वंदे मातरम के 150 वर्ष राष्ट्रभाव के पूर्ण स्वर की वापसी का समय

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    01-Sep-2026
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वंदे मातरम के 150 वर्ष राष्ट्रभाव के पूर्ण स्वर की वापसी का समय
 
 
अमित राव पवार
लेखक-साहित्यकार
 
 
भारत के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में कुछ शब्द ऐसे हैं जो कालखंडों की स्मृतियों,संघर्षों और सामूहिक चेतना के प्रतीक बन जाते हैं। उन्हीं में से ‘वंदे मातरम’ ऐसा ही एक उद्घोष है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना आनंदमठ ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के निर्णायक दौर तक भारतीय समाज में राष्ट्रभाव जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। आज जब वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का अवसर सामने है,तब यह विचार करना।आवश्यक है कि इस गीत को हम केवल अतीत की स्मृति मानें या उसकी मूल राष्ट्रीय भावना और सम्मान को वर्तमान में भी उसी व्यापकता के साथ प्रतिष्ठित करें।स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वंदे मातरम सामान्य गीत नहीं था। यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की आकांक्षा का उद्घोष बन गया था।अनेक स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों ने इसे प्रेरणा के रूप में अपनाया। सभाओं,आंदोलनों और जुलूसों में इसकी गूंज लोगों के भीतर साहस और उत्साह पैदा करती थी। उस समय राष्ट्रवाद कोई सरकारी अवधारणा नहीं,बल्कि दमन के विरुद्ध संघर्षरत जनता की जीवंत अनुभूति था और वंदे मातरम उस अनुभूति की प्रभावशाली अभिव्यक्ति बन चुका था।
 
 
वर्तमान दौर में देश की कुछ राजनीतिक पार्टियों द्वारा वोट-बैंक साधने के उद्देश्य से किया गया विरोध भी उनकी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। जबकि इसकी व्यापक स्वीकार्यता का प्रमाण यह भी है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1896 से अपने अधिवेशनों में इसका गायन प्रारंभ किया। उसके सार्वजनिक मंच पर भी वंदे मातरम राष्ट्रीय चेतना के स्वर के रूप में स्थापित था। यह स्थिति अचानक नहीं बनी थी। इसके पीछे उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं,जिनमें भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखने की चेतना लगातार मजबूत हो रही थी। वंदे मातरम की 150 वर्ष की यात्रा केवल एक गीत की यात्रा नहीं,बल्कि भारत के बदलते इतिहास की भी यात्रा है। जब वंदे मातरम के 50 वर्ष पूरे हुए,तब भारत अंग्रेजी शासन की गुलामी में जकड़ा हुआ था और देशवासी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे।जब इसके 100 वर्ष पूरे हुए,तब देश लोकतंत्र के सबसे कठिन दौरों में से एक आपातकालसे गुजर चुका था और उसकी स्मृति अभी भी राष्ट्रीय चेतना में ताजा थी। अब जब वंदे मातरम 150 वर्ष पूरे कर रहा है,भारत एक स्वतंत्र,संप्रभु और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। इसलिए यह केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं है, यह हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है कि इस
ऐतिहासिक राष्ट्रीय गीत को उसके पूरे वैभव,गरिमा,सम्मान और मूल राष्ट्रीय भाव के साथ नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करें।
 
 
लेकिन इतिहास हमेशा सरल और निर्विवाद नहीं होता। वंदे मातरम के कुछ अंशों को लेकर आपत्तियाँ उठीं। विशेष रूप से गीत में वर्णित दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के शब्दों को लेकर यह तर्क सामने आया कि इससे गीत का स्वर धार्मिक हो जाता है। इन आपत्तियों के प्रभाव के कारण कांग्रेस ने 1937 के बाद अपने अधिवेशनों में मुख्यतः इसके प्रारंभिक दो पदों को ही गाए जाने की परंपरा बनाई। जबकि उनसे 1896 से 1937 तक सम्पूर्ण वन्देमातरम का गायन अपने कार्यक्रमों में किया,फिर अचानक ऐसा क्या हुआ जिसने सम्पूर्ण वंदे मातरम के गान को दो ही पद में स्वीकारते हुए स्वतंत्रता के बाद भी इसे सरकारी तौर पर जारी रखा यहां पर यह भी प्रश्न सामने उभर कर दिखाई देता है। 1947 में देश के विभाजन ने इस पूरे प्रश्न को एक और ऐतिहासिक संदर्भ दे दिया। धार्मिक आधार पर हुए विभाजन के साथ भारत ने हिंसा,विस्थापन और गहरे सामाजिक आघात का सामना किया। स्वतंत्र भारत ने इसके बाद एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में अपनी यात्रा शुरू की। स्वाभाविक रूप से यह आवश्यक था कि नए भारत में सभी समुदायों की धार्मिक संवेदनशीलताओं का सम्मान किया जाए। किंतु इसके साथ यह भी अपेक्षित था कि स्वतंत्रता आंदोलन की उन राष्ट्रीय विरासतों को सुरक्षित रखा जाता,जिन्होंने करोड़ों भारतीयों में आजादी की चेतना जगाई थी। वंदे मातरम उसी विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा था। यहीं से यह प्रश्न उठता है कि क्या विभाजन के समय की राजनीतिक परिस्थितियों में बनी सीमाओं को हमेशा के लिए बनाए रखना उचित है? स्वतंत्रता के बाद लगभग आठ दशक बीत चुके हैं। पीढ़ियाँ बदल गईं, भारत की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और देश ने लोकतंत्र की अपनी यात्रा में अनेक उपलब्धियाँ हासिल कीं। ऐसे में वंदे मातरम को लेकर भी इतिहास को नए,व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
 
 
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने गीत में दुर्गा,लक्ष्मी और सरस्वती का जो उल्लेख किया,उसे केवल धार्मिक आग्रह के रूप में देखना इसके काव्यात्मक और सांस्कृतिक अर्थ को सीमित करना होगा। भारतीय परंपरा में दुर्गा शक्ति,लक्ष्मी समृद्धि और सरस्वती ज्ञान व संस्कार की प्रतीक हैं। इस दृष्टि से मातृभूमि को शक्ति,समृद्धि और ज्ञान से संपन्न देखने की आकांक्षा भी इन प्रतीकों में निहित है। असहमति रखने वाले नागरिकों की संवेदनशीलता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसी के साथ किसी रचना के व्यापक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक संदर्भ को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्वतंत्र भारत में वंदे मातरम को राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिला,लेकिन उसके ऐतिहासिक महत्व और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को देखते हुए उसे राष्ट्रगीत का सम्मान दिया गया। यह निर्णय स्वयं इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वंदे मातरम भारतीय राष्ट्रचेतना के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की संवैधानिक एवं विधिक स्थिति भले अलग हो, लेकिन दोनों के प्रति राष्ट्रीय सम्मान का भाव महत्वपूर्ण है। आज विवाद इस बात को लेकर भी उठता है कि वंदे मातरम का पूर्ण रूप गाया जाए या केवल दो पद। इस प्रश्न को राजनीतिक टकराव का विषय बनाने के बजाय ऐतिहासिक दृष्टि से देखना अधिक उचित होगा। यदि कोई रचना स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय प्रेरणा का स्रोत रही है,तो उसे पूर्ण रूप में समझने और उसके साहित्यिक-सांस्कृतिक अर्थ पर विचार करने में भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। साथ ही,यही संतुलन इस पूरे विमर्श की कुंजी है। वंदे मातरम का गौरव का अर्थ यह नहीं है कि देश के नागरिकों की विविध धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसकी उपेक्षा की जाए। समस्त प्रकार की धार्मिक आपत्तियों के नाम पर इस गीत के ऐतिहासिक महत्व,साहित्यिक गरिमा और स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान को कम आंकना भी उचित नहीं होगा। राष्ट्रवाद की परिपक्वता इसी में है कि वह सम्मान और असहमति दोनों के लिए स्थान बनाए।
 
 
वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ इसलिए केवल एक गीत की वर्षगांठ नहीं है। यह उस दौर को याद करने का अवसर है,जब भारत गुलाम था और मातृभूमि की स्वतंत्रता सबसे बड़ा स्वप्न थी। आज परिस्थितियाँ अलग हैं। देश स्वतंत्र है,लोकतांत्रिक है और अपनी विविधताओं के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में वंदे मातरम को लेकर हमारा दृष्टिकोण भी परिपक्व और व्यापक होना चाहिए। इस अवसर पर आवश्यकता किसी नए राजनीतिक विवाद की नहीं,बल्कि इतिहास के प्रति ईमानदार दृष्टि की है। वंदे मातरम को न तो किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति बनाया जाना चाहिए और न किसी समुदाय के विरुद्ध पहचान के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह उस भारतीय चेतना की विरासत है,जिसने औपनिवेशिक शासन के सामने स्वतंत्रता का स्वप्न देखने का साहस किया था। 150 वर्ष पूरे होने पर इसका सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि वंदे मातरम के स्वर को राजनीतिक खांचों से बाहर निकालकर उसके ऐतिहासिक,साहित्यिक और राष्ट्रीय संदर्भ में समझा जाए। मातृभूमि के प्रति सम्मान, स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता और भारत की विविधता के प्रति सम्मान यदि ये तीनों भाव एक साथ जीवित रहें,तभी वंदे मातरम का वास्तविक अर्थ भी जीवित रहेगा। जिस गीत के 50 वर्ष गुलामी के दौर में बीते,जिसके 100 वर्ष देश के लोकतांत्रिक संघर्ष के कठिन दौर के साक्षी बने और जिसके 150 वर्ष स्वतंत्र भारत की उपलब्धियों के बीच पूरे हो रहे हैं,उसे उसके संपूर्ण वैभव और गरिमा के साथ प्रस्तुत करना न केवल हमारा अधिकार,बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। यही उसके पूर्ण स्वर और सम्मान की सच्ची वापसी होगी।