कपिल सिब्‍बल की अज्ञानता या न जानने का नाटक! कौन नहीं जानता जो यूएस में भागवत बोले, वह हिन्‍दुत्‍व है

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    01-Sep-2026
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कपिल सिब्‍बल की अज्ञानता या न जानने का नाटक! कौन नहीं जानता जो यूएस में भागवत बोले, वह हिन्‍दुत्‍व है
 
 
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार  
 
 
भारतीय राजनीति में विमर्श की गुणवत्ता अक्सर तथ्यों और सत्यता पर आधारित होने के बजाय राजनीतिक नफे-नुकसान, चुनावी गणित और छद्म सेक्युलरिज्म के चश्मे से तय होती है। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अमेरिका के अपने आधिकारिक दौरे पर हिंदुत्व, भारतीय संस्कृति, वैश्विक शांति और सह-अस्तित्व को लेकर जो विचार व्यक्त किए, उसने एक बार फिर कांग्रेस समेत विपक्ष को असहज कर दिया है।
 
 
पूर्व केंद्रीय मंत्री, देश के वरिष्ठतम अधिवक्ताओं में से एक कपिल सिब्बल और समूचे विपक्ष ने इस पर जिस तरह की तीखी, नकारात्मक और संकीर्ण प्रतिक्रिया दी है, वह उनके वैचारिक दिवालिएपन और चतुर अज्ञानता को साफ दर्शाती है। सवाल यह उठता है कि क्या विपक्ष वास्तव में हिंदुत्व के मूल दर्शन से अनभिज्ञ है? या फिर यह सब उसका अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण, वोटबैंक को सुरक्षित रखने और अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए किया जा रहा एक सोचा-समझा नाटक है? सत्य तो यही है कि जो बातें मोहन भागवत ने विदेशी धरती पर कहीं, वही अनादि काल से हिंदुत्व का शाश्वत सत्य रहा है।
 
 
डॉ. भागवत ने भारतीय प्रवासियों, अंतरराष्ट्रीय विचारकों और वैश्विक नीति-निर्माताओं को संबोधित करते हुए हिंदुत्व की एक ऐसी परिभाषा प्रस्तुत की जो समावेशी, सहिष्णु, वैज्ञानिक और वैश्विक भाईचारे पर आधारित है। उन्होंने इस बात को पूरी तार्किकता से स्पष्ट किया कि हिंदुत्व कोई संकुचित मजहब, मजहबी किताब या किसी एक विशिष्ट पूजा पद्धति का नाम नहीं है। इसके विपरीत, यह एक शाश्वत जीवन पद्धति, एक व्यापक दृष्टिकोण और एक ऐसी चेतना है जो पूरी मानवता को एक सूत्र में पिरोती है।
 
 
'वसुधैव कुटुंबकम्' (पूरी पृथ्वी ही हमारा परिवार है) और 'सर्वे भवंतु सुखिनः' (सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों) के जिस उदात्त विचार को उन्होंने रेखांकित किया। भागवत के व्याख्यान का मूल यह था कि हिंदुत्व विविधता में एकता का उत्सव मनाता है। यह दुनिया के किसी भी व्यक्ति को अपने रंग, रूप, भाषा, संस्कृति या पूजा पद्धति को बदलने के लिए कतई मजबूर नहीं करता। सभी के स्वतंत्र अस्तित्व को सहर्ष स्वीकार करता है।
 
 
वस्‍तुत: जब वे विदेशी धरती पर भारत की इस महान सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, तो वे वास्तव में वैश्विक मंच पर भारत की 'सॉफ्ट पावर' और सांस्कृतिक साख को मजबूत कर रहे थे, किंतु विडंबना देखिए कि देश के भीतर बैठे विपक्षी नेताओं को इसमें भी 'विभाजनकारी राजनीति' और 'एजेंडा' दिखाई दिया, जो उनकी गहरी संकीर्ण मानसिकता का सबसे बड़ा परिचायक है।
 
 
कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ और प्रबुद्ध राजनेता, जो देश के सर्वोच्च न्यायालय के नामचीन कानूनविद् है और जो भारत के संविधान तथा इतिहास की गहरी समझ रखने का दावा करते हैं, जब हिंदुत्व और संघ के मूल विचारों पर ऐसी सतही अनभिज्ञता जाहिर करते हैं, तो घोर आश्चर्य होता है। सिब्बल और उनके सहयोगी विपक्षी दलों ने भागवत के बयानों को 'छलावा', 'दिखावा' और 'चुनावी रणनीति' करार देने की पूरी कोशिश की। विपक्ष का चिरपरिचित तर्क यह है कि संघ का जमीनी आचरण और विदेशी मंचों पर दिया जाने वाला उदार भाषण आपस में मेल नहीं खाता।
 
 
कहना होगा कि यह प्रतिक्रिया दरअसल कुछ और नहीं, बल्कि 'न जानने का नाटक' (सिलेक्टिव एम्नीजि‍या) है। विपक्ष भली-भांति जानता है कि यदि वे हिंदुत्व के वास्तविक, वैज्ञानिक और उदार चेहरे को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेंगे, तो उनकी उस राजनीतिक पिच की हवा पूरी तरह निकल जाएगी, जिस पर वे पिछले कई दशकों से देश को बांटकर राजनीति खेल रहे हैं।
 
 
विपक्ष और वामपंथी इतिहासकारों ने मिलकर हिंदुत्व को 'बहुसंख्यकवाद' (मेजॉरिटेरियनिज्‍म) और 'फासीवाद' के रूप में चित्रित करने का एक बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव तैयार किया है। जब भी मोहन भागवत या संघ का कोई अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी वैश्विक मंचों पर इस नैरेटिव को अपने तर्कों से ध्वस्त करता है, तो विपक्ष के खेमे में भारी खलबली मच जाती है। कहना होगा, सिब्बल की हालिया टिप्पणी इसी बौखलाहट और डर का सीधा नतीजा है।
 
 
आखिर कौन नहीं जानता कि हिंदुत्व का सत्य वही है जो मोहन भागवत ने यूएस में कहा है? हिंदुत्व को समझने के लिए किसी राजनीतिक चश्मे या चुनावी घोषणा-पत्र की आवश्‍यकता नहीं है, जरूरत है तो भारत के इतिहास, दर्शन, उपनिषदों और संस्कृति को निष्पक्षता से समझने की। संघ ने हमेशा से इसी सत्य को देश के सामने रखा है कि हिंदू धर्म और संस्कृति ने कभी भी तलवार, भय या लालच के बल पर अपना विस्तार नहीं किया। भारत ने अपने इतिहास में पारसियों, यहूदियों, सीरियाई ईसाइयों और दुनिया भर के सताए गए मजहबी अल्पसंख्यकों को शरण दी, उन्हें फलने-फूलने की पूरी आजादी दी। यह हिंदुत्व की अंतर्निहित उदारता का ही परिणाम था।
 
 
दुनिया के कई मजहब जहां एकरूपता पर जोर देते हैं और दूसरों को अपने जैसा बनाने की जिद पालते हैं, वहीं हिंदुत्व विविधता (डाइवर्सिटी) का दिल से सम्मान करता है। एक ही हिंदू परिवार में एक व्यक्ति मूर्तिपूजक हो सकता है, दूसरा निराकार का आराधक हो सकता है और तीसरा पूर्णतः नास्तिक हो सकता है, फिर भी तीनों समान रूप से हिंदू और आदरणीय कहलाते हैं। वैचारिक असहमति की यह स्वतंत्रता दुनिया के किसी अन्य विचार या मजहब में नहीं मिलती।
 
 
संघ और हिंदुत्व का मूल मंत्र है कि राष्ट्र की उन्नति में ही उसके सभी नागरिकों की उन्नति निहित है। जब भागवत कहते हैं कि भारत में रहने वाले सभी लोग सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं, तो उनका तात्पर्य किसी का मजहब या पूजा पद्धति बदलना बिल्कुल नहीं होता। उनका सीधा अर्थ यह होता है कि भारत की सीमाओं के भीतर रहने वाले सभी नागरिकों की सांस्कृतिक विरासत, उनके पूर्वज और उनके राष्ट्रीय सरोकार एक हैं।
 
 
अब भारतीय विपक्ष का सबसे बड़ा संकट यह है कि उसने 'सेक्युलरिज्म' (धर्मनिरपेक्षता) को 'हिंदू विरोध' और 'हिंदू हीनभावना' का समानार्थी बना दिया है। उनके बनाए गए नियमों के अनुसार, किसी भी हिंदू प्रतीक, हिंदू त्योहार, या सनातनी दर्शन की प्रशंसा करना उनके धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ हो जाता है, जबकि अन्य मजहबों की रूढ़िवादिता पर भी मौन साध लेना परम सेक्युलरिज्म माना जाता है।
 
 
कपिल सिब्बल और उनकी पूर्ववर्ती सरकारों की मंडली ने वर्षों तक राजनीतिक लाभ के लिए भगवान राम के ऐतिहासिक अस्तित्व पर सवाल उठाए, रामसेतु को महज एक काल्पनिक ढांचा बताया और 'भगवा आतंकवाद' जैसे झूठे व मनगढ़ंत नैरेटिव गढ़े। जब मोहन भागवत जैसे मार्गदर्शक वैश्विक मंचों पर जाकर हिंदुत्व के उदारवादी, पर्यावरण-अनुकूल और आधुनिक चेहरे को अकाट्य तर्कों के साथ प्रस्तुत करते हैं, तो विपक्ष द्वारा दशकों से खड़ा किया गया यह छद्म ढांचा ढह जाता है।
 
 
विदेशी विद्वान जब संघ के विचारों को बिना किसी पूर्वाग्रह के सुनते हैं, तो वे पाते हैं कि यह दर्शन तो पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकार, लैंगिक समानता और वैश्विक शांति के आधुनिकतम मूल्यों के सर्वथा अनुकूल है। ऐसे में भारतीय विपक्ष की यह मजबूरी बन जाती है कि वह या तो पूरी तरह अज्ञानी बन जाए या फिर जनता के सामने यह विलाप करे कि उन्हें संघ की मंशा पर शक है!
 
 
विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कथनी और करनी में अंतर है। लेकिन अगर निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए, तो कथनी और करनी का अंतर संघ में नहीं, बल्कि खुद विपक्ष के आचरण में दिखाई देता है। जो विपक्ष चुनाव आते ही खुद को 'जनेऊधारी हिंदू' घोषित करने लगता है, मंदिरों के चक्कर काटने लगता है और खुद को भगवान राम या शिव का परम भक्त दिखाने की होड़ में शामिल हो जाता है, वही चुनाव बीतते ही हिंदुत्व को एक खतरनाक विचार बताने लगता है।
 
 
इसके विपरीत, संघ अपनी स्थापना के बाद से लेकर आज तक, उसने समाज को जोड़ने, छुआछूत और जातिवाद के उन्मूलन के लिए निरंतर धरातल पर काम किया है। प्राकृतिक आपदाओं, युद्ध के समय या कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौरान संघ के स्वयंसेवकों ने बिना किसी मजहबी भेदभाव के समाज के हर वर्ग की सेवा की है। मोहन भागवत ने अमेरिका में उसी सेवाभाव और एकात्म मानववाद को परिभाषित किया था, जो संघ का रोजमर्रा का जीवन है। विपक्ष इस जमीनी सच्चाई को देखना ही नहीं चाहता क्योंकि सत्य को स्वीकार करते ही उनकी नफरत और विभाजन पर आधारित राजनीति का अंत हो जाएगा।