दीपक कुमार द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
जब राष्ट्र अपने प्राणों से जुड़े प्रश्नों पर मौन हो जाता है, तो इतिहास अपनी देह पर लगे गहरे घावों को समेटे हुए एक बार फिर कटघरे में खड़ा दिखाई देता है। आज भारत की इस पावन माटी पर खड़े होकर यदि हम व्यवस्था के आईने में झांकें, तो एक ऐसा भयानक सामाजिक न्याय का फ्रॉड अपनी पूरी कुरूपता के साथ नंगा नाच रहा है, जिसे अब और अधिक ढंका नहीं जा सकता। बात जब शब्दों की होती है, तो उनके अर्थों की पवित्रता और गहराई को समझना अनिवार्य हो जाता है।
सनातन दृष्टि में "धर्म" कोई पश्चिमी अर्थों वाला सीमित "रिलिजन" नहीं है, बल्कि यह जीवन-पद्धति, कर्तव्य, सत्य और समूची सृष्टि के प्रति शाश्वत आचरण का नाम है। इसके विपरीत, इस्लाम और क्रिश्चियनिटी विशुद्ध रूप से मजहब हैं, जो इस भारत भूमि से बाहर पैदा हुए और यहाँ की सनातन धारा से सर्वथा भिन्न मान्यताओं पर टिके हैं। इन दोनों मजहबों के पैरोकार और मौन स्वीकारोक्ति वाले नेता मंचों से बड़े गर्व के साथ यह ढिंढोरा पीटते हैं कि हमारे मजहब में कोई जाति नहीं है, वहाँ सब मनुष्य पूरी तरह समान हैं, वहाँ कोई ऊंच-नीच नहीं है। यदि यह सत्य है और वे स्वयं को जाति के बंधनों से मुक्त मानते हैं, तो फिर उसी मजहबी पहचान के आधार पर भारत की धरती पर ओबीसी और ईडब्ल्यूएस का आरक्षण क्यों और किस हक से खाया जा रहा है? सरकारें इन्हें किस संवैधानिक और नैतिक अधिकार के तहत यह लाभ परोस रही हैं? यह प्रश्न अब किसी एक कोने की फुसफुसाहट नहीं, बल्कि इस राष्ट्र के अस्तित्व और आत्मसम्मान का सबसे बड़ा और ज्वलनशील सवाल बन चुका है।
इस विमर्श की तह में उतरने पर उस दोहरेपन की परतें उधड़ जाती हैं जो तथाकथित सामाजिक न्याय के नाम पर पिछले कई दशकों से इस देश के मूल हिंदू समाज के साथ किया जा रहा है। एक तरफ राजनीति के मंचों से यह प्रोपोगंडा फैलाया जाता है कि हिंदू समाज में जातिवाद, छुआछूत और भेदभाव का जहर भरा है। यह नैरेटिव गढ़ा जाता है कि सवर्णों और उच्च जातियों के लोगों ने दलितों और पिछड़ों पर अमानवीय अत्याचार किए हैं, उन्हें कुचला है और आज भी वे इतिहास के उन कथित पापों के व्यक्तिगत दोषी हैं। न्यायालयों में सरकारों द्वारा ऐसे हलफनामे दाखिल करवाए जाते हैं जिनमें यह साबित करने की होड़ लगी रहती है कि सदियों से ब्राह्मणों और सवर्णों ने इस समाज को पांटकर रखा। यह भी दुष्प्रचारित किया जाता है कि पिछड़े समाज के लोगों को चारपाई पर बैठने तक का अधिकार नहीं दिया जाता था। यह सब कुछ ईसाई मिशनरियों और विदेशी ताकतों के उन एजेंटों की प्रयोगशालाओं की उपज है जो इस देश को अंदर से तोड़ना चाहते हैं। वे बड़ी बेशर्मी से यह रट लगाते हैं कि जब तक हिंदू समाज से जाति खत्म नहीं होती, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए।
लेकिन जब हम आंकड़ों के इस विशाल खेल की गहराई में उतरते हैं, तो आँखें खुली की खुली रह जाती हैं। जो लोग गला फाड़कर यह दावा करते हैं कि हमारे मजहब में जाति का कोई अस्तित्व ही नहीं है, वही लोग चुपके से पिछले दरवाज़े से एससी, एसटी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस का सारा आरक्षण चट कर जाते हैं। मतांतरण की आग में झुलसने के बाद भी यह खेल धड़ल्ले से जारी है। आज खुलेआम धर्मांतरण के बाद भी मुस्लिम और ईसाई समुदाय ओबीसी और ईडब्ल्यूएस के कोटे में अपनी पैठ बनाए हुए हैं। जरा सोचिए, जिस कौम ने इस देश की छाती को चीरकर केवल मजहब के नाम पर भारत का विभाजन करवा दिया, जिस जिहादी मानसिकता ने यह इतिहास गढ़ा कि हमने भारत पर आठ सौ वर्षों तक तलवार के जोर पर शासन किया, वही लोग जब सत्ता के गलियारों में लाभ लेने की बात आती है, तो अचानक सबसे ज्यादा पिछड़े और आर्थिक रूप से लाचार बन जाते हैं।
इस देश में हिंदू ओबीसी आबादी लगभग 41 से 43 प्रतिशत के बीच है। लेकिन उस विशाल हिस्सेदारी में से लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा अकेले मुस्लिम जातियों की झोली में डाल दिया जाता है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि कुल ओबीसी आरक्षण का एक बहुत बड़ा और मलाईदार हिस्सा उन लोगों द्वारा डकार लिया जा रहा है जो यह दावा करते हैं कि उनके मजहब में तो जाति होती ही नहीं है। रोहिणी आयोग की रिपोर्ट इस देश के सामने एक कड़वा और हिला देने वाला सच लेकर आई। उस रिपोर्ट के अनुसार, पिछड़े वर्ग के कुल आरक्षण के बहुत बड़े हिस्से का लाभ कुछ ही चुनिंदा जातियों और समूहों तक सिमट कर रह गया है, जिसमें वे मुस्लिम समुदाय भी शामिल हैं जो कागजों में पिछड़ी जातियों की सूचियों में घुसपैठ कर चुके हैं। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि जब यह भयानक अन्याय इस देश के बहुसंख्यक समाज के सामने हो रहा है, तब तथाकथित सामाजिक न्याय के बड़े-बड़े मसीहा बने नेता अपनी आंखें मूंदकर बैठे हैं। पिछड़ों के नाम पर राजनीति की रोटियां सेकने वाले लालू प्रसाद यादव और उनके पुत्र तेजस्वी यादव पूरी तरह मौन हैं। उत्तर प्रदेश में खुद को पिछड़ों का रहनुमा बताने वाले अखिलेश यादव की जुबान पर ताले पड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर खुद को पिछड़े वर्ग का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की होड़ में रहने वाले राहुल गांधी इस पर एक शब्द बोलने से कतराते हैं। यहाँ तक कि देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे और खुद को पिछला वर्ग बताने वाले नेता भी इस भयानक विसंगति पर गहरी चुप्पी साध लेते हैं। आखिर क्यों? क्योंकि वोट बैंक की गंदी राजनीति इन सबके लिए राष्ट्रहित और न्याय से कहीं ज्यादा बड़ी है।
यह आरक्षण मूल रूप से हिंदुओं के भीतर की उन ऐतिहासिक विसंगतियों और दूरियों को पाटने के लिए गढ़ा गया था, जिन्हें समाप्त कर समाज में समरसता लाई जानी थी। लेकिन पश्चिमी सिद्धांतों के चश्मे से इस देश को देखने वाले उन विचारकों और इतिहासकारों ने हमेशा से इस समाज को कटघरे में खड़ा किया। इतिहासकार धर्मपाल जैसे मनीषियों और अनेक निष्पक्ष शोधकर्ताओं ने अपने पुख्ता दस्तावेजों और आंकड़ों के साथ यह अकाट्य रूप से सिद्ध कर दिया है कि भारत में जिस प्रकार के भयानक और व्यापक जातिवाद का विषैला नैरेटिव गढ़ा जाता है, वैसा कोई ऐतिहासिक प्रमाण प्राचीन या मध्यकालीन भारत में नहीं मिलता था। मूल रूप से समाज में कुछ आंशिक कुरीतियां अवश्य थीं, और कुछ ही प्रतिशत अस्पृश्यता जैसी विकृतियाँ थीं, जिन्हें आगे चलकर औपनिवेशिक ताकतों यानी अंग्रेजों ने अपने सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र के तहत फूट डालो और राज करो की नीति के तहत इस तरह फैलाया और बढ़ाया कि वह समाज के माथे पर एक स्थायी कलंक बन गया। अंग्रेजों ने अपनी जनगणना और नीतियों के जरिए उस विभाजन को संस्थागत रूप दे दिया, जिसका कोई वास्तविक ऐतिहासिक आधार नहीं था।
लेकिन इसके विपरीत, यदि पिछले एक हजार वर्षों के इतिहास को उठाकर देखा जाए तो इस्लामिक आक्रांताओं ने इस भारत भूमि पर खून की नदियां बहाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इतिहासकार प्रोफेसर रत्न लाल जैसे विद्वानों ने अपने शोध में स्पष्ट रूप से बताया है कि किस प्रकार इस्लामिक आक्रांताओं के हाथों दस से पंद्रह करोड़ हिंदुओं का नरसंहार किया गया, लाखों निर्दोष स्त्रियों की अस्मिता और शील को तार-तार किया गया, और इस देश की प्राचीन संस्कृति और मंदिरों को खंडहर में बदल दिया गया। इसके बाद औपनिवेशिक ब्रिटिश शासकों ने भारत की अर्थव्यवस्था को इस हद तक चूसा कि उनकी क्रूर नीतियों के कारण करोड़ों भारतीय अकाल और भुखमरी से तड़प-तड़प कर मौत के मुंह में समा गए। ईसाई मिशनरियों ने अमानवीय अत्याचारों और छल-कपट की सारी हदें पार करते हुए पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों से लेकर दक्षिण भारत के कोने-कोने तक मतांतरण का ऐसा काला जाल बिछाया, जिससे आज भी इस देश की मूल आत्मा छटपटा रही है।
तथ्य यह है कि आज़ादी के बाद भी जब देश का खूनी विभाजन हुआ, तो उसका नेतृत्व करने वाले कौन थे? वह विभाजन भी उन्हीं मजहबी उन्मादियों द्वारा कराया गया जिन्होंने इस भूमि को अपनी जिहादी तलवारों से रौंदा था। लेकिन विडंबना देखिए कि आज इतिहास के उन काले अध्यायों के लिए न तो इस्लाम को दोषी माना जाता है और न ही उन मुस्लिम नागरिकों को जिम्मेदार ठहराया जाता है, बल्कि सारा का सारा ऐतिहासिक पाप और अपराध केवल और केवल आज के उस ब्राह्मण और सामान्य वर्ग के सिर मढ़ दिया जाता है जिसके पूर्वजों ने न तो कभी किसी पर अत्याचार किया और न ही वे आज इस दुनिया में जीवित हैं। वे लोग जिन्होंने इस देश के टुकड़े किए, जिन्होंने सदियों तक यहाँ की संस्कृति को लहूलुहान किया, और जो आज भी खुलेआम मतांतरण के जरिए इस देश की जनसांख्यिकी को बदल रहे हैं, वे आज आरक्षण की मलाई बड़े आराम से खा रहे हैं। इसके विपरीत, जिन गरीब और शोषित हिंदुओं के भले के लिए यह पूरी व्यवस्था गढ़ी गई थी, वे आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों और अवसरों के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हैं।
यह दोहरापन अब इस देश में और अधिक नहीं चल सकता। समय आ गया है कि बिना किसी लाग-लपेट के यह सीधी और दो टूक मांग उठाई जाए कि क्या एससी, एसटी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस के आरक्षण के दायरे से इन मुस्लिम और ईसाई समुदायों को पूरी तरह बाहर नहीं कर दिया जाना चाहिए? इसके लिए देशव्यापी आवाज क्यों नहीं उठती? जो मजहब यह दावा करता है कि हमारे यहाँ कोई जाति नहीं है, उसे जाति के नाम पर मिलने वाले इस लूट के लाइसेंस से फौरन बेदखल किया जाना चाहिए। यदि उनके यहाँ जाति नहीं है, तो वे आरक्षण की सूचियों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का नैतिक और संवैधानिक अधिकार भी खो देते हैं।
यह समय किसी कूटनीतिक या सुस्त विमर्श का नहीं है, बल्कि एक अत्यंत साहसिक और निर्णयात्मक वैचारिक क्रांति का है। आरक्षण के नाम पर चल रहे इस सबसे बड़े सामाजिक न्याय के फ्रॉड को अब जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। यदि आरक्षण का लाभ वास्तव में उस व्यक्ति तक पहुँचना है जो सदियों से वंचना का शिकार है, तो सबसे पहले उस ढोंग को समाप्त करना होगा जहाँ एक तरफ धर्म के नाम पर जाति न होने का दावा किया जाता है और दूसरी तरफ पिछले दरवाजे से सरकारी संसाधनों पर कब्जा कर लिया जाता है। न तो यह दोहरा चरित्र अब सहा जाएगा और न ही इस देश के बहुसंख्यक समाज को हमेशा के लिए अपराधबोध के अंधेरे में धकेला जा सकता है। न्याय तभी जीवंत हो सकता है जब कसौटी सबके लिए एक जैसी हो, तराजू का हर बाट सच्चा हो और इस देश की माटी के साथ हुआ यह ऐतिहासिक छल पूरी तरह बेनकाब होकर हमेशा के लिए समाप्त हो जाए।