'इस्लाम सभी धर्मों से बेहतर', कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायरेड्डी का ये अतिवाद है!

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    01-Sep-2026
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डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार  
 
 
समकालीन भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श में धर्मों की व्याख्या और उनके ऐतिहासिक प्रभाव को लेकर अक्सर तीखी बहस देखने को मिलती है। हाल ही में कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायारेड्डी द्वारा कोप्पल जिले के कुकनूर में दिया गया बयान इसी विमर्श का एक नया उदाहरण है, जिसमें उन्होंने इतिहास और विभिन्न धर्मों के अपने अध्ययन का हवाला देते हुए इस्लाम को अन्य सभी धर्मों से बेहतर, महान, मानवीय और एक वैज्ञानिक धर्म घोषित किया।
 
 
मंत्री रायारेड्डी का तर्क है कि पैगंबर मोहम्मद द्वारा दी गई कुरान सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि सभी मनुष्‍यों के लिए है और जो लोग इस धर्म को जाने बिना राय बनाते हैं, वे गलत हैं। वस्‍तुत: अब हम इसी आधुनिक राजनीतिक बयानबाजी के आलोक में पिछले 1400 वर्षों के वैश्विक और भारतीय इतिहास के उन पन्नों को टटोलने का प्रयास करते हैं, जो दस्तावेजी साक्ष्यों और सांख्यिकीय अनुमानों के रूप में दर्ज हैं, ताकि यह समझा जा सके कि सिद्धांतों के दावे और धरातल के यथार्थ में कितना अंतर रहा है।
 
 
साथ ही एक सवाल यह भी है, यदि किसी राजनेता को कोई विशेष धार्मिक विचारधारा इतनी अधिक वैज्ञानिक और मानवीय लगती है, तो वे व्यक्तिगत रूप से उसे मानने या अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं, परंतु एक संवैधानिक पद पर रहते हुए उसे दूसरों पर थोपने या अन्य धर्मों की तुलना में श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास क्यों किया जाना चाहिए? वास्‍तव में जब वे अब्राहमिक पंथों को भारतीय या अन्य सांस्कृतिक धाराओं से ऊपर रखते हैं, तो वह इतिहास के उन क्रूर अध्यायों की अनदेखी करना है जिसने इसी उपउपमहाद्वीप की जनसांख्यिकी और संस्कृति को गहरे घाव दिए हैं।
 
 
वैश्विक स्तर पर वैचारिक विस्तार और हताहतों का ऐतिहासिक अनुमान
 
बसवराज रायारेड्डी जैसे विचारकों द्वारा जिस इस्लाम को "इंसानियत से शुरू होने वाला धर्म" बताया जा रहा है, उसके वैश्विक प्रसार के इतिहास का एक बहुत ही अलग और चिंताजनक पहलू भी शोधकर्ताओं ने सामने रखा है। विश्व इतिहास में इस विचारधारा के प्रसार और उसके कारण जनित संघर्षों के कारण मारे गए लोगों की कुल संख्या का अध्ययन करने वाले सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ पॉलिटिकल इस्लाम (CSPI) के संस्थापक डॉ. बिल वार्नर जैसे स्वतंत्र इतिहासकारों का अनुमान है कि पिछले चौदह सौ वर्षों में इस्लामी अभियानों, विजय युद्धों और दास व्यापार के कारण दुनिया भर में लगभग 20 करोड़ से 27 करोड़ (200 से 270 मिलियन) लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
 
 
वस्‍तुत: विशाल संख्या में अकेले अफ्रीकी महाद्वीप के ट्रांस-सहारन दास व्यापार के दौरान मारे गए लगभग 12 करोड़ लोग शामिल हैं, जिन्हें बंधक बनाने, रेगिस्तानों में पैदल चलाने और विद्रोह करने पर कत्ल करने की अमानवीय प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। इसके अलावा ईसाई बहुल बाल्कन, पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया की प्राचीन बौद्ध और पारसी संस्कृतियों के सैन्य पतन के दौरान भी करोड़ों लोगों की जान गई, जिसके कारण वहाँ की मूल ऐतिहासिक पहचान हमेशा के लिए विलुप्त हो गई।
 
 
आंतरिक संघर्ष और आधुनिक आतंकवाद की कड़वी सच्चाई
 
मानवीय होने के दावों के विपरीत, इतिहास की एक और बड़ी सच्चाई यह है कि इस वैचारिक धारा के कारण हुई हिंसा का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्वयं इसके अनुयायियों के बीच ही आपसी संघर्ष के रूप में प्रकट हुआ है। इस्लाम के शुरुआती दौर में ही खलीफाओं के चयन को लेकर हुए गृहयुद्धों और 680 ईस्वी की कर्बला की लड़ाई ने शिया और सुन्नी समुदायों के बीच एक ऐसी स्थायी दीवार खड़ी कर दी, जिसके कारण मध्यकाल से लेकर आज तक मुस्लिम देशों में आपसी रक्तपात थमा नहीं है।
 
 
आधुनिक इतिहास में 1980 के दशक का ईरान-इराक युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें लाखों मुसलमानों की जान गई। वहीं अगर पिछले चार दशकों के आधुनिक कट्टरपंथी जिहादी आतंकवाद की बात करें, तो फ्रांसीसी थिंक टैंक फोंडापोल (Fondapol) की रिपोर्ट बताती है कि 1979 से वर्तमान तक दुनिया भर में हुए लगभग 66,872 इस्लामी आतंकवादी हमलों में करीब ढाई लाख लोगों की मौत हुई है।
 
 
अब इस वैश्विक आंकड़े का सबसे दुखद पहलू यह है कि इन आधुनिक हमलों के लगभग 89 फीसद शिकार स्वयं मुस्लिम देशों के आम नागरिक ही बने हैं, जो सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे क्षेत्रों में आपसी गृहयुद्ध और कट्टरता की वेदी पर चढ़ गए।
 
 
भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामी आक्रमणों का खूनी कालक्रम
 
जब हम भारत के संदर्भ में मंत्री रायारेड्डी के "वैज्ञानिक और जीने का तरीका सिखाने वाले" धर्म (मजहब इस्‍लाम) के दावे का परीक्षण करते हैं, तो मध्यकालीन भारत का इतिहास समकालीन प्रामाणिक साक्ष्यों के साथ एक अत्यंत दमनकारी तस्वीर पेश करता है। भारत पर पहला इस्लामी आक्रमण 712 ईस्वी में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर हुआ था, जिसके ऐतिहासिक दस्तावेज 'चचनामा' के अनुसार कासिम ने आत्मसमर्पण न करने वाले हजारों हिंदू पुरुषों का सामूहिक नरसंहार करने और महिलाओं को बंदी बनाने का आदेश दिया था। उनमें से कई महिलाओं को मंडी लगाकर बेचा भी गया।
 
 
इसके बाद महमूद गजनवी के सत्रह आक्रमणों के दौरान हुए रक्तपात का वर्णन उसके अपने दरबारी इतिहासकार अल-उतबी ने 'किताब-उल-यामिनी' में बहुत गर्व के साथ किया है, जिसमें उसने लिखा है कि हिन्‍दू काफिरों के कत्लेआम से नदियाँ लाल हो गई थीं।
 
 
वस्‍तुत: प्रसिद्ध भारतीय इतिहासकार डॉ. के. एस. लाल ने अपनी पुस्तक 'ग्रोथ ऑफ मुस्लिम पॉप्युलेशन इन मिडियावल इंडिया' में सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि वर्ष 1000 ईस्वी से 1500 ईस्वी के बीच निरंतर युद्धों, अकालों और दास व्यापार के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की कुल जनसंख्या में लगभग 6 करोड़ से 8 करोड़ की भारी गिरावट आई थी, जो कि किसी भी सभ्यता के लिए एक अभूतपूर्व मानवीय क्षति थी।
 
 
शासकों की सैन्य क्रूरता और सामूहिक कत्लेआम के दस्तावेजी प्रमाण
 
मध्यकालीन भारत में आम गैर-मुस्लिम नागरिकों में खौफ पैदा करने के लिए शासकों द्वारा 'कतले-आम' (सामूहिक नरसंहार) को एक राजकीय नीति के रूप में इस्तेमाल किया गया। 1398 ईस्वी में दिल्ली पर आक्रमण करने वाले बर्बर आक्रमणकारी तैमूर लंग ने अपनी आत्मकथा 'तुजुक-ए-तैमूरी' में स्वयं स्वीकार किया है कि उसने युद्ध के मैदान में उतरने से पहले अपने शिविरों में मौजूद एक लाख से अधिक हिंदू कैदियों को एक ही दिन में तलवार के घाट उतारने का आदेश दिया था।
 
 
इसी तरह, इतिहास में 'महान' कहे जाने वाले मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान भी ऐसी क्रूरता देखी गई, जिसका प्रमाण अबुल फजल के 'अकबरनामा' में मिलता है। 1568 ईस्वी में जब अकबर की सेना ने चित्तौड़गढ़ के किले पर विजय प्राप्त की, तो राजपूत सैनिकों के शाका (अंतिम युद्ध) के बाद अकबर ने किले के भीतर मौजूद 30,000 निहत्थे हिंदू किसानों, शिल्पकारों और आम नागरिकों के सामूहिक नरसंहार का आदेश दिया था। इन घटनाओं के दस्तावेजी साक्ष्य यह प्रमाणित करते हैं कि मध्यकाल के ये युद्ध सिर्फ राजनीतिक जमीन जीतने के लिए नहीं किए गए, इस्‍लामिक जिहाद ने एक खास धार्मिक (मजहबी) वर्चस्व को स्थापित करने एवं अपनी संख्‍य बल, लालच से बढ़ाने के लिए भी लड़े गए थे।
 
 
सांस्कृतिक केंद्रों का विध्वंस और ज्ञान परंपरा पर प्रहार
 
भारत की ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करने के लिए प्राचीन विश्वविद्यालयों और अति पवित्र मंदिरों को सुव्यवस्थित तरीके से निशाना बनाया गया। 1193 ईस्वी में मोहम्मद गौरी के सेनापति बख्तियार खिलजी ने भारत के महान बौद्ध और हिंदू शिक्षा केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय को पूरी तरह से जला दिया, जिसकी विशाल लाइब्रेरी महीनों तक जलती रही और हजारों भिक्षुओं को केवल उनके मुंडे सिर और धार्मिक पहचान के कारण मार डाला गया।
 
 
वस्‍तुत: इस घटना ने भारत के सदियों पुराने विज्ञान, गणित और दर्शन के खजाने को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया। मंदिरों के विध्वंस की बात करें तो दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के शिलालेख आज भी गवाही देते हैं कि उसका निर्माण 27 भव्य हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर किया गया था।
 
 
कश्मीर में सुल्तान सिकंदर शाह मीर (सिकंदर बुतशिकन) ने मार्तंड सूर्य मंदिर को बारूद से उड़ा दिया और वहाँ के पंडितों को जबरन धर्मांतरण या मौत का रास्ता दिखाया। औरंगजेब के शासनकाल के आधिकारिक इतिहास 'मासीर-ए-आलमगीरी' के अनुसार, 9 अप्रैल 1669 को जारी एक शाही फरमान के बाद काशी विश्वनाथ, मथुरा के केशवदेव मंदिर और सोमनाथ जैसे हजारों पवित्र स्थलों को जमींदोज कर दिया गया, जो पराजित समाज को मानसिक रूप से हीन महसूस कराने की सोची-समझी रणनीति थी।
 
 
आर्थिक शोषण और सामाजिक-कानूनी भेदभाव का ताना-बाना
 
धार्मिक और शारीरिक दमन के साथ-साथ हिंदुओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से पंगु बनाने के लिए 'शरिया' न्याय प्रणाली और विशेष करों का जाल बुना गया। गैर-मुसलमानों पर लगाया जाने वाला 'जजि‍या कर' इसका सबसे बड़ा हथियार था, जिसे फिरोज शाह तुगलक ने ब्राह्मणों पर भी लागू किया और औरंगजेब ने इसे दोबारा लागू करके गरीब हिंदुओं को धर्म बदलने या अपने बच्चों को दास के रूप में बेचने पर मजबूर किया।
 
 
अलाउद्दीन खिलजी की कर नीति का वर्णन करते हुए इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने 'तारीख-ए-फिरोजशाही' में लिखा है कि हिंदुओं पर 50 फीसद का भूमि कर (खराज) लगाया गया था जिससे उनकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई थी कि हिंदू महिलाओं को मुस्लिम सरदारों के घरों में जाकर मजदूरी करनी पड़ती थी।
 
 
शरिया और 'फतवा-ए-आलमगीरी' के तहत अदालतों में किसी मुस्लिम के मुकाबले हिंदू की गवाही को अमान्य या कमजोर माना जाता था, जिससे उन्हें कभी न्याय नहीं मिलता था। इसके अलावा सार्वजनिक रूप से होली-दिवाली मनाने, माथे पर तिलक लगाने, जनेऊ पहनने या पालकी में बैठने पर भी कई कालखंडों में कड़े प्रतिबंध थे, जो यह दर्शाते हैं कि आम जनता अपने ही देश में दोयम दर्जे की नागरिक बनकर रह गई थी।
 
 
दास प्रथा, हरम की कड़वी हकीकत और महिलाओं का सर्वोच्च बलिदान
 
मध्यकालीन भारत के इतिहास का एक और अत्यंत अंधकारमय अध्याय मानव तस्करी और दास प्रथा का है, जिसने लाखों भारतीय पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को विदेशी बाजारों में बिकने वाली वस्तु बना दिया। प्रसिद्ध मोरक्कन यात्री इब्न बतूता ने अपने यात्रा वृत्तांत 'रिहला' में लिखा है कि सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक रोजाना सैकड़ों हिंदू दासों और दासियों को अपने विदेशी मेहमानों को उपहार में देता था। इसी दास प्रथा और परिवहन के कारण भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित पहाड़ों का नाम 'हिंदूकुश' (हिंदुओं का संहारक) पड़ा, क्योंकि भारत के मैदानी इलाकों से जंजीरों में बांधकर मध्य एशिया के बाजारों की ओर ले जाए जा रहे लाखों हिंदू गुलामों की मौत उन पहाड़ों की अत्यधिक ठंड और कठिन रास्तों के कारण रास्ते में ही हो जाती थी।
 
 
इस पूरे दमन चक्र में सबसे अधिक प्रताड़ना महिलाओं को झेलनी पड़ी। इस्लामी सेनाओं के हाथों होने वाले बलात्कार, जबरन धर्मांतरण और हरम में दासी बनने के अपमान से बचने के लिए राजपूत और अन्य हिंदू महिलाओं के पास अपनी गरिमा की रक्षा का केवल एक ही रास्ता बचता था, जिसे 'जौहर' (अग्नि में सामूहिक आत्मदाह) कहा जाता है। रानी पद्मिनी (1303) और रानी कर्णावती (1535) के जौहर इसके ऐतिहासिक और प्रामाणिक प्रमाण हैं।
 
 
संतों और राजाओं को दी गई रूह कंपा देने वाली यातनाएं
 
इस्‍लामिक विचारधारा के नाम पर आत्मसमर्पण न करने वाले धार्मिक गुरुओं और क्षेत्रीय राजाओं को जो अमानवीय यातनाएं दी गईं, वे इतिहास के सबसे क्रूर उदाहरणों में शुमार हैं। मुगल सम्राट जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा 'तुजुक-ए-जहाँगीरी' में स्वयं स्वीकार किया है कि उसने सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव जी की धार्मिक लोकप्रियता को रोकने के लिए उन्हें शरिया के तहत उबलते पानी में बिठाने और शरीर पर गर्म रेत डालने का आदेश दिया, जिससे वे शहीद हो गए।
 
 
औरंगजेब के काल में कश्मीरी पंडितों के जबरन धर्मांतरण का विरोध करने पर नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी का दिल्ली के चांदनी चौक पर सिर कलम कर दिया गया, जबकि उनके सामने उनके शिष्यों (भाई मति दास को आरी से चीरना, भाई सती दास को जिंदा जलाना) को तड़पाया गया। गुरु गोबिंद सिंह के दो मासूम बेटों (साहिबजादा जोरावर सिंह और फतेह सिंह) को सिर्फ इसलिए जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया, क्योंकि उन्होंने इस्लाम स्वीकार नहीं किया।
 
 
राजाओं के स्तर पर, शिवाजी महाराज के पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज को औरंगजेब की कैद में हफ्तों तक दी गई यातनाएं, जैसे उनकी जीभ काटना, आँखें निकालना, खाल खींचना और शरीर के टुकड़े करना, यह साबित करती हैं कि वैचारिक अधीनता स्वीकार न करने की कीमत कितनी खौफनाक होती थी।
 
 
राजनीतिक विमर्श और ऐतिहासिक सत्य का संतुलन
 
अब कर्नाटक के मंत्री बसवराज रायारेड्डी के बयान को यदि इतिहास के व्यापक और दस्तावेजी साक्ष्यों की कसौटी पर कसा जाता है, तो इसके दावों और ऐतिहासिक यथार्थ के बीच एक बहुत गहरी खाई दिखाई देती है। दिखाई देती हैं मिस्र, फारस (ईरान), मेसोपोटामिया और रोमन साम्राज्य जैसी महान और प्राचीन सभ्यताएँ जोकि इस्लामी आक्रमणों के कुछ ही दशकों या सदियों में पूरी तरह समाप्त हो गईं और उनकी मूल पहचान विलुप्त हो गई, वहीं भारत का इतिहास इस मामले में अद्वितीय है।
 
 
विजयनगर साम्राज्य, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, सिख गुरुओं और असम के अहोम राजाओं जैसे अनगिनत नायकों के निरंतर सैन्य, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिरोध के कारण ही भारत अपनी मूल सनातन पहचान और संस्कृति को बचाए रखने में सफल रहा है।
 
 
यहां ध्‍यान रहे, आज के लोकतांत्रिक युग में इतिहास का यह निष्पक्ष अध्ययन किसी समुदाय के प्रति द्वेष फैलाने के लिए नहीं किया गया है, वस्‍तुत: राजनेताओं द्वारा किए जाने वाले वैचारिक अतिवाद को समझने और उस स्वतंत्रता एवं सांस्कृतिक धरोहर की कीमत को पहचानने के लिए यह अध्‍ययन बहुत आवश्यक है, जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने संघर्षों से बचाकर हमें सौंपा है।