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डॉ भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
“एकता में ही मानवता का उत्कर्ष है”
भारत केवल भौगोलिक सीमा में बंधा कोई राष्ट्र नहीं, बल्कि वह एक ऐसी महान सभ्यता है जिसने संपूर्ण विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया। यह ऋषियों, मुनियों, संतों और मनीषियों की भूमि है, जिन्होंने अपने ज्ञान, तप और साधना के माध्यम से मानवता को जीवन का व्यापक दर्शन दिया। भारतीय चिंतन की इसी महान परंपरा में स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व एक ऐसे युगद्रष्टा के रूप में सामने आता है, जिन्होंने भारत के आध्यात्मिक चिंतन को आधुनिक विश्व के सामने नए आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया।
स्वामी विवेकानंद की एकता की परिकल्पना केवल धार्मिक एकता तक सीमित नहीं थी। उनके लिए एकता का अर्थ था—मनुष्य और मनुष्य के बीच एकता, समाज और समाज के बीच एकता, धर्मों के बीच समन्वय तथा समस्त मानवता में एक ही चेतना का दर्शन। उनका अद्वैत वेदांत इसी व्यापक दृष्टि का दार्शनिक आधार था।
गुरु रामकृष्ण परमहंस से मिला मानवता की सेवा का संस्कार
स्वामी विवेकानंद के विचारों की मूल प्रेरणा उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जीवन और संदेश से मिली। रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन में विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों के अनुभव के माध्यम से धार्मिक समन्वय और मानवता की एकता का संदेश दिया।
उनका प्रसिद्ध भाव था—“नर सेवा ही नारायण सेवा है।” अर्थात मनुष्य की सेवा वास्तव में ईश्वर की सेवा है।
विवेकानंद ने गुरु के इस संदेश को केवल उपदेश के रूप में नहीं लिया, बल्कि इसे अपने जीवन का मिशन बनाया। उनके लिए मंदिर में ईश्वर की उपासना जितनी महत्वपूर्ण थी, उतनी ही महत्वपूर्ण भूखे, गरीब, अशिक्षित और पीड़ित मनुष्य की सेवा थी।
यही कारण है कि विवेकानंद का आध्यात्मिक दर्शन कर्म और सेवा से जुड़ गया। उनके चिंतन में अध्यात्म जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने की शक्ति था।
अद्वैत वेदांत : एकता का दार्शनिक आधार
स्वामी विवेकानंद की एकता की अवधारणा को समझने के लिए अद्वैत वेदांत को समझना आवश्यक है। भारतीय दर्शन में अद्वैत यह स्वीकार करता है कि समस्त अस्तित्व के मूल में एक ही परम सत्य है।
वेदांत का प्रसिद्ध सूत्र है—
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
अर्थात ब्रह्म ही परम सत्य है और जीव का वास्तविक स्वरूप ब्रह्म से अलग नहीं है।
उपनिषद का महावाक्य “अहं ब्रह्मास्मि” भी इसी आत्मबोध की ओर संकेत करता है। इसका आशय यह है कि मनुष्य के भीतर विद्यमान आत्मतत्व उसी परम चेतना से जुड़ा है, जो संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है।
यही दर्शन स्वामी विवेकानंद की सामाजिक और मानवीय दृष्टि का आधार बना। यदि प्रत्येक व्यक्ति में वही चेतना विद्यमान है, तो जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र, संप्रदाय और अन्य बाहरी विभाजन मनुष्य की मूल एकता को समाप्त नहीं कर सकते।
इसलिए विवेकानंद के लिए एकता कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सत्य थी।
शिकागो से विश्व को मिला विश्वबंधुत्व का संदेश
1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने भारत की आध्यात्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व किया। 11 सितंबर 1893 को उनके संबोधन की शुरुआत—
“अमेरिका के बहनों और भाइयों...”
से हुई।
इन शब्दों ने सभागार में उपस्थित श्रोताओं के साथ तत्काल आत्मीय संबंध स्थापित किया। यह केवल संबोधन नहीं था, बल्कि भारतीय दर्शन की उस दृष्टि की अभिव्यक्ति थी जिसमें समस्त मानवता को एक परिवार के रूप में देखने की परंपरा रही है।
विवेकानंद ने धार्मिक श्रेष्ठता या संघर्ष का संदेश नहीं दिया। उन्होंने सहिष्णुता, स्वीकृति, धार्मिक सद्भाव और मानव-एकता की बात की। उन्होंने दुनिया को बताया कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा विभिन्न मार्गों को सत्य की ओर जाने वाले विविध रास्तों के रूप में देखती है।
इस प्रकार शिकागो का उनका भाषण केवल एक धार्मिक भाषण नहीं था, बल्कि विश्वबंधुत्व का घोष बन गया।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” से विश्वमानव की अवधारणा
भारतीय संस्कृति में हजारों वर्षों से यह विचार रहा है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है—
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
अर्थात संकीर्ण दृष्टि वाले लोग अपना और पराया देखते हैं, जबकि उदार चरित्र वाले संपूर्ण पृथ्वी को अपना परिवार मानते हैं।
स्वामी विवेकानंद ने इसी भावना को आधुनिक विश्व की भाषा में प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय आध्यात्मिक चिंतन को किसी एक समुदाय या भूभाग तक सीमित नहीं रखा। उनके लिए भारत का आध्यात्मिक संदेश मानवता के कल्याण का संदेश था।
उनकी दृष्टि में विश्व की समस्याओं का समाधान विभाजन और संघर्ष में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर निहित एकत्व की अनुभूति में था।
जाति, वर्ग और धर्म से परे मनुष्य की प्रतिष्ठा
स्वामी विवेकानंद ने भारत की यात्रा के दौरान समाज के विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों को निकट से देखा। उन्होंने गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी, बीमारी और सामाजिक विषमता को अनुभव किया।
उन्होंने महसूस किया कि जिस समाज का बड़ा वर्ग भूखा और अशिक्षित है, वह केवल आध्यात्मिक उपदेशों से आगे नहीं बढ़ सकता।
इसीलिए उन्होंने कहा कि भारत का पुनर्निर्माण केवल पुस्तकों और भाषणों से नहीं होगा। इसके लिए दरिद्र, वंचित और उपेक्षित व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और अवसर पहुंचाना होगा।
उनकी दृष्टि में गरीब व्यक्ति केवल सहायता का पात्र नहीं था; वह राष्ट्र की शक्ति का अभिन्न हिस्सा था।
“आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च” : व्यक्तिगत मुक्ति से सामाजिक कल्याण तक
स्वामी विवेकानंद के चिंतन में आध्यात्मिक साधना और सामाजिक सेवा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक थे।
“आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च” — अर्थात अपने आत्मकल्याण और जगत के हित के लिए।
यह विचार उनकी समग्र दृष्टि को व्यक्त करता है। व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास तभी सार्थक है, जब उसका जीवन समाज और मानवता के कल्याण में भी योगदान दे।
इसी भावना के आधार पर रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन ने सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत और मानवीय कार्यों को व्यापक रूप दिया। इस सेवा-दर्शन में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी बन जाता है।
एकता केवल विचार नहीं, आचरण भी है
स्वामी विवेकानंद की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने एकता की बात केवल दर्शन के स्तर पर नहीं की। उन्होंने उसे जीवन और कर्म में उतारने का प्रयास किया।
उनकी दृष्टि में—
विचारों में व्यापकता होनी चाहिए।
धर्म में सहिष्णुता होनी चाहिए।
समाज में समरसता होनी चाहिए।
राष्ट्र में आत्मविश्वास होना चाहिए।
व्यक्ति में आत्मबल होना चाहिए।
और सेवा में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
उनका एकत्ववाद मनुष्य को दूसरे मनुष्य के प्रति सम्मान करना सिखाता है। जब हम दूसरे में भी उसी चेतना का दर्शन करते हैं, तो घृणा, भेदभाव और संकीर्णता के लिए स्थान कम होता जाता है।
भारत के पुनर्जागरण का आह्वान
विवेकानंद ने भारत को केवल अतीत के गौरव का स्मरण करने के लिए प्रेरित नहीं किया। उन्होंने भारत को अपनी आध्यात्मिक शक्ति के साथ आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा और संगठन की शक्ति ग्रहण करने का आह्वान किया।
वे ऐसे भारत का निर्माण चाहते थे जो अपनी परंपरा पर गर्व करे, लेकिन आधुनिक विश्व से संवाद करने में संकोच न करे।
उनका भारत ऐसा भारत था जिसमें आध्यात्मिकता और विज्ञान, परंपरा और आधुनिकता, व्यक्ति और समाज तथा राष्ट्र और विश्व के बीच संतुलन स्थापित हो।
सेवा, त्याग और शक्ति : विवेकानंद का त्रिवेणी संदेश
विवेकानंद के चिंतन में तीन शब्द विशेष महत्व रखते हैं—सेवा, त्याग और शक्ति।
सेवा मनुष्य को समाज से जोड़ती है।
त्याग व्यक्ति को स्वार्थ से मुक्त करता है।
शक्ति उसे अपने लक्ष्य के लिए कर्म करने का सामर्थ्य देती है।
उनका प्रसिद्ध संदेश—
“शक्ति ही जीवन है, कमजोरी मृत्यु है।”
आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह शक्ति केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, चरित्र, विवेक, संगठन, ज्ञान और संकल्प की शक्ति है।
आज के विश्व के लिए विवेकानंद की प्रासंगिकता
आज दुनिया तकनीकी रूप से पहले से कहीं अधिक जुड़ी हुई है, लेकिन सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर विभाजन भी दिखाई देते हैं। ऐसे समय में विवेकानंद की एकता की परिकल्पना नई दिशा दे सकती है।
उनका संदेश हमें बताता है कि विविधता संघर्ष का कारण नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की शक्ति हो सकती है। धर्म अलग हो सकते हैं, भाषाएं अलग हो सकती हैं, जीवन-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन मानवता का मूल तत्व एक है।
इसीलिए विवेकानंद का दर्शन आज केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रासंगिक है।
एकता से मानवता, सेवा से राष्ट्र और शक्ति से विश्वकल्याण
स्वामी विवेकानंद ने भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक विश्व के सामने जिस आत्मविश्वास के साथ रखा, वह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। उन्होंने अद्वैत के दार्शनिक सत्य को मानव-एकता के सामाजिक संदेश में बदला और मानव-एकता को सेवा के व्यवहारिक दर्शन से जोड़ा।
उनकी एकता की परिकल्पना हमें बताती है कि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना ही वास्तविक अध्यात्म है।
उनका संदेश आज भी हमारे सामने एक स्पष्ट मार्ग रखता है
अद्वैत से आत्मबोध,
आत्मबोध से एकता,
एकता से सेवा,
सेवा से राष्ट्रनिर्माण
और राष्ट्रनिर्माण से विश्वकल्याण।
विवेकानंद का स्वप्न केवल शक्तिशाली भारत का नहीं था; वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जो अपनी शक्ति का उपयोग संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए करे।
यही उनकी एकता की परिकल्पना का सार है—
“स्वयं के भीतर शक्ति जगाओ, प्रत्येक मनुष्य में उसी चेतना का दर्शन करो और मानवता की सेवा को जीवन का साध्य बनाओ।”