हिरोशिमा की राख से उठता प्रश्न: क्या मानवता परमाणु विनाश की ओर बढ़ रही है?

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल    05-Aug-2026
Total Views |
परमाणु
 
 
डॉ भूपेंद्र कुमार सुल्लेरे
वरिष्ठ पत्रकार
 
 
6 अगस्त 1945 मानव इतिहास की उन तिथियों में दर्ज है, जिसे सभ्यता कभी भूल नहीं सकती। इसी दिन अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर "लिटिल बॉय" नामक पहला परमाणु बम गिराया था। कुछ ही क्षणों में एक जीवंत शहर धुएँ और राख के ढेर में बदल गया। लगभग 70 हजार लोग तत्काल मारे गए और वर्ष के अंत तक विकिरण तथा अन्य प्रभावों से मरने वालों की संख्या डेढ़ लाख के आसपास पहुँच गई। इसके तीन दिन बाद 9 अगस्त को नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया। इन दोनों घटनाओं ने द्वितीय विश्व युद्ध का अंत तो किया, लेकिन मानव इतिहास में परमाणु युग की शुरुआत भी कर दी।
 
 
हिरोशिमा दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए चेतावनी का दिन है। यह हमें याद दिलाता है कि विज्ञान और तकनीक का उपयोग यदि मानव कल्याण के बजाय विनाश के लिए किया जाए तो उसका परिणाम कितना भयावह हो सकता है।
 
 
आज, 81 वर्ष बाद भी दुनिया ने उस त्रासदी से पूरी तरह सबक नहीं लिया है। इसके विपरीत, परमाणु हथियारों की संख्या, उनकी मारक क्षमता और उन्हें ले जाने वाली मिसाइल प्रणालियाँ पहले से कहीं अधिक उन्नत हो चुकी हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्तमान में विश्व के पास इतने परमाणु हथियार हैं कि पृथ्वी पर जीवन को कई बार समाप्त किया जा सकता है। यह स्थिति केवल सैन्य शक्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है।
 
 
आज अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इज़राइल जैसे देश परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र हैं। इनमें अमेरिका और रूस के पास सबसे बड़ा परमाणु भंडार है, जबकि चीन तेजी से अपने शस्त्रागार का विस्तार कर रहा है। दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु संतुलन तथा पूर्वी एशिया में उत्तर कोरिया की परमाणु महत्वाकांक्षाएँ वैश्विक चिंता का विषय बनी हुई हैं।
 
 
विडंबना यह है कि शीत युद्ध समाप्त होने के बाद उम्मीद थी कि परमाणु हथियारों में कमी आएगी, लेकिन आज स्थिति उलटी दिखाई देती है। यूक्रेन-रूस युद्ध, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, चीन-ताइवान विवाद और अनेक क्षेत्रीय संघर्षों ने परमाणु हथियारों की प्रासंगिकता को फिर से बढ़ा दिया है। कई देशों ने अपने परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण पर अरबों डॉलर खर्च करने की योजनाएँ बनाई हैं।
 
 
यह भी विचारणीय है कि जिन देशों में करोड़ों लोग आज भी गरीबी, भूख, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं, वही देश हथियारों की होड़ में भारी धनराशि खर्च कर रहे हैं। यदि इस धन का एक छोटा हिस्सा भी शिक्षा, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और गरीबी उन्मूलन पर लगाया जाए, तो विश्व कहीं अधिक सुरक्षित और समृद्ध बन सकता है।
 
 
परमाणु हथियार केवल युद्ध के समय ही खतरा नहीं होते। दुर्घटनाएँ, तकनीकी त्रुटियाँ, साइबर हमले, गलत आकलन या मानवीय भूल भी परमाणु युद्ध का कारण बन सकती हैं। इतिहास में कई अवसर ऐसे आए हैं जब तकनीकी गड़बड़ी के कारण दुनिया अनजाने में परमाणु युद्ध के बेहद करीब पहुँच गई थी। इसलिए परमाणु खतरा केवल राजनीतिक निर्णयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तकनीकी और मानवीय जोखिमों से भी जुड़ा हुआ है।
 
 
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर युद्ध और हाइपरसोनिक मिसाइलों जैसी नई तकनीकों ने इस खतरे को और जटिल बना दिया है। यदि भविष्य में परमाणु हथियारों के नियंत्रण तंत्र पर साइबर हमला हो जाए या कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय प्रणाली में त्रुटि हो जाए, तो परिणाम पूरी मानवता के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।
 
 
जलवायु वैज्ञानिक भी चेतावनी देते हैं कि सीमित परमाणु युद्ध भी "न्यूक्लियर विंटर" अर्थात परमाणु शीतकाल का कारण बन सकता है। वातावरण में धूल और धुएँ की मोटी परत सूर्य के प्रकाश को रोक सकती है, जिससे वैश्विक तापमान गिर जाएगा, कृषि उत्पादन ठप हो जाएगा और करोड़ों लोग भुखमरी का शिकार हो सकते हैं। अर्थात परमाणु युद्ध में केवल युद्धरत देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया प्रभावित होगी।
 
 
भारत का दृष्टिकोण इस संदर्भ में अपेक्षाकृत संतुलित माना जाता है। भारत ने "पहले प्रयोग न करने" (No First Use) की नीति अपनाई है और सदैव वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण का समर्थन किया है। भारत का मानना है कि विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने के लिए सभी देशों को समान रूप से आगे आना चाहिए। महात्मा गांधी का अहिंसा का संदेश आज भी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।
 
 
संयुक्त राष्ट्र ने भी परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए अनेक प्रयास किए हैं। परमाणु अप्रसार संधि (NPT), व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) तथा परमाणु हथियार निषेध संधि (TPNW) जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रयास हुए हैं, लेकिन प्रमुख परमाणु शक्तियों की राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। जब तक शक्तिशाली देश स्वयं अपने परमाणु शस्त्रागार में कमी नहीं करेंगे, तब तक वैश्विक निरस्त्रीकरण केवल आदर्श ही बना रहेगा।
 
 
हिरोशिमा हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी युद्ध में वास्तविक हार मानवता की होती है। युद्ध जीतने वाले भी अंततः शांति ही चाहते हैं। इसलिए स्थायी समाधान हथियारों के विस्तार में नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति, विश्वास निर्माण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में निहित है।
 
 
आज पूरी दुनिया "विकसित राष्ट्र" बनने की दौड़ में लगी है। आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और सैन्य शक्ति को विकास का प्रतीक माना जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि यदि विकास के साथ मानवता, शांति और सुरक्षा नहीं जुड़ी हो, तो क्या वह वास्तव में विकास कहलाएगा? क्या ऐसा विकास सार्थक है जो पृथ्वी को अनेक बार नष्ट करने की क्षमता तो पैदा कर दे, लेकिन भूख, बीमारी और असमानता को समाप्त न कर सके?
 
 
वास्तविक विकास वह है जिसमें मनुष्य सुरक्षित हो, प्रकृति सुरक्षित हो और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो। केवल आर्थिक शक्ति या सैन्य क्षमता किसी राष्ट्र को महान नहीं बनाती; उसकी महानता इस बात से तय होती है कि वह विश्व शांति, मानवीय मूल्यों और वैश्विक सहयोग के लिए कितना योगदान देता है।
 
 
हिरोशिमा दिवस इसलिए केवल जापान का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का स्मृति दिवस है। यह हमें स्मरण कराता है कि विज्ञान का उद्देश्य जीवन की रक्षा होना चाहिए, न कि उसके विनाश का साधन बनना। परमाणु हथियारों की दौड़ मानव सभ्यता को सुरक्षा नहीं, बल्कि असुरक्षा के एक ऐसे चक्र में धकेल रही है, जहाँ एक छोटी-सी भूल भी पृथ्वी के भविष्य को अंधकारमय बना सकती है।
 
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व समुदाय हथियारों की प्रतिस्पर्धा के स्थान पर विश्वास, सहयोग और शांति की संस्कृति को बढ़ावा दे। हिरोशिमा की राख से उठती यह पुकार आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, मानवता का भविष्य बमों में नहीं, बल्कि संवाद, करुणा और शांति में सुरक्षित है। यही 6 अगस्त का सबसे बड़ा संदेश है।