लागत, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, कौशल विकास, आवास, उद्यमिता और शिक्षा तक पहुँच जैसे प्रश्न उससे कहीं बड़े हैं। इसलिए यदि सामान्य वर्ग से जुड़े आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की वास्तविक स्थिति पर राष्ट्रीय स्तर पर शोध हो, तो नीति अधिक लक्ष्यित और प्रभावी बनाई जा सकती है।
यही संवाद का लाभ है वह नाराजगी को नीति-सूचना में बदल देता है।
मान लीजिए किसी विश्वविद्यालय के नियमन को लेकर सोशल मीडिया पर एक सूचना फैलती है। हजारों लोग उसे सत्य मानकर प्रतिक्रिया करने लगते हैं। यदि सरकार के पास ऐसा डिजिटल नीति-संवाद मंच हो जहाँ संबंधित मंत्रालय उसी दिन तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट कर सके, मूल दस्तावेज उपलब्ध करा सके और नागरिक प्रश्न पूछ सकें, तो विवाद का आकार बहुत छोटा हो सकता है। आज सूचना की गति शासन की गति से कहीं अधिक है। इसलिए सरकार की Communication व्यवस्था केवल प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित नहीं रह सकती।
सरकार को ‘Real-time Public Feedback Intelligence’ की आवश्यकता है।
इसका अर्थ जनता की निगरानी नहीं, जनता की समझ है।
सोशल मीडिया पर चल रही प्रत्येक बात को नीति नहीं बनाया जा सकता। सोशल मीडिया पर शोर और समाज की वास्तविक राय में अंतर होता है। लेकिन सोशल मीडिया को पूरी तरह खारिज करना भी बुद्धिमानी नहीं होगी। उसे प्रारंभिक संकेतक की तरह देखा जा सकता है। फिर उन संकेतों की पुष्टि सर्वेक्षण, ग्रामसभा, जिला संवाद, विशेषज्ञ अध्ययन और नागरिक Feedback से की जा सकती है। इससे सरकार के पास केवल ‘कौन कितना चिल्ला रहा है’ की जानकारी नहीं होगी, बल्कि ‘समस्या वास्तव में कितनी व्यापक है’ इसका भी प्रमाण होगा।
यहीं भीड़ तंत्र और लोकतंत्र का अंतर सामने आता है।
भीड़ कहती है—अभी निर्णय करो।
लोकतंत्र पूछता है समस्या क्या है, तथ्य क्या हैं, सभी पक्ष क्या कहते हैं और दीर्घकाल में इसका परिणाम क्या होगा?
भीड़ किसी मंत्री को घेर सकती है; समाज किसी नीति की समीक्षा कर सकता है।
भीड़ Trending Topic बना सकती है; समाज दीर्घकालीन नीति का आधार बन सकता है।
सरकार यदि भीड़ के दबाव में निर्णय लेने लगे तो शासन प्रतिक्रियात्मक हो जाता है। और यदि समाज से संवाद ही समाप्त कर दे तो शासन अहंकारी दिखाई देने लगता है। दोनों स्थितियाँ लोकतंत्र को कमजोर करती हैं।
इसलिए सरकार को न भीड़ से डरना चाहिए, न समाज से दूरी बनानी चाहिए।
उसे समाज को सुनना चाहिए और निर्णय अपने विवेक से करना चाहिए।
यही स्वस्थ लोकतांत्रिक शासन है।
भारत में इस व्यवस्था का अंतिम आधार गाँव होना चाहिए। ग्रामसभा को केवल योजनाओं की औपचारिक स्वीकृति देने वाली संस्था नहीं, स्थानीय नीति-विचार की पहली इकाई बनाना चाहिए। ग्रामसभा वर्ष में निर्धारित बैठकों में केवल सड़क और नाली की चर्चा न करे; वह स्थानीय शिक्षा, जल, कृषि, रोजगार, संस्कृति, स्वास्थ्य, सामाजिक विवाद, प्राकृतिक संसाधन और स्थानीय विकास की प्राथमिकताओं पर भी विचार करे। नगरों में वार्डसभा इसी भूमिका को निभा सकती है।
जिले में इन सुझावों का संकलन हो। राज्य में उनका विश्लेषण हो। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों से प्राप्त अनुभवों का तुलनात्मक अध्ययन हो। तब केंद्र की नीति ऊपर से नीचे गिरने वाली वस्तु नहीं होगी; वह नीचे से ऊपर आने वाली वास्तविक सूचनाओं से भी बनेगी।
यह व्यवस्था भारत के विशाल आकार के कारण और अधिक आवश्यक है। एक दिल्ली में बैठकर पूरे भारत की सामाजिक नाड़ी पढ़ना संभव नहीं है। कोई भी मंत्रालय चाहे जितना सक्षम हो, उसके अधिकारी देश के प्रत्येक गाँव, कस्बे और समुदाय के अनुभव को स्वयं नहीं जान सकते। इसलिए शासन को एक ऐसा ‘सामाजिक संवेदना तंत्र’ चाहिए जो लाखों नागरिकों के अनुभव को व्यवस्थित सूचना में बदल सके।